About Didi Maa

Saturday, April 11, 2015

निष्क्रिय सज्जनता किसी काम की नहीं होती

‘आज यहाँ पोर्टब्लेयर में विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह में भाग लेते हुए मैं बहुत भावुक हूँ क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद और मेरे जीवन को एक साथ पचास वर्ष पूरे हुए हैं। मेरा जीवन हिन्दू जाति की सेवा करने के लिए है और मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी मृत्यु भी हिन्दू स्वाभिमान के लिए लड़ते हुए हो तो शायद मेरी मृत्यु भी सार्थक हो जाए। क्योंकि मैं मानती हूँ कि मेरे रोम-रोम में मेरी परम्परा का रक्त बहता है। आप उस भगवा को पूजते हो जिसके पीछे सूर्य का तेज है, चन्द्रमा की शीतलता है, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु और वीर सावरकर जैसे हुतात्माओं का समर्पण है। 

भगवा को प्रणाम करना यानि भारत की उस उज्ज्वल परम्परा को प्रणाम करने जैसा है। मैं समझती हूँ कि सारा विश्व त्राण पाएगा जब हिन्दू विचार प्रबल होकर सारे विश्व के जनमानस में फैलेगा क्योंकि जहाँ हिन्दू है वहाँ सब सुरक्षित हैं हिन्दू ही है जो दुनिया भर के मतावलंबियों को अपने में आत्मसात् कर लेता है। हमारी आस्था तो वह है जो पत्थर पर भी सिन्दूर चढ़ाकर हनुमन्तलाल को प्रकट कर देती है इसलिए इस आस्था में जीने वाले, इस श्रद्धा को जीने वाले हम हिन्दू, हमें समझाएंगे ये फिल्म बनाने वाले लोग कि कैसी होनी चाहिए हमारी पूजा पद्धति? एक फिल्म और भी बनी है उसमें भी सच को सच बताया है। हमारे सामने समस्या यह नहीं है कि हम पूजा पद्धति कैसे रखें। हमारे सामने समस्या यह है कि भारत को तोड़ने वाली ताकतें प्रबल होकर, भारत में भेष बदलकर घूम रही हैं और अपने मंसूबों को कारगर सिद्ध करने में लगी हैं। इस समस्या का एक ही समाधान है सजग भारतीय, जागरूक भारतीय और सबसे बड़ी बात निष्ठावान होकर सक्रिय भारतीय। आप भले ही निष्ठावान हो लेकिन निष्क्रिय रहो तो भला किस काम के? आपकी सज्जनता किस काम की? बहुतेरे सज्जन पलायनवादी होते हैं। वो बुरों के लिए रास्ता छोड़ देता है। अरे सज्जन हो तो भी सीना तान के खड़े होना सीखो। किस बात का डर है?

इस अवसर पर विहिप के अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त सचिव श्री राघूवल्लभजी, विहिप स्वर्ण जयंती समिति के अध्यक्ष श्री उत्पल शर्मा, मंत्री श्री ए.के.माहेश्वरी एवं विहिप अंडमान-निकोबर द्वीप समूह के संगठन सचिव श्री पार्थ मण्डल प्रमुख रूप से सम्मिलित हुए।

दिनांक 31 जनवरी 2015
विश्व हिन्दू परिषद स्वर्ण जयंती समारोह
पोर्टब्लेयर, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह

Wednesday, April 8, 2015

हिन्दू धर्म को नया निखार देगी युवा पीढ़ी

‘हमारे ऋषि-मुनि वैज्ञानिक थे। वे बाहरी वैज्ञानिक खोजों एवं मानव की आंतरिक शांति के लिए नित नए प्रयोग करते थे। वे उन बीजों के समान थे जो अपने अंकुरण के दौरान ऊपर व नीचे की यात्रा एक साथ करते हैं। वे आज के वैज्ञानिकों की भाँति खंड-खंड में शोध नहीं करते थे बल्कि समग्रता और परिपूर्णता उनका उद्देश्य होता था। वो न सिर्फ पृथ्वीवासियों के कल्याण की कामना करते थे बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शांति और स्थिरता को अपनी नियमित प्रार्थनाओं में प्रभु से मांगा करते थे। उन्होंने विनाश नहीं बल्कि सृजन का मार्ग चुना इसीलिए हिन्दू संस्कृति में पंचतत्वों को उपसाना में जोड़कर उनके संरक्षण की सुन्दर परम्परा भी हमारे ऋषियों ने ही आरंभ की थी।

    कई लोग चिंतित हैं कि हमारे संस्कारों पर पश्चिमी जगत का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। मेरा विचार है कि हमें इससे भयभीत होने की कतई आवश्यकता नहीं है क्यांेकि सत्य का बीज कभी नहीं मरता। वह शाश्वत होता है। मनुष्य के भीतर भौतिकवाद बढ़ेगा तो असंतोष बढ़ेगा और असंतोष जब अपनी सीमाएं पार करेगा तो मनुष्य फिर से संतोष की खोज में जुट जाएगा। अन्ततः सुख और संतोष उसे अध्यात्म में ही मिलेगा। हमारी आने वाली पीढ़ी केवल कही-सुनी बातों पर नहीं बल्कि धर्म की सत्यता को परखकर उसे अपनाएगी। वो वेदों-पुराणों को खंगालेंगे और धर्म के नाम पर फैली हुई भ्रांतियों को अपने विवेक की छलनी से छानकर हिन्दू संस्कृति को एक नया कलेवर प्रदान करेंगे और यह एक सुखद स्थिति होगी जब युवा पीढ़ी धर्म को परखकर उसे पारस बना देगी।’

    श्रीहरि सत्संग समिति, मुंबई द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव के दौरान पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी ने उक्त विचार प्रकट किये। एक भव्य शोभायात्रा के पश्चात् पूज्य सदानन्द योगीजी महाराज (तुंगारेश्वर) के कर-कमलों से आयोजन का शुभारंभ हुआ। मुंबई के उपनगर भयंदर की जैसलपार्क चैपाटी पर सम्पन्न हुए सात दिवसीय इस आयोजन की मुख्य कथा प्रवक्ता पूज्या दीदी माँ जी थीं। कथा के मुख्य यजमान रहे श्रीमती ऊषाकिरण-शिवपूजन गुप्ता परिवार। कथा संयोजक श्री शिवनारायण अग्रवाल, श्री मनोज अग्रवाल, स्वागताध्यक्ष श्री गजेन्द्र भण्डारी एवं व्यवस्था प्रमुख श्री सुरेश खंडेलवाल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया। इस अवसर पर संस्था के राष्ट्रीय संरक्षक श्री स्वरूपचन्द गोयल, न्यासी श्री मुकुटबिहारी सेक्सरिया, संस्था के मुंबई अध्यक्ष श्री विनोद लाठ, मंत्री श्री सुरेन्द्र विकल, श्री बजरंग चैहान, श्री अमित पंसारी, श्री प्रदीप गर्ग, श्री नरेन्द्र गुप्ता, श्री रोहिदास पाटिल, श्री हंसकुमार पाण्डे, श्री उदितनारायण सिंह, श्री यशवन्त कांगणे, श्री प्रवीण पाटिल, डाॅ.सुशील अग्रवाल, श्री राजेन्द्र मित्तल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए।



सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Monday, April 6, 2015

तीन बातें सफलता की...

एक बहेलिये ने जंगल में एक नन्हें से पंछी को पकड़ लिया। वो बेचारा चिल्लाने लगा -‘मुझे छोड़ दो, मुझे छोड़ दो। देखो तो, मैं कितना छोटा सा हूँ। अगर तुम ये सोचते हो कि तुम मुझे बनाकर खाओगे तो मेरे जरा से मांस से तुम्हारा पेट भी नहीं भरेगा। मैं इतना सुन्दर भी नहीं हूँ कि तुम मुझे किसी को बेच दो क्योंकि पंछियों को लोग इसीलिए खरीदते हैं कि या तो वो बोलते हों या फिर उनके पंख सुन्दर हों। मेरे साथ तो ये दोनों ही बातें नहीं हैं। इसलिए तुम मुझे छोड़ दो।’

    बहेलिये ने कहा -‘नहीं छोडूँगा।’ यह सुनकर पंछी ने कहा -‘जीवन में हमेशा सफल रहने के तीन रहस्य मैं तुम्हें बता सकता हूँ लेकिन तभी जब तुम मुझे छोड़ दो।’ उस बहेलिये के मन में लालच पैदा हुआ -‘अरे! ये नन्हा सा पंछी मुझे सफलता के तीन रहस्य बनाएगा!’ उसने लोभवश तुरंत उसे जाल से आजाद कर दिया। छूटते ही वह पास के एक पेड़ पर जा बैठा। बहेलिये ने कहा -‘लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया। तुम कहते थे ना कि सफलता के तीन रहस्य बताओगे। अब बताओ मुझे वो रहस्य।’

    पंछी बोला -‘सबसे पहला रहस्य तो यह है कि जो बात तुम्हारी बुद्धि में ना आए उसको मानना नहीं।’ जैसे कि मैं आप सब सामने बैठे बच्चों से यह कहूँ कि -‘ये जो बिटिया बैठी है ना, इसको रात को पंख निकल आते हैं। फिर ये उड़कर उस मन्दिर के ऊपर बैठ जाती है। तो बताओ बच्चों, क्या इस बात को आपकी बुद्धि कभी मानेगी? जो बात आपकी बुद्धि में ना समाये उसे कभी मत मानना।’ फिर बहेलिये ने कहा दूसरा बताओ। पंछी ने कहा -‘दूसरा रहस्य यह है कि असंभव को संभव बनाने की कोशिश नहीं करना। जो हो नहीं सकता उसे करने की कोशिश कभी नहीं करना।’ जैसे मैं आपसे पूछूँ कि कोई इंसान कहे कि मैं तो मरूँगा ही नहीं। तो क्या उसका हमेशा जीवित रहना संभव है? क्या वह कभी नहीं मरेगा?’ और उस पंछी ने तीसरा रहस्य बताया कि -‘नुकसान हो जाने के बाद कभी भी पछताना नहीं।’

    ये तीन रहस्य हैं सफलता के। यह सुनकर वह बहेलिया चिल्लाने लगा -‘तू बड़ा ही बुरा पंछी है, तूने मुझे धोखा दिया है। ये भी भला कोई रहस्य हैं। मैं तो समझता था कि तू पता नहीं कौन सा खजाना मुझे बताने वाला है।’ तो पंछी ने कहा -‘ऐ भाई सुनो, इधर देखो मेरी ओर।’ बहेलियों ने जब उसकी ओर देखा तो वह बोला -‘मेरे दिल में कोहिनूर हीरा है।’ जैसे ही बहेलिये ने ये सुना वह पेड़ पर चढ़कर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा। पंछी एक डाल से दूसरी डाल उसे नचाता हुआ उड़कर दूसरे पेड़ पर जा बैठा। बहेलिया फिर दूसरे पेड़ पर चढ़ा। इसी अफरातफरी में बहेलिया पेड़ से नीचे गिर पड़ा और उसका एक पैर टूट गया। नीचे पड़ा-पड़ा वह पछता रहा था -‘अरे, मैंने इसे क्यों छोड़ा। मैं मारने के बाद इसे काटता तो इसके दिल से कोहिनूर हीरा निकलता।’

    पंछी फिर से उसके पास आकर बोला -‘देखो, तुमने मेरी एक भी बात नहीं मानी। मैंने तुम्हें सफलता के तीन रहस्य बताए थे। एक - जो बुद्धि में ना आए उसे मत मानो। दूसरा - असंभव को संभव करने की कोशिश ना करो और तीसरा - हानि हो जाने के बाद पछताना नहीं।’ मेरे दिल में कोहिनूर का हीरा है भला यह बात बुद्धि में आने जैसी है क्या? फिर भी तुमने मुझे पकड़ने का प्रयास किया। मेरे तो पंख हैं लेकिन तुम्हारे नहीं, तुम मुझे कैसे पकड़ सकते हो? क्या यह असंभव नहीं था जिसे तुमने संभव बनाने का प्रयत्न किया। तीसरा जब मैं तुमसे छूट ही गया था तो फिर पछताते हुए तुम मुझे पकड़ने की हाय-हाय में क्यों दौड़े जिसके परिणाम में तुम्हारा पैर टूट गया?

जीवन में इन तीन बातों को ख्याल रखना बहुत जरुरी है। यह केवल एक मनोरंजक कहानी नहीं है बल्कि जीवन की बड़ी सीख मिलती है। अक्सर हममें से अधिकतर लोग कही-सुनी बातों पर विश्वास कर लेते हैं। उन बातों पर भी अमल करना शुरू कर देते हैं। जिन्हें पहली बार सोचने में तो हमारी बुद्धि ही उसे मानने से इंकार कर देती है, फिर केवल अपनी जिद के कारण हम जीवन में बहुत से ऐसे कार्यों को पूरा करने की कोशिश में अपना ऊर्जा नष्ट करते हैं जो संभव ही नहीं होते। जिन्हें लाख प्रयत्न करने पर भी संभव नहीं बनाया जा सकता और फिर इन दोनों ही बातों के कारण जब कभी भी हमें बहुत बड़ी हानि होती है तो हम पछताने की प्रक्रिया से गुजरने लगते हैं जो अंततः हमें मानसिक अवसाद तक ही स्थिति में पहुँचा देती है। इस कहानी को सदैव स्मरण रखें और अपने जीवन को सार्थक बनाने में स्वयं की सहायता करें।

साभार - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Saturday, April 4, 2015

सुखी हो जाने की कला

हम स्मरण करते हैं भारत के उन सत्पुरुष महामानवों को जिनका स्मरण मात्र ही चित्त में पावनता का संचार करता है। कदाचित अपने स्वरूप को, अपने आप को खोकर जीने का अर्थ समाप्त हो जाता है। दूसरों के श्रेष्ठ को धारण स्वीकार करना, ये मनुष्य की गरिमा होती है लेकिन अपने श्रेष्ठ को भूल जाना ये मनुष्य का आलस्य और प्रमाद होता है, आत्महीनता की पहचान होती है, इसलिए मेरा जो अपना श्रेष्ठ है जो मुझे मेरे पुरखों से मिला, मेरी परम्परा से मिला, मेरे धर्म से मिला, मेरे देश की माटी के सौंधेपन से मिला, वो है कपिल, कणाद की परम्परा से मिला और सबसे खूबसूरत जो मिला वो भारत की धरती पर ‘मातृभाव’ मिला, ‘मातृसत्ता’ मिली। भारत की मानवी ने जाना कि माँ होने के अर्थ क्या होते हैं। माँ कैसी होती है, माँ क्यों होती है और माँ की गरिमा क्या होती है। अगर सारे विश्व की मानवी को टटोलोगे तो भारत की स्त्री में ही वह स्वरूप दिखाई देगा जो धन्य करता है मनुष्यता को। सबसे पहले भारत ने ही दी है - मातृसत्ता। एक जगह चर्चा चल रही थी कि बच्चों का अच्छा विकास कैसे होगा। संभव है, उन्हें अच्छा भोजन दो, अच्छा वातावरण दो, अच्छी औषधियाँ दो, बच्चा अच्छा बनेगा लेकिन कैसे अच्छा बनेगा अगर उसे जन्म देने वाली माता आत्महीनता की शिकार है, अगर वो मानुषी भाव को खो चुकी है, अगर वो मातृत्व की गरिमा को नहीं पहचानती, अगर वो ये नहीं जानती की संसार का सबसे श्रेष्ठ सृजन मेरे हाथों से हो रहा है, तो फिर उस संतान को मानसिक, आत्मिक और शारीरिक विकास कैसे मिल सकता है? इसलिए अगर भारत अपनी संतानों को खूबसूरत देखना चाहता है, सर्वगुण सम्पन्न देखना चाहता है तो फिर कार्य तो भारत की स्त्री पर ही करना होगा।

आज से बहुत वर्षों पहले विदेश से एक विद्वान आए थे महाराष्ट्र के अन्दर। एक गाँव देखा था उन्होंने। उसके जलाशय के अन्दर स्नान करती स्त्रियों को देखा उन्होंने। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि मैंने देखा भारत की स्त्री को, जिसका तन और मन दोनों की बहुत सुन्दर हैं। सकुचा गई थीं वो देवियाँ, जलाशय के पास किसी पराये पुरुष को देखकर। लज्जा, शील, संकोच ये भारत की स्त्री के आभूषण हैं। कदाचित् वो खुलती हैं अपनों के बीच में, लेकिन जब कोई पराया दिखता है तो संकोच में सिकुड़ती जाती हैं। और उनका वही शील उनको खूबसूरत बनाता है। उनका वही शील उनको धन्य बनाता है। उनको चरित्र के शिखर पर पहुँचाता है। उन्होंने लिखा कि कदाचित् यूरोप की स्त्री उस गरिमा को समझ नहीं पाएगी क्योंकि वो अपनी मानसिक और शारीरिक भूख को मिटाने के लिए अपनी संतान को छोड़कर पराये पुरुष के साथ जाती है, अपने पति का त्याग कर देती है, और उसका अपना पति किसी विवाहित स्त्री के साथ अपनी वासना तृप्त करने के चक्कर में लगा रहता है जिसके कारण किसी और का घर बिगड़ जाता है। इस चक्कर में वे संतानें अकेली रह जाती हैं जो किसी भी देश का भविष्य होती हैं। यूरोप की स्त्री कभी नहीं समझ पाएगी उस भाव को, जिसे भारत की स्त्री अपने मन-मानस में जीते हुए अपने घर में स्वर्ग को उतार लेती है।

    लौटकर देखिये उस चिन्तन को, आप कहोगे कि जब हम अपनी बात कहेंगे तो लोग कहते हैं कि ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।’ लेकिन यदि आप संसार में घूमकर टटोलेंगे तो आपको मानना ही पड़ेगा कि आपके ऋषियों ने आपको जो दिया है वो संसार की सबसे श्रेष्ठ जीवन पद्धति है। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज, वो एक पुत्र ही तो थे, माँ भारती के लाल ही तो थे। इटली गए थे वो। वहाँ की एक स्त्री ने प्रस्ताव रखा था उनके सामने कि विवेकानन्द तुम कितने खूबसूरत हो, तुम्हें देखकर चित्त में लालसा पैदा होती है। चित्त के अन्दर वो एक भाव पैदा होता है जो कहता है कि तुम मुझे अंगीकार करो। मुझे आलिंगन में बाँधो। वचन देती हूँ कि तुम्हारे जैसा बेटा पैदा करूँगी। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा -‘मेरे जैसा तो मैं ही हो सकता हूँ देवी। इसलिए आज से मुझे अपना पुत्र स्वीकार कर लीजिये और मेरी माता बन जाइये।’

    इस देश के अन्दर यहीं तक नहीं स्वर्ग की अप्सराओं को भी ऐसा ही उत्तर अर्जुन ने दिया था, जब उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय कामना की थी। उर्वशी ने कहा -‘तुमने मेरे प्रणय निमंत्रण को ठुकराया है। याद रखना, तुम किन्नर बनोगे।’ तब अर्जुन ने कहा था -‘देवी, नपुंसक बनना स्वीकार कर लूँगा, उस समय का भी कोई सदुपयोग हो जाएगा लेकिन मेरे चित्त में तुम्हारे प्रति वासना पैदा हो नहीं सकती।’ ये वो प्रामाणिक देश है जिसके देशवासियों ने अपने जीवनमूल्यों को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ जिया। आज कहाँ खड़े हैं हम? जीवन के प्रत्येक मोड़ पर मैं अपनों से पूछ रही हूँ - हम दुनिया को बदल रहे या हमको बदल रही है दुनिया।

आज पश्चिम का कितना बड़ा प्रभाव है हम पर। हमें भौतिकता के शिखर छूने हैं। हमें वस्तुएं चाहिए। दुनिया भूल गई हमको, लेकिन हम नहीं भूलते दुनिया को। पदार्थ चाहिए हमको? आश्रमों में सारा संसार आता है, ध्यान की गहराईयों में उतरने के लिए और भारत का कोई भी व्यक्ति बैठता है गोरी चमड़ी वाले के पास और पूछता है -‘कैमरा बेचोगे?’ कितना अन्तर है उस गोरे की दृष्टि हमारे ज्ञान पर, हमारे ध्यान पर और हमारी दृष्टि उसकी वस्तु पर। क्या हुआ? ये कैसा आकर्षण पैदा हुआ? क्या भारत के ऋषि उस युग को भारत के अन्दर नहीं लाये थे जब हम भौतिकता के शिखरों पर भी थे। मन की गति से चलने वाले विमान थे हमारे पास। उन युगों में भी हम उन्नति और प्रगति के शिखरों पर थे। ‘हिन्दू मिथक’ कही जाने वाली अनेक मान्यताओं का आश्रय भी अपने आधुनिक अविष्कारों के लिए वर्तमान युग के वैज्ञानिकों ने लिया लेकिन हमारे ही देश में अपनी परम्पराओं को गाली दी गई। अपने ही मुँह पर तमाचा मारने को प्रगतिशीलता कहा गया। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जहाँ आकर खड़े हैं वहाँ बड़ी विचित्र स्थिति है। हम दूसरों को देखकर सोचते हैं कि हम दुनिया के साथ दौडेंगे, लेकिन कभी लगता है कि हम ध्यान में उतर लें और कभी लगता है कि धन बटोर लें। जीवन दुविधा में है। स्पष्टता नहीं है।
आज इन स्थितियों पर आकर विचार करना बहुत प्रासंगिक है। स्वामी विवेकानन्द का स्मरण करते हुए हम अपने मूल्यों को स्पष्टता से देखें। विचार करें कि हमारा लक्ष्य क्या है? क्या स्त्री भोग्या है, कामिनी है, क्या उसको केवल अपने तन की सुन्दरता का ही ख्याल रहेगा? क्या तन नंगा और मन क्रूर हो जाएगा तो हम धन्य हो जाएंगे? चिन्तन तो करना चाहिए कि मेरे तन का नंगापन और मेरे मन की क्रूरता मेरी संतानों को कहाँ ले जाएगी? मेरे राष्ट्र को कहाँ ले जाएगी? मेरे समाज को कहाँ ले जाएगी? ये धन की भूख और ये भौतिकता की लालसा क्या मेरे घर को बिखरा तो नहीं देगी? क्या मुझे इसका चिन्तन नहीं करना चाहिए? हाँ, हम प्यार करते थे व्यक्तियों से और इस्तेमाल करते थे वस्तुओं का। अब हम प्यार करते हैं वस्तुओं से और इस्तेमाल करते हैं व्यक्तियों का। दोहन करो, शोषण करो, किसके साथ खड़े होने से लाभ होगा और किसके साथ बात करने से हानि हो जाएगी, यदि हमारे चिन्तन की यह धारा हो गई तो फिर समझ लीजिये कि कहाँ पहुँचेंगे हम।

    आप सोचोगे कि दीदी माँ तो अपनी बात ही निराशावाद से प्रारम्भ कर रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कभी-कभी स्वयं का पोस्टमार्टम करना भी जरूरी होता है। अपने चेहरे के रोग को पाऊडर से ढाँकना, ये कोई रास्ता होता नहीं। पहले रोग को स्वीकार किया जाए फिर उसका इलाज संभव होता है। रोग को अगर हम छुपाने की कोशिश करते हैं तो फिर वो लाइलाज बनता है। तो रोग क्या है? आत्महीनता रोग है। यही हमारी सबसे बड़ी रुग्णता है। अपने श्रेष्ठ के प्रति श्रद्धा का अभाव, ये रोग है। हाँ मैं मानती हूँ कि सामाजिक जीवन में फोड़े पैदा हुए। दुष्वृŸिायाँ आईं, कुरीतियाँ आईं। फोड़े का इलाज होना चाहिए ना? उसके लिए पूरे शरीर को खण्ड-खण्ड करके फेंका तो नहीं जा सकता ना? हमारी गुलामी के लंबे काल ने हमारे समाज को आत्महीन बनाया, यह सच है।

कभी-कभी चर्चा होती है श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की, कि क्यों हम गलियों की खाक छानते रहे। क्या हमें नहीं पता कि परमात्म सत्ता केवल एक मन्दिर तक ही सीमित नहीं बल्कि वो तो कण-कण में व्याप्त है? फिर क्या कारण था कि एक मन्दिर के लिए गाँव-गाँव और नगर-नगर भटक रहे थे हम लोग? वो मात्र एक मन्दिर का विषय नहीं था। वो भारतीय परम्परा के तेज और ओज तथा भारतीय स्वाभिमान, जो धुआँ बनकर उड़ रहा था आसमान में, को स्थापित करने का एक महा अभियान था। बुनियाद थी वो, जिस पर आज आप स्वाभिमान को भव्य भवन देख रहे हो। आज आप वो दिन देख पा रहे हो जब देश के प्रधानपन्त दुनिया में जाकर कहते हैं कि मेरे पास देने के लिए गीता से बढ़कर और कुछ नहीं है, और आपके पास गीता से बढ़कर पाने के लिए और कुछ नहीं है। इस दिन को देखने के लिए आँखें तरस रही थीं। क्या इतने थोड़े से समय में हमें नरेन्द्रभाई ने भव्य भारत दे दिया? लेकिन उसी दिन धन्य हो गई चित्त-चेतना, जिस दिन भारत माता का वो लाल काशी में गंगा के किनारे हाथ में दीप पकड़कर खड़ा हो गया। बाबा काशी विश्वनाथ के मन्दिर में उन्हें अभिषेक करते देखने के बाद छह घण्टों तक मेरी आँखों से अश्रुधारा बहती रही। मैंने अपने गुरुदेव से कहा -‘गुरुदेव, मैं थक गई रोते-रोते।’ वे बोले -‘ऋतम्भरा, आँखों ने वह दिन देख लिया जिसके लिए वर्षों से हम लोग गाँव-गाँव और गली-गली देशाटन कर रहे थे।’ लोग मुझसे पूछते थे कि आप क्यों भटक रही हो हिन्दुस्तान में? हम एक ही बात कहते थे कि बस एक ही चाह है:

लोकसभा बासन्ती चोला पहन के जिस दिन आएगी
गली-गली मेरे भारत की वृन्दावन बन जाएगी

अब हम सब मिलकर निश्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तब ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देश की दशा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निष्ठावान होकर अपने राष्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देश सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है। आप अंदाजा लगाकर देखो देवियों, देने में सुख है कि पाने में सुख है। आज के दौर में सब कहते हैं कि हमें अपनी तरह से जीना है। अरे भाई, ये अपनी तरह से जीने का अर्थ क्या है? मैं  विरोध नहीं करती प्रगति का, लेकिन कहाँ ले जाकर खड़ा करेगी ये स्वच्छंदता हमें? बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में पहुँचाएगी। संतानें ‘अवैध’ रूप से जन्मेंगी जिन्हें अनाथाश्रमों में पलना पड़ेगा। ये जो स्वच्छंदता है, घर के तिनके बिखेर देगी। माँ-पिता को लज्जित कर देगी और हम सुखी हो जाएंगे, यह संभव नहीं है।

    क्या है एक परिवार की संकल्पना? मेरा दिल जो कर रहा है उसमें पिताजी राजी हैं या नहीं?, और अगर उनकी रजामंदी है तो फिर जो मैं कर रहा हूँ, वह वास्तव में करने लायक है। यदि वे राजी नहीं हैं तो फिर मेरा मन ‘मनमुखी’ तरह से चल रहा है और वह कार्य करने लायक नहीं है, जिसे मैं चाह रहा हूँ। गुरुजनों को देखते हैं, बड़ों को देखते हैं, अग्रजों को देखते हैं, उनका कहा मानते हैं, यही तो है परिवारभाव। अब इस बात के लिये कोई राजी नहीं है कि जो बड़े कर रहे हैं हमें उसमें अपनी सहमति देनी है। महिलाएं कहती हैं कि हम घर में भले ही आया रख लेंगे लेकिन ये सासू जी का अनुशासन झेलने को तैयार नहीं हैं। अब स्थिति क्या हुई कि जो देश की संतानें हैं उनको बाईयाँ पाल रही हैं, जिनको दादियों और नानियों की गोद में पलना चाहिए था। संयुक्त परिवार की रसधार केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि दस व्यक्तियों से जुड़ी होती है। आज एकल परिवारों में रहने वाले पति-पत्नी में अगर कुछ गड़बड़ हुई तो कई बार उनमें से कोई एक पंखे से लटकता हुआ मिलता है क्योंकि दोनों को समझाने वाला कोई नहीं था। पहले कितने रिश्ते हुआ करते थे। पड़ोसी तक घर के किसी विवाद में बड़े ही अधिकारपूर्वक हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाला करता था। जीवन व्यर्थ नहीं लगता था। आज केवल एक के ही साथ चित्तवृत्ति अटक गई है। हमारे मूड के आन/आॅफ का स्विच ही किसी और के हाथ में होता है। हम कहते हैं ना कि हमारा मूड आॅफ है आज।

    कई बार लोग मुझे कहते हैं कि हम दिल से नहीं हँस पाते। मैंने कहा अरे भाई क्यों नहीं हँस पाते। भगवान ने इंसान को हँसने के लिए ही तो भेजा है दुनिया में। आप ये बताओ कि कभी किसी गधे को हँसते देखा है आपने? क्यों बोझिल होते हो आप? क्योंकि अहंकार की चट्टान छाती पर रखकर बैठे हो। अभिमान है - नाम का, धन का, पद का, प्रतिष्ठा का। बहुत ऊँचे शिखर पर भले ही पहुँच गए हो लेकिन जानते हो शिखर का सच? शिखर हमेशा अकेला होता है और अपने आप में जो अकेला होता है वह संसार का सबसे अभागा मनुष्य होता है। 

सौभाग्यशाली वह है जिसे विश्व की ख्याति मिल जाए तो भी वो अपने माँ-पिता के चरणों में आकर वैसे ही बैठे जैसे कोई नन्हा बच्चा अपने माँ और पिता का आँचल पकड़कर मचलता है। भारतीय चिन्तन को धारण करके क्या कभी उदासी आ सकती है मन में? नैराष्य कभी आ सकता है? हँसिए, मुस्कुराईये और इस बात को निश्चित कर लीजिये कि केवल अपने लिए ही नहीं जीना बल्कि अपनों के लिए भी जीना है। केवल अपनों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, जड़-जंगम सारा ब्रह्माण्ड अपना है यह भाव जिस दिन मन में आ गया उस दिन अपना संसार के सबसे सुखी मनुष्य होने का दर्जा प्राप्त कर लोगे।

अब हम सब मिलकर निष्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देष की दषा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निश्ठावान होकर अपने राश्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृश्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निष्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देष सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है।

साभार - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Wednesday, February 25, 2015

पूज्या दीदी माँ जी के जन्मोत्सव में भावविभोर अमेरिका

विगत दिनांक 4 जनवरी 2015 को परमशक्ति पीठ आॅफ अमेरिका के सदस्यों द्वारा पूज्या दीदी माँ जी का जन्मोत्सव मनाया गया। न्यूजर्सी के गाँधी मन्दिर में उनके 51 वें जन्मदिवस पर एक भव्य समारोह का आयोजन सम्पन्न हुआ। भारी वर्षा के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आयोजन में भागीदारी की। समारोह का शुभारम्भ निखिल रेवांकर, रिया रेवांकर, गंगोत्री भगत, अभिषेक भगत, समर्थ गुप्ता एवं ज्योतिन्द्र पटेल के स्वरों में सजी श्री गणेश वन्दना के साथ हुआ। गुरुवन्दना ने वातावरण को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का समापन पूज्या दीदी माँ जी के सन्देश के साथ हुआ।

परमशक्ति पीठ के माध्यम से मानवसेवा कर रहे अमेरिका के अपने सभी सहयोगी बंधु-भगिनियों के प्रति भारत से अपनी मंगलकामनाएं पे्रषित करते हुए उन्होंने अपनेे सन्देश में कहा कि -‘परमशक्ति पीठ, न्यूजर्सी अमेरिका की हमारी टीम जिनके माध्यम से आप सब लोग वहाँ पर एकत्रित हैं, मैं आप सबको बहुत-बहुत आशीर्वाद देती हूँ। मुझे बहुत आनन्द हो रहा है कि आप वहाँ अमेरिका में मेरा जन्मदिन मना रहे हैं और भारत में मेरे जन्मदिन पर लोगों ने चिन्तन किया कि दीदी माँ का जन्मदिन यानि क्या? इसका अर्थ है - वात्सल्य दिवस। वात्सल्य दिवस का अर्थ क्या है? हमें उन बच्चों को अपना वात्सल्य देना है जो इससे वंचित हैं। देश की बहुत सारी ऐसी नन्हीं बेटियाँ हैं जिन्हें श्रेष्ठ शिक्षा के साथ-साथ स्नेह चाहिए, संस्कार चाहिए, जीने का अधिकार और उसकी सार्थकता चाहिए।

इस अवसर पर श्री नीरज भगत, श्री मोहन खन्ना, श्री प्रमोद भगत, श्री वीरेन्द्र लाबरू, श्री दिनेश देसाई, श्री जयेशभाई पटेल एवं श्री शिव अग्रवाल, श्रीमती लीना गुप्ता, श्रीमती नलिनी खन्ना, श्रीमती सरिता गुप्ता, श्रीमती सुधा अग्रवाल, श्रीमती विद्या लाबरू तथा श्रीकांत गुप्ता सहित न्यूजर्सी के अनेक गणमान्य नागरिक इस भव्य आयोजन में सम्मिलित हुए।

न्यूजर्सी (अमेरिका)

Saturday, February 14, 2015

यह सम्मान मेरे गुरुदेव के चरणों में समर्पित है

आप लोगों ने बहुत भारी सम्मान मुझे दिया है, इस सम्मान के योग्य मैं नहीं हूँ। आपका यह सम्मान मैं अपने गुरुदेव पूज्य युगपुरुष स्वामी परमानन्द जी महाराज के चरणों में समर्पित कर रही हूँ। वे एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने व्यक्ति को केवल व्यक्ति नहीं रहने दिया बल्कि समष्टि बनाया है। उनकी शरण में जो भी आता है उसका ‘अहं’ ‘वयं’ बन जाता है। उनकी छत्रछाया में जो कुछ पल भी बैठ जाता है वो बिन्दु नहीं रहता, फिर वह सिंधु बन जाता है। जिसने भी उनकी वाणी को सुना वह मांस के पिण्ड में आबद्ध नहीं रहता, वह इन्द्रियों का दास नहीं बनता बल्कि ब्राह्मी चेतना के साथ जुड़ता है। वो सारी सृष्टि का होता है। हम अपने संन्यासकाल के दौरान निबड़ वनों में गुरुदेव के साथ विचरण किया करते थे। 

एकबार उन्होंने हमें संघ की शाखा दिखाते हुए कहा कि -‘देखो ऋतम्भरा ये लोग वो संन्यासी हैं जिन्होंने भगवा नहीं धारण किया। याद रखना, साधुता कभी भी वस्त्रों की मोहताज नहीं होती। वह तो बस स्वभाव होती है। स्वभाव में यदि परदुःख कातरता आ गई, स्वभाव में यदि साधुता आ गई, स्वभाव में यदि करुणा आ गई तो समझो कि जिंदगी सार्थक हो गई।’ उन्होंने मुझे कहा कि -‘ऋतम्भरा, ये हिन्दू जाति है। इसे कड़वी दवाई पिलानी पडे़गी। बहुत अपयश मिलेगा इस कार्य में। अमृतपान करने वाली जाति अपने ही देश में शरणार्थियों जैसा जीवन जी रही है, यह मैदान में खड़े होकर कहना होगा। 

अपने राष्ट्र और धर्म के रक्षणार्थ साधु को अवसर आने पर सिपाही भी बनना होता है। हो सकता है कि ऐसा करने के दौरान तुम्हें बड़े-बड़े धनवानों से दान-दक्षिणा भी न मिले। तुम्हें व्यासपीठों पर बैठाकर पूजन करने से भी समाज कतराएगा। दुनिया कहेगी कि ये विवादित लोग हैं। कुछ कहेंगे कि इनको राजनैतिक लिप्सा है। लेकिन एक बात स्मरण रखना कि इस देश में परिवर्तन होना है। मात्र सत्ता का नहीं बल्कि सोच का परिवर्तन होना है। क्या तुम ये काम करोगी?’ फिर मेरा वह संघर्ष शुरू हुआ जिसमें मेरे गुरुदेव मेरे साथ थे। देश के लगभग हर प्रांत में मेरे प्रवासों पर प्रतिबंध लगा। लेकिन अपने गुरुदेव के प्रताप के दम पर मैंने, उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में जहाँ जगह-जगह मुझपर प्रशासनिक प्रतिबंध लगाये गए थे, अनेकों राष्ट्रजागरण सभायें कीं। 

जाने कितनी रातें मैंने रेलवे प्लेटफार्मों और खेतों में बिताईं। हमारा आश्रम है छतरपुर में, वहाँ कई बार रातभर विधर्मियों द्वारा फायरिंग कर हमें भयभीत करने का प्रयत्न किया जाता। मेरे एक गुरुभाई थे बुंदेलखण्ड में उन्हें भी दुष्टों ने दस दिन तक धीरे-धीरे जलाकर मार डाला। गुरुदेव ने कहा कि ऋतम्भरा तुम डरना मत। मैंने कहा गुरुदेव मुझे कल्पवास करना है। इसलिए कुछ दिन प्रयागराज रहना चाहती हूँ। उन्होंने कहा -‘तुम कल्पवास क्यों करोगी?’ मैंने कहा -‘गुरुदेव में घूमते-घूमते थक गई हूँ, मुझे कल्पवास करना है।’ मैं शीश मुंडाकर प्रयागराज में गुरुदेव के पास थी। वहीं पर विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष श्री अशोक जी सिंघल गुरुदेव के दर्शनों के लिए आए तो मुझे कल्पवास करते देख बोले -‘अरे अगर साध्वी ऋतम्भरा कल्पवास करेंगी तो गुजरात का कायाकल्प कौन करेगा।’ 
    यह सुनकर गुरुदेव ने मुझसे कहा -‘ऋतम्भरा, शायद तेरी साधना पिछले जन्मों में हो गई होगी। जाने कितने कल्पवास किये होंगे तुमने, अब तो तुम्हंे गुजरात जाना है। जाओ, अपनी भूमिका निभाकर आओ।’ गुरुदेव की आज्ञा पाकर मैंने गुजरात में व्यापक जनजागरण किया। वहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ। लेकिन अपने गुरुदेव के निर्देशानुसार हम कभी भी राजनैतिक गलियारों में नहीं गए। हिन्दू को जगाते रहे और फिर बाद में चुपचाप सेवा के कार्यों में लग गए। मुझमें शुरू से ही लगता था कि मैं वात्सल्य से भरी हुई हूँ। कभी-कभी तो लगा कि मैं अपने गुरुदेव की भी माँ हूँ। मेरे उस वात्सल्य को पहचानकर गुरुदेव ने मुझे दिशा दी और यह बताया कि वास्तव में मेरा कार्य क्या है।

    एकबार हम मुंबई से चले तो मैंने गुरूदेव से कहा कि -‘गुरूदेव, मेरी इच्छा है कि हम लोग जालौन चलें। वहाँ पुराने संतों से मुलाकात हो जायेगी। दो दिन पहले ही वहाँ एक घटना घटी थी। मेरी एक गुरू बहन थीं वहाँ जो प्रिंसिपल थीं, उन्होंने विवाह नहीं किया था। शाम उन्होंने अपने घर के बाहर किसी के रोने की आवाज सुनी तो उन्हें लगा कि शायद बाहर कुत्ते को कोई भूखा बच्चा रो रहा है, चलकर उसे बे्रड के कुछ टुकड़े दे दूँ। जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि उनके घर की छत की पनाल के नीचे भरी बारिश में कोई नवजात शिशु को छोड़ गया था। उनका दिल हाहाकार कर उठा। लपककर उन्होंने उस बालक को उठाया, कपड़े से पोंछकर साफ किया। चाय बनाकर उसकी एक-एक गरम बूंद उसके मुख में डाली। रातभर जागकर इन्तज़ार करती रहीं कि कब सुबह हो उसे अस्पताल में छोड़ आऊँ। सुबह जैसे ही द्वार खोला तो सामने एक सन्त खड़े थे। जिनका नाम था स्वामी सुरेशानन्द जी महाराज। बड़े ही भजनानन्दी थे वे। वे मेरी उस गुरू बहन से बोले -‘अरे कहाँ ले जा रही हो इस बच्चे को? ये बिना वात्सल्य के समाप्त हो जायेगा देवी। ऐसी निष्ठुर मत बनों। वो बोलीं -नहीं महाराज जी, मैं पचास वर्ष की हूँ, इस बच्चे के प्रपंच में कहाँ पड़ूंगी।’ सन्त बोले -‘नहीं ये काम तुम नहीं करोगी और जो करेगी वो आएगी। मैं उसका इन्तज़ार करूँगा। और वे उस बच्चे को लेकर उसी घर के सामने बैठ गए।

    ऐसे वीतराग महात्मा ने किसी बालक को अपना लिया है यह चर्चा सारे गाँव में फैल गई। सब लोग इकट्ठा हो गए। भारत की भोली जनता हर चीज़ में चमत्कार देखती है। वहाँ पैसे चढ़ना शुरू हो गए। हमें उसी घर में जाना था, हम जिद करके गुरूदेव को वहाँ लेकर गए। वहाँ भीड़ लगी देखकर हमें भी कौतुक हुआ कि देखें वहाँ क्या हो रहा है। भीड़ में प्रवेश करके जैसे ही मैंने वहाँ देखने की कोशिश की महात्मा जी ने कहा -‘आओ ऋतम्भरा, मुझे तुम्हारी ही प्रतीक्षा थी। इस बच्चे को संभालो, अपना वात्सल्य प्रदान करो।’ मैं हतप्रभ थी! भला एक संन्यासी का बच्चे से कैसा रिश्ता? लेकिन अगले ही क्षण मैंने गुरूदेव की ओर देखा। लगा जैसे गुरूदेव कह रहे हों कि ऋतम्भरा अब यही है तुम्हारी भूमिका। ऐसे बच्चों को अपना वात्सल्य बाँटों, जिन्हें उनके अपनों ने त्याग दिया। इस यहीं से मेरी वात्सल्य यात्रा शुरू हुई थी।

    हम तो उपकरण मात्र है ईश्वर के। धन्य होते हैं हम, जब वे हमें अपने कार्य का निमित्त बना लेते हैं। आज इस अवसर पर मैं एक ही बात कहना चाहती हूँ कि मेरे अपने मेरे साथ सदैव रहे। बहुत थोड़ी सी शक्ति है उनकी। लेकिन उनका समर्पण वह परिणाम लाया जिसने वात्सल्य की सुन्दर सृष्टि खड़ी कर दी।

साभार - पूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी सम्बोधन, स्वर्ण जयंती अभिनन्दन समारोह, इंदौर
              दिनांक - 3 जनवरी, 2015

Friday, January 30, 2015

जीना इसी का नाम है...

सूरत के इस अद्भुत पर्व में जहाँ एक सौ ग्यारह बेटियों का विवाह सम्पन्न हुआ है इन ऐतिहासिक क्षणों की मैं साक्षी बनी हूँ। ईश्वर का इसके लिए बहुत-बहुत अनुग्रह चित्त में अनुभव कर रही हूँ। मन में बार-बार आ रहा था कि लोग बहुत बार जिंदगी में यह नहीं समझ पाते कि वे अपनी ऊर्जा को किस क्षेत्र में कैसे लगाएं। भाग्यशाली हैं हमारे महेशभाई सवानी जिन्होंने उन बच्चियों का हाथ थामा है जिन बच्चियों के सिर पर अपने पिता की छत्रछाया नहीं है। महेश जैसे व्यक्ति जब धरती पर जन्मते हैं तो बहुत सारे बच्चे उनको सनाथ होने का अहसास होता है। क्योंकि उनके साथ महेशभाई जैसे व्यक्ति पिता की भूमिका में आकर खड़े हो जाते हैं। मैं जब उनके जीवन को देखती हूँ फिर मुझे लगता है कि बहुत साल, कई साल नर्गिस अपनी बेनूरी को तरसती है बड़ी मुद्दत में पैदा होता है चमन में दीदावर पैदा। धरती धन्य होती है जब ऐसे पुत्र को पा लेती है। कुल धन्य होता है जब ऐसे पुत्र को पा लेता है। जब रजत तुला पर बैठाया गया मुझे तुलादान के लिये, तो मैं वल्लभभाई से कह रही थी कि आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे इतना सम्मान दिया। तो वो बोले कि आप अपने दीकरे को धन्यवाद दीजिये कि वो आपका पुत्र है। और पुत्र अपनी माँ कि लिये क्या नहीं करना चाहता।

महेशभाई ने मेरे साथ जो अपने भाव संबंध को स्थापित किया है वो अनिर्वनीय है। कदाचित धन से आप किसी का योगदान करो, अलग बात है। संस्थाओं को बहुत बड़े-बड़े योगदान बहुत धनपति करते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात होती है जब हम विचार के एक धरातल पर खड़े हो जाते हैं, तब संबंध स्थापित होता है। मेरा हृदय सदैव उन बच्चों के लिये द्रवित रहता है जो बच्चे अपनी मूल धारा से वंचित हो गये। समाज उनको अनाथ कहता है, बेचारा कहता है। अपनी ही संतानों को बेचारा बना देना! ये कहाँ शोभा देता है। जब इस देश में विश्वनाथ हैं, द्वारिकानाथ हैं, पशुपतिनाथ हैं तो फिर कोई अनाथ कैसे हो सकता है? महेशभाई सवानी जैसे जहाँ व्यक्ति हों। वहाँ कोई अकेेलेपन का दंश कैसे झेल सकता है? ये प्रेम-प्यार का प्रवाह, जो पर्व यहाँ स्थापित हुआ। मेंहदी की खुशबू उड़ी तो विश्व के कोने-कोने में पहुँच गई। विश्व रिकार्ड बन गया सूरत के इस क्षेत्र में।  सवानी गु्रप के कार्यकर्ताओं ने हाथ में झाड़ू लिया तो स्वच्छता का, पवित्रता का विश्व रिकार्ड बन गया।

जब कर्मठ लोग, उमंग से भरे लोग, उत्साह से भरे लोग कोई विषय अपने हाथ में लेते हैं तो सफलता उनके चरणों का चुम्बन करती है। महेशभाई वो व्यक्ति हैं जिन्होंने चुना, सद्भावना को चुना। बड़ा विचित्र है। दरवाजे पर तीन देवियाँ आकर खड़ी हैं और घरवाले से पूछ रही हैं कि हम स्वर्ग से आई हैं।  मेरा नाम समृद्धि है, दूसरी बोली मेरा नाम सफलता है और तीसरी बोली मेरा नाम सद्भावना है। लेकिन तेरे घर में एक ही आएगी। बता तू किसको अपने घर में बुलाना चाहता है? उसने सोचा जरा अपनी पत्नी से तो सलाह कर लूँ कि घर में किसको बुलाना चाहिये। पत्नी बोली तुम्हारी बुद्धि पर पत्थर पड़ गये हैं? अरे तुम्हारे दरवाजे पर समृद्धि खड़ी है और तुम आ गए मुझसे सलाह करने, समय बर्बाद कर रहे हो? जल्दी से समृद्धि को घर में बुलाओ। उसने अपने बेटे से पूछा कि बेटा तीन देवियाँ खड़ी हैं दरवाजे पर। बताओ घर में किसको बुला लें? तो बेटा कहता है कि पिताजी घर के अन्दर सफलता को बुला लीजिये। जहाँ हाथ डालेंगे सफलता ही सफलता मिलेगी। वारे-न्यारे हो जाएंगे। अब पिता सोच रहा है कि समृद्धि आई घर में और सफलता भी आई घर में लेकिन अगर घर में सद्भाव ही न रहा तो फिर समृद्धि और सफलंता सुखी नहीं करेगी। इसलिये वो दरवाजे पर खड़ा हो गया और तीनों देवियों में से सद्भावना की तरफ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। और कहता है कि मेरी प्रार्थना है कि सद्भावना मेरे घर के भीतर आ जाओ। जैसे ही सद्भावना उसके घर के भीतर आने लगी। तो सफलता और समृद्धि भी पीछे-पीछे आने लगीं। उसने कहा कि तुम तो कहती थीं कि तुम तीनों में से कोई एक ही मेरे घर के भीतर आएगी। तुम तो तीनों मेरे घर आ रही हो। तो वो बोलीं कि अगर तुम समृद्धि को चुनते तो अकेली समृद्धि ही तुम्हारे घर आती। तुम सफलता को चुनते तो अकेली सफलता तुम्हारे घर में आती। तुमने सद्भावना को चुना है। जहाँ सद्भावना होती है वहाँ समृद्धि बादलों की तरह बरसती है और सफलता चरणों का चुम्बन करती है। हमारे महेशभाई ने जीवन के उद्देश्य को सद्भाव के लिये अर्पित किया। सारे समाज को जोड़कर ये जो हिन्दू कन्याओं का विवाह मंत्रोच्चारणों से हो रहा था साथ-साथ इस्लाम की बेटियों का विवाह उनका निकाह पढ़ा जा रहा था। और मेरे हृदय में एक बात आ रही थी कि.… 

"एक ज्योत है सब दीपों में
सारे जग में नूर एक है
सच तो ये है इस दुनिया का
हाकिम और हुजूर एक है
हर मानव माटी का पुतला
जीवन का आधार एक है
गहराई तक जाके देखो
सब धर्मों का सार एक है
एक वाहे गुरु एक परमेश्वर
कृष्ण और रहमान एक हैं
नाम भले ही अलग-अलग हों
भगतोें के भगवान् एक हैं
नामरूप की बात छोड़ दो
इन्सानों की जात एक है
मन से मन की तार जोड़ लो
सीधी सच्ची बात एक ह"

इस एकात्मता का, इस आत्मीयता का, इस प्रेम का, इस मनुष्यता का, संवेदनाओं को बो देने का अद्भुत, अद्भुत ये पर्व है जिसमें आकर मैं धन्य हुई हूँ। और महेशभाई को, उनके पिताश्री को, उनकी पत्नी को, उनके पुत्रों को, उनके प्यारे-प्यारे भाईयों को, उनके कुटुम्ब को, कुल को और पी.पी.सवानी के पूरे गु्रप को, परिवार को, विद्यालयों की इस परम्परा को और विद्यालयों में शिक्षा अर्जित करने वाले उन विद्यार्थियों को, उन विद्यार्थियों को दिशादृष्टि देने वाले अध्यापकों को, सबको बहुत-बहुत साधुवाद देती हूँ। वो पति-पत्नी के संबंधों में जो यहाँ अन्तर्गुम्फित हुए उनसे भी निवेदन करना चाहती हूँ संबंध शरीरों का ही नहीं होता, संबंध तो मन का होता है।  जब दो शरीर एक मति गति बनती है तब दाम्पत्य जीवन प्रारंभ होता है। और ये दाम्पत्य युगों-युगों तक चले जब शरीर की वृद्धावस्था, जब शरीर को रोग घेर ले तब एक-दूसरे का सहयोग-साथ देना ये पति-पत्नी के बीच ही संभव हो पाता है। इसलिये एक-दूसरे के लिये अपने स्वभाव को बदलना, जैसे दो लोगों का पैर बांध दिया जाये तो कैसे चलेंगे? सन्तुलन बनाकर चलेंगे इसलिये स्त्री-पुरुष जब पति-पत्नी के संबंध में अन्तर्गुम्फित होते हैं तब एक-दूसरे की भावनाओं का कदर करके ही एक-दूसरे के मन को जीत सकते हैं। बहुत सारे आज हमारे दूल्हे जो हैं जिन्होंने अपनी पत्नी की माँग में सिन्दूर भरा है। माँग का सिन्दूर ही नहीं बनना, अनुराग का सिन्दूर बनना जरूरी है। जरूरी है स्त्री और पुरुष के बीच में बराबरी के धरातल पर खड़े होना। जो पति ‘डाॅमिनेट’ करते हैं सोचते हैं कि मैं अपने बल पर, पैसे के बल पर, अपनी बुद्धि के बल पर पत्नी पर कब्जा कर लूँ। वो शायद शरीर तो पाते हैं पत्नी का पर मन कभी जीत नहीं पाते। मन वही पाता है जो मन की भावनाओं की कदर करता है। जो झुकना भी जानता है, जो ऊँचा उठाना भी जानता है, जो एक-दूसरे के लिये आत्मसमर्पण करता है, वो अपना हो जाता है। और इस समर्पण की बेला में जब हमने अपनी बेटियों को अर्पित किया है ससुराल वालों के हाथ में, बहुत विचित्र है ये। जहाँ सुख भी है और चित्त के अन्दर दर्द भी होता है। दुःख तब होता है जब बेटा घर बाँटता है और दुःख तब भी होता है जब बाप अपनी बेटी को बाँटता है। ये दो क्षण बड़े विचित्र होते हैं। बड़े भावुक क्षण हैं ये। अपनी संतानों को दूसरे घर में रोप देना। एक पौधे को एक जगह से उखाड़ के दूसरी धरती पर रोपना। उस धरती पे वो पौधा तभी जमेगा जब स्निग्धता होगी, जब सींचा जायेगा वो, जब प्यार से संभाला जायेगा वो। इसीलिये नये वातावरण में, नये आवरण में और नई पहचान के साथ जब बेटी अपने बाप का घर छोड़ती है और ससुराल जाती है तो वहाँ अगर उसके साथ बेटी जैसा व्यवहार होता है तो उसके लिये इस संबंध को स्वागत करना सहज हो जाता है। इसलिये मैं यहाँ विराजमान सभी लोगों से निवेदन करना चाहती हूँ और हमारे उस सभी ससुराल पक्ष के लोगों से कि आप जिसको ले जा रहे हो बहू बनाकर वो बेटी है आपकी। और ईश्वर की कृपा से जब उसकी कोख में बेटी आए तो उस बेटी के प्रति उतना ही आदरभाव होना चाहिए जितना आपके हृदय में बेटे के प्रति होता है। उसे कोख से नोचकर कचरे की पेटी में फेंकने का कुत्सित जघन्य भाव भी आपके मन में आना नहीं चाहिए। देश के अन्दर कितनी बड़ी संख्या में बेटियाँ मारी जा रही हैं, इसका जिक्र मैं इस मौके पर करना नहीं चाहती। सम्भालना है, जन्म भी देना है और आसमान पर पहुँचाने का उसको साहस भी देना है। कदाचित् विपरीत परिस्थितियों में भी बेटियाँ अपना स्थान बनाती हैं।

"बोए जाते हैं बेटे, उग जाती हैं बेटियाँ
पढ़ाए जाते हैं बेटे, पढ़ जाती हैं बेटियाँ 
और ऐवरेस्ट की चोटी पर ढकेले जाते हैं बेटे
पर चढ़ जाती हैं बेटियाँ"

वो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए देश की बेटियाँ जब धर्म के लिये, अध्यात्म के लिये, समाज के लिये, राजनीति के लिये अपने आप को समर्पित करती हैं तो वो धरती का गौरव बन जाती हैं, देश का गौरव बन जाती हैं। इसीलिए वो बेटी जिसके लिये हमने दुर्गा कहा, भगवती कहा उसको कोख से नोच के कचरे की पेटी में फेंकना शोभा नहीं देता। लहलहाता है जीवन बेटियों से, तुम्हारे घर में तुलसी का बिरवा है बेटी, गंगा का प्रवाह है बेटी, गायत्री की गूंज है बेटी, माँ की पायल की रुनझुन है बेटी, पापा का आसरा है बेटी, चित्त का उजास है बेटी, हृदय का वात्सल्य है बेटी, घर की रौनक है बेटी, भारत का गौरव है बेटी।     गुजरात की बेटियों के लिये ये अद्भुत वातावरण है। यदि महेशभाई जैसे पिता मिल जायें तो भला कौन बेटी अनाथ रह सकती है? आप सबका वात्सल्य मिल जाये तो भला कौन हृदय रसहीन रह सकता है? आज मैं इस भावपूर्ण वातावरण में सवानी परिवार को बहुत-बहुत साधुवाद देती हूँ। आगे बढि़ये आकाश आपकी सीमा है। देश के गौरव को बढ़ाईये, गुजरात के गौरव को और सूरत के गौरव को आपने आसमान पर पहुँचाया है, विश्व के पटल पर पहुँचाया है।

    दुनिया अचंभित है इस दृश्य को देखकर। आपने जिसको जन्म नहीं दिया उसको विदा करते समय आपकी आँखों में आँसू आ जाना ये मनुष्यता का शिखर है। कदाचित् इतना भावपूर्ण अधिकार तो शायद जन्म देने वाला जनक भी नहीं देता जो महेशभाई ने इन बेटियों को दिया है। मैं बहुत-बहुत साधुवाद करती हूँ, मैं बहुत आनन्दित हूँ महेशभाई आप जैसा पुत्र मुझे मिला। मैं ऐसे बेटे को पाकर गौरवान्वित हूँ। और चाहती हूँ कि माँ भारती तुम महेशभाई जैसे बेटों को लाखों की संख्या में जन्म दो ताकि भारत में कोई बच्ची अकेली ना रह जाये, कोई बच्ची अनाथ ना रह जाये। मैं आप सबको इस मौके पर बधाई देती हूँ।

    दूल्हे के परिवार को, दुल्हन के कुटुम्बीजन और इस दृश्य के जो साक्षी बने हैं, मैं उनका भी साधुवाद करती हूँ। कदाचित्, आज सप्तपुरियाँ यहीं हैं, चारों धाम यहीं हैं, आसमान से देवगण इस दृश्य का दर्शन करके धन्य हो रहे हैं और धरती के पुत्रों पर ईष्र्या कर रहे हैं। वो देवजन मुझे कह रहे हैं दीदी माँ स्वर्ग में सारे सुख हैं, हम भोगते हैं उन सुखों को, पर धन्य हैं माँ भारती के पुत्र जो धरती पर अपने सुखों का त्याग करके मनुष्यता के लिये जीते हैं। उनके आँसू पोछते हैं इसलिये आज हम आसमान से ऐसे माँ भारती के पुत्रों का दर्शन करके धन्य हो रहे हैं। ये देवगणों की भावना मेरे हृदय में उतर रही है। मैं आप सबसे निवेदन करती हूँ कि

"आँसू पोछे नहीं किसीके
भला किसीका नहीं किया है
उसने श्वास किये हैं पूरे
केवल जीवन नहीं जिया है"

जिंदगी को जीना है तो किसी के होंठो पर मुस्कान लाकर देखिये। और उस मुस्कान पर अपनी जिंदगी को निसार करके देखिये। जीना इसी का नाम है। महेशभाई जिस तरह जी रहे हैं जीना इसी का नाम है। और हमें भी ऐसे ही जीना है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
30 नवंबर 2015, सामूहिक विवाह समारोह, सूरत, गुजरात

Tuesday, January 20, 2015

वृद्धों की सेवा हमारा नैतिक दायित्व

‘हमारे समाज में ऐसे कितने बच्चे हैं जो बड़े होकर अपने बचपन को याद करते होंगे? जब रातों को सोते समय हम अपने बिस्तर पर ही मल-मूत्र का त्याग करते थे। जब हमारी माँ ने न जाने कितनी रातों को हमारे मूत्र से बिस्तर के गीले हो उठे भाग पर स्वयं सोकर हमें सूखे में सुलाया होगा। हमारी एक खाँसी और छींक पर वह सारी रात सोई नहीं होगी। हमारे पिता ने हमारा भविष्य सुन्दर हो इसके लिए जाने कितना परिश्रम किया होगा।

    बहुत ही गहरी वेदना का विषय है कि आज समाज में एकाकी वृद्धावस्था के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। अपनी संतानों के लिये जीवनभर कष्ट सहने वाले माता-पिता जब असहाय अवस्था में वृद्धाश्रम की दहलीज पर ढकेल दिये जाते हैं तो मैं समझती हूँ कि जीवन का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कोई हो ही नहीं सकता। ऐसा करते हुए संतानों को यह जरूर सोच लेना चाहिए कि एक दिन उनकी भी यही हालत होगी। क्योंकि जो व्यवहार वे अपने माता-पिता से कर रहे हैं, उनके बच्चे भी वही व्यवहार उनसे करने वाले हैं। केवल अपने माता-पिता ही नहीं बल्कि हर उस बुजुर्ग का ख्याल रखिये जो अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता। उसकी सेवा-सुश्रुषा एक ऐसा पुण्यकार्य है जो लाखों यज्ञानुष्ठानों के बराबर फलदायी है। उनका आशीर्वाद जीवनभर साथ चलकर सुख-समृद्धि की मंजिल तक ले जाता है। आइये, नववर्ष में हमसब संकल्प लें अपने बुजुर्गों की सेवा का’
                                                                                                                        -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
वात्सल्य निर्झर, जनवरी 2015

Friday, September 26, 2014

राष्ट्र के लिये मोक्ष से भी अचाह हो जाने वाले भानु भैया

भानु भैया की उच्च वैचारिक स्थिति हमेशा जीवन का पथ प्रदर्शन करती है। जब उनकी बीमारी बहुत ही गंभीर स्थिति में पहुँच गई थी तो मैंने सोचा कि भैया को अपने गुरुदेव का आशीर्वाद दिलवा दूँ। मैं गुरुदेव के साथ उनसे मिलने पहुँची। मैंने कहा -भैया, महाराजश्री सिद्ध सन्त हैं, महापुरुष हैं तुम इनसे मोक्ष मांग लो। तुम उनसे मांग लो कि मैं आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाऊँ। भानु भैया ने यह सुनकर थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बन्द कीं और फिर मेरा हाथ पकड़कर बोेले - ‘माँ, तुम ऐसा क्यों कह रही हो? मेरी कोई इच्छा नहीं है मोक्ष लेने की या दोबारा जन्म न लेने की। मैं महाराज जी से मोक्ष नहीं मांग सकता क्योंकि अभी तुम्हारा काम भी अधूरा है और देश का काम भी। यदि देश का कार्य अधूरा है तो फिर मैं मुक्ति की कामना कैसे कर सकता हूँ। 

इसलिए मुझे तो दोबारा जन्मना ही है। मैं दोबारा ऐसी माँ की कोख से जन्मूँ जो पैदा करते ही मुझे त्याग दे और फिर मैं तुम्हारे पालने में आ जाऊँ। तुम्हारी गोद में खेलूँ। वात्सल्य ग्राम में ही रहकर बड़ा हो जाऊँ और फिर तुम्हारे भी अधूरे कामों को पूरा करूँ और देश के भी। इसलिये मैं मुक्ति की कामना नहीं कर सकता।’ यह सुनकर मैं भैया को देखती ही रह गई। मेरे नेत्रों से अश्रु ऐसे झरने लगे जैसे सावन में बादल झरते हैं। बहुत ही भावुक करने वाला दृश्य और समय था वह। राष्ट्रवाद की इतनी तीव्र उत्कंठा कि कोई मोक्ष की कामना भी छोड़ दे, यह केवल भानु भैया जैसे व्यक्तित्व के भीतर ही हो सकता है। धन्य है उनका जीवन जो आज भी देशवासियों के लिये प्रेरणा है। आज उनके पुण्य स्मरण दिवस पर मैं उनको अपने हृदय की गहराई से याद करते हुए अपने श्रद्धासुमन अर्पित करती हूँ।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
साभार - वात्सल्य निर्झर, सितम्बर 2014 

Friday, February 28, 2014

हमने क्या दिया इस जगत् को ?

मैंने लोगों को अक्सर यह कहते सुना है कि ‘हमने देश को, समाज को, लोगों को ये दिया, वो दिया लेकिन उसके बदले में हमें क्या मिला।’ परमार्थ के कार्य करने वालों तक को इस सोच से ग्रसित पाया गया है। प्रतिफल की चाह रखने वाली यह छोटी सी सोच उस कार्य के महत्व को गौण कर देती है, जो शीर्षस्तर का होता है। संस्था के किसी कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में ‘मेरा नाम नहीं छपा या मंच पर से मेरा नाम नहीं लिया गया’ मन की यह हीन भावना अनेकों कर्मठ कार्यकर्ताओं को भी उनके पथ से विचलित कर देती है। इन सब बातों पर विचार करते हुए कभी स्वयं को अपनी उस आत्मा के सामने खड़ा करना चाहिए जो सच्चाई का दर्पण है। हमने जो सद्कार्य किया उसकी प्रशंसा दूसरों से ही हमें क्यों मिलनी चाहिए? क्या हम कभी चुपचाप अपने अन्तर्मन में स्थित रहकर अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं कर सकते? ऐसी प्रशंसा जिसमें कोई अहंकार न हो, केवल अपने उस सद्कार्य के प्रति भावविभोर होकर क्या हम कभी प्रभु के सम्मुख नतमस्तक नहीं हो सकते, जिन्होंने हमें उस कार्य के लिए चुना? हमारा अहंकार ही हमारे भीतर यह भाव पैदा करता है कि ‘हमने यह किया’ या ‘हमने वह किया।’ यही अहंकार हमें कर्ता के रूप में खड़ा करता है और इसीके फलस्वरूप हमें अपने सम्मान की चाह उत्पन्न होती है। जो न मिलने पर जीवन घोर कुण्ठा के गर्त में जा गिरता है।

हम यह क्यों नहीं मानते कि करवाने वाला तो परमात्मा है, हम तो केवल उसके साधन भर हैं। हमें यह भी सोचना होगा कि क्या अपने किसी कार्य की वाहवाही लूटने वाले अपने यश को हमेशा कायम रख सके या फिर प्राणिमात्र के कल्याण के लिए निःस्वार्थ अपना जीवन तक दे देने वालों की यशगाथा अमर है। यह विचार करते हुए जब हम अपने गौरवशाली इतिहास मे झाँकंेगे तो निश्चित रूप से यह तथ्य सामने आएगा कि यश उनका ही अमर है जिन्होंने लाभ-हानि की चिन्ता किए बगैर केवल लोकहित को ध्यान में रखकर अपना सर्वस्व न्यौछावर किया।    

हर समय आनन्दमय रहने वाले देवलोक में चारों ओर अंधियारा छाया हुआ था। अप्सराओं के नृत्य से जगमग रहने वाले देवराज इन्द्र के दरबार में सन्नाटा पसरा हुआ था। देवगण आदि कहीं दिखाई नहीं देते थे। कारण था घनघोर तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्तकर दैत्यराज ‘वृत्रासुर’ का सम्पूर्ण देवलोक पर बलपूर्वक अधिकार कर लेना। महान् बल तथा पराक्रम वाले उस असुर ने चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर तथा यम के अधिकारों को छीनकर एक प्रकार से तीनों लोकों पर ही एकधिकार प्राप्त कर लिया था। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। वृत्रासुर निरंकुश होकर अत्याचार कर रहा था। देवराज इन्द्र ने त्रसित होकर बृहस्पति जी के निर्देशानुसार ब्रह्माजी से प्रार्थना करके यह रहस्य जाना कि वृत्रासुर की मृत्यु महर्षि दधीचि की अस्थियों के द्वारा निर्मित किये गए वज्र के प्रहार से ही हो सकती है। देवराज इन्द्र अपने समस्त देवताओं के साथ महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे जहाँ वे साधना में लीन थे। अपने दोनों हाथ जोड़कर इन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया। महर्षि ने भी अपने आसन से उठकर उनका अभिवादन किया एवं ससम्मान उन्हें उचित स्थान पर विराजित करवाकर समस्त देवताओं के साथ उनके वहाँ पधारने के प्रयोजन को जानना चाहा -‘कहिये देवराज, आपको स्वयं चलकर यहाँ क्यों आना पड़ा, मुझे बतलाइये?’ देवराज इन्द्र ने निवेदन किया -‘हे मुनिश्रेष्ठ, ब्रह्माजी की तपस्या के फलितार्थ उनसे वरदान पाकर वृत्रासुर नामक एक राक्षस हम लोकपालों को जीतकर स्वयं त्रिलोकेश हो गया है।
   
मुनिश्रेष्ठ! हम सभी देवतागण उसके भय से स्वर्ग छोड़कर मनुष्यों की भाँति इस मृत्युलोक में निवास कर रहे हैं। मैं न तो यज्ञभाग प्राप्त कर पा रहा हूँ और न कोई हमारी पूजा ही कर रहा है। इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त हुआ मैं आपसे और कुछ क्या कहूँ। आप ही कृपा करके यदि देवताओं का उद्धार करें, तभी दुःखरूपी सागर में निमग्न हम देवताओं का उद्धार हो सकेगा, आप ही हमारे उद्धारक हैं।’

दधीचि बोले -‘जो हो चुका है और जो आगे होगा, वह सब मैं अपनी विशिष्ट विज्ञानरूपी नेत्रों से जान रहा हूँ। इन्द्र! मुझे क्या करना है, वह मुझे बताइये।’ देवराज ने कहा -‘ब्रह्मान्! मैं क्या कहूँ! मुझे बड़ा भय लग रहा है। महामुने! मैं जिसके लिये आपके पास आया हूँ, उसे सुनिये। ब्रह्माजी ने उस वृत्रासुर की मृत्यु किसी अन्य प्रकार से निश्चित नहीं की है, अपितु आपकी अस्थियों से बनाये गये अस्त्रों से ही उसकी मृत्यु सम्भव है। इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! जिसके लिये मेरा आगमन हुआ है, वह सब मैंने आपको बता दिया। अब जैसा उचित हो, वैसा आप विचार करें।’

देवराज इन्द्र के ऐसा कहने पर मुनीश्वर दधीचि विचार करने लगे कि क्या मैं इनको निराश करके लौटा दूँ अथवा जगत् कल्याण के लिये अपनी देह का त्याग करूँ। इस प्रकार दुविधा में पड़े हुए महामति दधीचि ने अन्त में देह त्याग का निश्चय करते हुए इन्द्र से कहा -‘देवराज! यदि राज्य से च्युत देवतागण मेरी अस्थियों के द्वारा महान् असुरराज वृत्र से छुटकारा पा सकते हैं तो मैं अवश्य ही योगबल से अपना यह शरीर त्याग दूँगा। उसी प्राणी का शरीर धन्य है, जिसका उपयोग दूसरे के सुख के लिये हो। यह शरीर तो अनित्य है और धर्म ही नित्य है। अतः मैं इस शरीर का त्याग कर रहा हूँ।’ ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि ने योग के द्वारा अपने तेज से अत्यन्त दैदिप्यमान अपने शरीर को देवराज इन्द्र के सामने ही त्यागकर मोक्ष को प्राप्त किया।

    यह देखकर देवराज इन्द्र बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए ‘लौकिक विषयों की कामना करने वाले हम देवताओं को धिक्कार है’ इस प्रकार स्वयं की निन्दा करते हुए अत्यन्त विषादपूर्ण स्थिति में बहुत समय तक वहीं पर खड़े रहे। तत्पश्चात् इन्द्र ने बहुत ही आदरपूर्वक उनकी अस्थियों को ग्रहणकर उनके द्वारा वृत्रासुर के वध के लिए अनेकों प्रकार के अस्त्र बनवाये। तदन्तर सफल पराक्रम वाले, प्रचण्ड धनुर्धर, देवताओं के नायक इन्द्र उस महान् असुर वृत्रासुर के पास अपनी समस्त देवसेना के साथ गए और उसे युद्ध के लिये ललकारा। वृत्रासुर और देवताओं के साथ उस भयंकर युद्ध में इन्द्र ने दधीचि जी की अस्थियों से बने वज्र और अन्य अस्त्रों द्वारा वृत्रासुर पर भयंकर प्रहार किए जिसके कारण वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                     सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, फ़रवरी 2014 

Wednesday, November 20, 2013

वात्सल्य धारा से तृप्त होते जीवन...

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी लगातार इसी क्षेत्र में रहकर पीडि़तों के आहत दिलों पर अपनी करुणा का मरहम लगाने का सतत् प्रयत्न कर रही हैं। पूरी केदारघाटी में जगह-जगह अभी भी मार्ग पूरी तरह से सुगम नहीं हुए हैं। भूस्खलन का खतरा निरन्तर बना हुआ है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी वे यहाँ संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों’ को अपना पावन मार्गदर्शन देकर यहाँ के लोगों को इस दुखद घटना से उबारने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं। अपनों को खोने का दर्द अव्यक्त होता है। अपने किसी प्रिय का अचानक दुनिया से चले जाना तोड़कर रख देता है।

रूद्रप्रयाग जिले की पहाडि़यों में बसा एक छोटा सा गाँव है - सेमी। 16 जून को बरसी आसमानी आफत ने सारे गाँव को खंडहर करके रख दिया। खेती और चारधाम यात्रा संबंधी छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े यहाँ के निवासियों ने पाई-पाई जोड़कर अपने घर बनाए थे जो घर तो अब भी दिखते हैं लेकिन रहने लायक नहीं रहे। घनघोर बारिश के बाद इस पूरे गाँव की जमीन ही अपने आप नीचे की ओर धंसने लगी। देखते ही देखते दरकते मकान उनमें रहने वालों के सपने भी चकनाचूर कर गए। दुःख की बात तो यह है कि शासकीय तौर पर ऐसे घरों को पूर्णतया नष्ट नहीं माना गया है इसलिए राहत राशि भी उतनी नहीं मिली। मरम्मत की राहत राशि से भला चित्र में दिखाई दे रहे मकान को क्या रहने लायक बनाया जा सकता है? बहरहाल, पास आते जा रहे भीषण ठण्ड के मौसम की डरा देने वाली आशंकाओं के बीच इस गाँव के लोग टेण्टों में रहने को विवश हैं। वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ के ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ ने इस गांव की पीड़ा को अनुभव किया और उनके बीच सभी आवश्यक राहत सामग्री का वितरण किया। गाँव के प्रधान बताते हैं कि वात्सल्य सेवा केन्द्र के माध्यम से हमें केवल सहायता ही नहीं बल्कि इस मुसीबत से लड़ने की शक्ति भी मिली है।

त्रियुगीनारायण - उत्तराखंड के अतिप्राचीन स्थानों में से एक। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान शिवशंकर एवं माता पार्वती का विवाह हुआ था। हजारों वर्ष पुराना यह स्थान रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड त्रासदी की
रात को यहाँ के निवासियों ने सैकड़ों तीर्थयात्रियों को भोजन-पानी और आश्रय देकर उनकी प्राणरक्षा की। यहीं पर रहने वाले पेशे से ड्राइवर ललितप्रसाद किसी शारीरिक बीमारी के दौरान हुए इलाज में किसी दवाई के दुष्प्रभाव से इनके दोनों पैर अशक्त हो गए। वे बिना किसी की सहायता के एक कदम भी नहीं चल सकते। दुर्भाग्य ने यहीं पीछा नहीं छोड़ा। जंगल में अचानक आग लगी और वहाँ घास लेने गई पत्नी की झुलसने से मृत्यु हो गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र के इस पिता के पास गुजारे का कोई साधन न था। जैसे तैसे गाँव वालों की कृपादृष्टि से बस जीवन चल रहा था। उत्तराखंड त्रासदी के बाद दीदी माँ जी के पावन मार्गदर्शन में वहाँ राहत कार्य आरंभ हुए। ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों के कार्यकर्ता भाई-बहन जब त्रियुगीनारायण पहुंचे तो वहाँ उनकी मुलाकात ललितप्रसाद से हुई। जब उन्हें बताया गया कि ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए वात्सल्य सेवा केंद्रों में रहने और स्कूली शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की गई है तो वे अपनी दोनों बेटियों को वहाँ भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। ये दोनों बच्चियां इस समय केदारनाथ मार्ग स्थित ग्राम कोरखी में संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ में रहकर अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। पुत्र की स्कूल फीस भी संस्था ही वहन करती है। ललितप्रसाद बहुत ही कृतज्ञ भाव से कहते हैं कि -‘मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर बहुत चिंतित था कि कैसे इनकी पढ़ाई-लिखाई होगी लेकिन दीदी माँ जी की कृपा से आज वे दोनों अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी ग्रहण कर रही हैं। मैं तो आजीवन उनका ऋणी रहूँगा।’ उनकी दोनों बेटियां शिवानी और काजल यहाँ रह रहे सब बच्चों के साथ बहुत खुश हैं। पहले की तरह अब उन्हें अपने घर की याद नहीं आती। पांचवी और चैथी कक्षाओं में अध्ययनरत् ये दोनों बच्चियां दीदी माँ जी का स्नेहिल प्यार पाकर अभीभूत हैं।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
  सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Saturday, November 16, 2013

प्रकृति में प्रवेश करें, प्रहार नहीं

भगवान केदारनाथ की तपस्थली जहाँ पल-प्रतिपल देवत्व की अनुभूति होती है ऐसी पावन धरा पर आकर जीवन अपनी धन्यता को अनुभूत करता है। देवभूमि उत्तराखंड जाकर मैंने इस संभावना को तलाशा कि हम वहाँ के आपदा प्रभावित माताओं और बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं। निश्चित रूप से पूरा विश्व उत्तराखंड में आई इस आपदा के कारण मानसिक रूप से उद्वेलित हुआ है। मदद के लिए चाहे कोई आ पाया हो या नहीं लेकिन इस संकट को सबने अपने मन में एक घोर कष्ट के रूप में अनुभव किया। मुझे लगता है कि प्रकृति तो माँ है। वो सबका भरण-पोषण करती है, लेकिन जब हम अपनी सीमाओं से बाहर जाते हैं तो जैसे माँ अपने बच्चे की किसी गलती पर उसे तमाचा मार देती है ना, बस वैसा ही कुछ इस त्रासदी में प्रकृति ने हमारे साथ किया है। जब मैं आपदा के तुरन्त बाद पहली बार उत्तराखंड गई थी तब मंदाकिनी मैया से मैंने मन ही मन कहा कि -‘हे माँ तुम तो वात्सल्यमयी हो ना, अपनी संतानों पर वात्सल्य लुटाने वाली? तुम तो वात्सल्य का मर्म हो ना? तुम्हीं तो प्राण हो, तुम ही तो प्रेरणा हो। तुम देवभूमि का उत्सव हो माँ। फिर तुम क्रोधित क्यों हुईं? तुमने इतना विकराल रूप क्यों दिखाया कि तुम्हारी अपनी संतानें तुम्हारे प्रबल प्रवाह में पत्तों की तरह बह गईं? ऐसे बहुत सारे उद्वेलन भरे प्रश्न मन में थे। उत्तर कहाँ से तलाशेंगे? यदि हमारे मन में कहीं विचलन है तो उसका समाधान भी हमें ही खोजना होता है।

हम यदि गंभीरतापूर्वक अनुभव करें तो पाएंगे कि भूमि के कंकर-कंकर में शंकरत्व समाया हुआ है। जैसे देवों के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। माता-पिता के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। उसी प्रकार का व्यवहार प्रकृति माता के साथ भी किया जाना चाहिए। माँ के स्तन से दूध पीना शोभा देता है परन्तु माँ के स्तन से उसका रक्त पीना एकदम अशोभनीय है। यह बात सारे संसार के लिए पाथेय है। हजारों वर्ष पहले के भारतीय ऋषियों ने ईश्वरीय सत्ता से केवल मानवता के लिए ही नहीं बल्कि वनस्पतियों, औषधियों और अंतरिक्ष तक के लिए शांति मांगी थी। इसका मतलब यह है कि युगों पहले भारतीय संस्कृति के संवाहक ऋषियों को यह दृष्टि थी कि एक समय वह भी आएगा जब केवल धरती ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष की शांति भी भंग हो जाएगी। इसीलिए उन्होंने चारों ओर शांति के लिए प्रार्थना की। जब धरा मनुष्य की फेंकी हुई गंदगी से त्रस्त हो जाएगी। जब औषधियां भी विषाक्त हो जाएंगी। ऐसे समय में केवल शांति की आवश्यकता होगी। उस शांति की कामना भारत के ऋषियों ने की थी। यह कैसे संभव होगा! इसके लिए अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य चाहिए। इस सामथ्र्य को पैदा करने के लिए जीवन में साधना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर साधना करनी होगी।

प्रकृति परमेश्वर है उसे पाना है तो उसमें प्रवेश करना होगा। प्रहार करने से वो आहत होती है। हमने प्रहार किया वृक्षों पर, हमने पर्वतों को नोंच डाला अपने क्षुद्र स्वार्थों के कारण। प्रकृति कभी बदला नहीं लेती बल्कि हम ही अपने दुष्कर्मों को त्रासदियों के रूप में भोगते हैं। ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ केवल कहावत नहीं प्रासंगिकता है। हम जो भोग रहे हैं उसे हमने ही निमंत्रित किया है। किसी भी अनहोनी से बचने के लिए हम सदा परमात्मा को पुकारते हैं। लेकिन प्रकृति में छुपा परमात्मा क्या उस पर प्रहार करने से मिलेगा? नहीं, उसे पाने के लिए हमें उसमें प्रेमपूर्वक प्रवेश करना होगा। प्रवेश की यह सुन्दर प्रक्रिया फिर विनाश का कारण नहीं बनेगी अपितु हमें उस विराट का एक हिस्सा बना लेगी जिस पर हमारा जीवन निर्भर है।

अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य हमें शंकर बनाती है। जबसे मैंने देवभूमि के दिव्य आभामंडल में प्रवेश किया है तब से मन से यह बात निकलती है कि आप उत्तराखंडवासी इतनी भयानक विपत्ति के समय में भी अपने भीतर स्थित रहे। मौत के इस तांडव को अपनी आँखों से देखने के बाद भी उनका विवेक बना रहा। यही धर्म का प्रसाद है कि हम घोर संहार के बीच में भी जो अविनाशी तत्व है उसका दर्शन करें। धर्म दृष्टि देता है कि जब सब कुछ मिटने वाला नाशवान है तो फिर हम पदार्थों के पीछे पागल क्यों हों। लोग कहते हैं कि महानगर तो केवल पदार्थों की ही दुनिया है। लेकिन भारत का गौरवशाली अतीत पदार्थों के पीछे नहीं भागा था। परमात्मा के लिए, प्रेम के लिए, प्रीत के लिए, सेवा के लिए, करुणा के लिए, असहायों का हाथ पकड़ने के लिए उस भारत के मन में भाव था। हम पैसे या पेट के लिए नहीं पैदा हुए। ये जो देवभूमि है वह सारे संसार के आकर्षण का केन्द्र है। जब सारा संसार पदार्थों के पीछे भागते-भागते थक जाता है तब वह शांति की तलाश में इसी देवभूमि पर आता है। लेकिन क्या वह यात्री भाव से आता है? नहीं, वह केवल मनोरंजन के लिए आता है। उसकी वह तथाकथित शांति केवल ‘इंटरटेनमेण्ट’ है। जिस देवभूमि में तीर्थयात्री भाव से आना था उस पर वह केवल मनोरंजन के भाव से आता है। यहाँ आकर तो मन का भंजन हो जाना चाहिए, यहाँ आकर तो ‘अ’ मन हो जाना चाहिए। यह वह भूमि है जहाँ मेरे शंकर का परिचय है जो ‘अ’मन के लिए रहता है और विवाह करता है। मेरे शंकर ऐसे हैं जो नैतिकता के लिए पत्नी का त्याग कर सकते हैं। मेरे शंकर अपनी पत्नी का शव लादकर सृष्टि में दौड़ सकते हैं। मेरे शंकर तो ऐसे हैं जो अपने ही दोषों को संहार कर सकते हैं। मेरे शंकर तो खतरों का श्रृंगार कर सकते हैं। मेरे शंकर सारे संसार का विष पी सकते हैं। मेरे शंकर तो घोर अभावों के बीच भी जी सकते हैं। मेरे शंकर और उनका शिवत्व कभी नष्ट नहीं होता। इसी शिवत्व का दर्शन करने के लिए सारा संसार एक आकर्षण में बंधकर इस देवभूमि पर आता है।

इस भूमि पर विराजमान शिव एक असाधारण शक्ति हैं। वो मात्र पदार्थों या वासना के लिए नहीं जीते। हम सबका यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है कि हमारी यह देवभूमि ‘देवभूमि’ बनी रहे। हम दुनिया को बदलेंगे। अगर दुनिया ने हमको बदल दिया तो हमारी परंपरा, हमारी मान्यताएं, हमारी शांति और आनन्द वह तो फिर सब नष्ट हो जाएगा। अभी तो उल्टा हो गया। हमने दुनिया को बदलना था लेकिन दुनिया ने हमें बदल दिया! हम पदार्थों के पुजारी हो गए! निश्चित रूप से प्रकृति या परमात्मा के द्वारा प्राणियों को जो चोट पहुँचाई जाती है वो नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि कुछ नया आकार देने के लिए होती है। जैसे बच्चे में कोई दोष आ जाए तो माता उसे थोड़ा सा दण्ड देकर सुधारती है, मैं इस दृष्टि से उत्तराखंड की इस प्राकृतिक आपदा को देखती हूँ। घोर विपति के इस समय में मैंने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों के घरों में जाने का प्रयास किया। मैंने देखा कि यहाँ मातृशक्ति के पसीने से ही यह देवभूमि हरी भरी है। मन करता है कि मैं देवभूमि की माताओं का वंदन करूं।

घर में चूल्हा जला, मवेशियों को चारा मिला, तुमने खेतों को अपने पसीने से सींचा, तुमने संतानों को भी संस्कार दिया। हे माँ, जब मैं तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि मैंने साक्षात् पार्वती माता का दर्शन कर लिया। वो अम्बा, वो जगदम्बा जो अपनी संतानों के लिए श्रम का पसीना बहाकर अपने मकान को ‘घर’ बनाए, मैं उसका दिल से अभिनन्दन करती हूँ। तेरे कारण ही तो मंदिरों के दीप जगर-मगर होते हैं माँ। तेरी साधना अविरत है माँ। वह तो एक नदी की तरह सतत् प्रवाहमान है। तुम्हारी संतानों को देवत्व मिले ये जिम्मेदारी तुम्हारी है। परिस्थितियों से घबराकर असहाय हो जाना शंकर के भक्त जानते ही नहीं हैं क्योंकि घोर अभावों के बीच भी वे अपने आप में स्थित रहने की कला जानते हैं। इसलिए इस समय हमारे लिए जो करणीय है वो हमें करना चाहिए। चिंतन करना चाहिए और उसी चिंतन के मंथन में से अमृत निकलेगा ये बात निश्चित है।

अगर हम शंकर नहीं बने तो क्या हुआ। अरघे के ऊपर नहीं बैठ सके तो क्या हुआ? लेकिन अरघे तक भक्तों जो सैलाब उमड़कर जाता है यदि उन सीढि़यों के कंकर बनने का अवसर भी यदि मिल जाए तो यह भी एक बहुत बड़ा सौभाग्य है। कौन ऐसा शंकर है जो कंकरों मंे से पैदा नहीं होता? क्योंकि कहा भी गया है कि ‘पत्थर जो चोट खा कर टूट गया, कंकर बन गया और पत्थर जो चोट को सह गया वह शंकर बन गया।’ इसलिए परिस्थितियों की चोटों के बीच भी हमें हमारे अस्तित्व, हमारी परंपराओं, हमारी मान्यताओं को शुभ और शिव के साथ जोड़े रखना है। मैं उत्तराखंडवासियों के बीच बैठकर यह अनुभव करती हूँ कि मुझे सहज रूप से वहाँ के नन्हें बच्चों और माता-बहनों के उत्कर्ष के लिए कार्य करना है। वृंदावन के वात्सल्य ग्राम में भी हमने इन्हीं भाव संबंधों पर कार्य किया और एक बड़ा वात्सल्य परिवार बनाया। जिनका कोई नहीं था उन सबको मिलाकर एक अद्भुत परिवार बन गया। हमने कोशिश की है कि हम उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों के लोगों तक अपने सेवाकार्यों को पहुंचा सकें। देवभूमि में पवित्रता पाने के लिए आया जाता है, कुछ देने के लिए नहीं। इसलिए हम अपनी सेवाएं भी इसी भाव के साथ यहाँ समर्पित कर रहे हैं। अपनी सेवाओं के बदले हम सब लोगों को यहाँ की पावनता और शुचिता का प्रसाद मिल सके, यही भाव है परमशक्ति पीठ का। उत्तराखंड की बहनों की आँखों से बहे आँसुओं ने मुझे बहुत भीतर तक द्रवित किया। मैं भूल गई कि मैं एक संन्यासिनी हूँ। मैंने केवल एक साधारण स्त्री के दर्द को अपने अन्दर महसूस किया। मैंने अपने गुरुदेव से कहा कि उत्तराखंडवासी बहनों के आशुओं के प्रवाह में मेरे विवेक का बाँध टूट गया। मैं एक सामान्य स्त्री के धरातल पर आकर खड़ी हो गई। उनकी वो पीड़ा मेरी आँखों से मंदाकिनी के प्रवाह की तरह बहती रही। मैं भी एक स्त्री हूँ, मैं भी एक माँ हूँ, मैं भी दीदी हूँ। मैं यह जानती हूँ कि जब मन का दर्द बहुत ज्यादा हो जाता है तो मनुष्य को स्वयं ही उसकी दवा भी बनना पड़ता है। बहुत सारे दुखद दृश्यों को यहाँ आकर देखना पड़ा। लेकिन अपने पैरों पर खड़ा ही एक मार्ग है। किसी दूसरे की ओर आशा से देखना स्वाभिमानशून्यता है। किसी दूसरे पर निर्भर होना भारत के किसी भी बच्चे और स्त्री को शोभा नहीं देता। हम अपनी विषम परिस्थितियों से निकलकर स्वयं ही अपने पैरों पर खड़े होंगे, हमें यह निश्चय करना है। भारत को यही निश्चय चाहिए। तात्कालिक परिस्थितियां ज़रूर कभी-कभी ऐसी होती हैं कि वो बड़े-बड़ों को हाथ फैलाने पर विवश कर सकती हैं लेकिन बहुत लंबे समय तक ऐसा नहीं रहना चाहिए। हम यदि गिरें तो भले ही किसी का हाथ उठने में हमारी सहायता कर दे लेकिन फिर आगे का सफर हमें अपने कदमों पर ही तय करना चाहिए। सहायता भी एक सीमा तक ही लेनी चाहिए। नहीं तो सहायता लेते ही रहना हमें अकर्मण्य बना देता है। यहाँ उत्तराखंड में वात्सल्य का हमारा यह कार्य यहाँ के लोगों को त्रासदी से उबारकर अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए ही चलाया जा रहा है। निश्चित रूप से यह ईश्वर की किसी बड़ी योजना का ही एक हिस्सा होगा क्योंकि हम सब तो उनके हाथों की कठपुतली भर हैं। उन्हें हमसे जो करवाना है वह उसे हमें अपना निमित बनवाकर कर लेते हैं।

यहाँ वे सारे लोग जिनको इस त्रासदी में फंसकर अन्त्येष्टि की आग भी नसीब नहीं हुई, जो मंदाकिनी मैया की धार में बहे या फिर पहाड़ों के नीचे दब गए मैं उन सबको अपनी करुणा का अघ्र्य अर्पित करती हूँ। निश्चित रूप से भगवान शंकर सबका कल्याण करते हैं। ये मृत्यु बहुत दुखदायी थीं लेकिन वह जो कुछ भी था प्रभु की योजना था। उनकी योजना के सामने कोई योजक टिक नहीं सकता। उसका प्रवाह ऐसा है कि मनुष्य का अहंकार उसके आगे पत्तों की तरह बिखर जाता हैै। इसलिए हम अपने उस अभिमान से मुक्त होकर शिवत्व को समझें। इस त्रासदी के सभी मृतक प्रभु के चरणों में हैं उनका कल्याण ही होगा। मैं भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उत्तराखंडवासियों का जीवन दोबारा पटरी पर आए, भगवान केदारनाथ जी के दर्शनों की यात्रा पुनः प्रारंभ हो ताकि यहाँ के निवासी फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें ताकि हम किसी के मुखापेक्षी ना बनें, लेकिन उस मर्यादा के साथ जो भगवान ने हमारे लिए निश्चित की है।

मैं समझती हूँ कि सबसे सुन्दर दृश्य संस्थाओं या पदार्थों को खड़ा करके नहीं उत्पन्न होगा बल्कि इसके लिए वैचारिक क्रांति को जन्म देना होगा। हमें अपनी प्राचीन पवित्रता को लौटाना होगा। मर्यादाओं के साथ अपनी जीवन की तेजस्वी आभा को प्राप्त करना होगा। लेकिन इसके लिए हमें प्रवेश करना होगा। आप जानते हो कि महंगा धन तिजोरी में रखा जाता है और फिर उस पर एक मजबूत ताला लगाया जाता है। ताला तिजोरी से भी कम कीमती होता है जिसके भरोसे पर ही धन को छोड़ा जाता है। फिर उस ताले को खोलने और बन्द करने वाली चाबी तो ताले से भी कम कीमती होती है लेकिन सबसे ज्यादा भरोसा उस छोटी सी चाबी पर ही किया जाता है ना? इतने महंगे धन को उससे कम कीमत की तिजोरी में रखा, उससे भी कम कीमत का ताला लगाया और सबसे कम कीमत की चाबी के भरोसे उसे छोड़ा! एक दिन हथौड़े ने चाबी से पूछा कि ‘मैं दिनभर ठक-ठक करता रहूँ तो ये ताला टूट तो जाएगा लेकिन खुलेगा नहीं लेकिन तू इसे चुपचाप इतनी आसानी से कैसे खोल लेती है?’ चाबी ने उत्तर दिया -‘भैया, इस ताले के चुपचाप खुलने और बन्द होने का रहस्य इतना सा है कि मैं इसे खोलने के लिए इसके भीतर प्रवेश करती हूँ और तुम इसे खोलने के लिए इस पर प्रहार करते हो।’ कदाचित हम भी उस चाबी की तरह ही प्रेमपूर्वक अपनी भूमिका में प्रवेश करना सीखें। ये जो आपदा उत्तराखंड मंे आई यह प्रकृति पर हमारे निरन्तर प्रहार का ही नतीजा है। हमने आस्थापूर्वक प्रकृति में आंचल में प्रवेश करना सीखा ही नहीं। भारत के ऋषियों का दर्शन हमें प्रवेश करना सिखाता है। इसीलिए वर्षों तक साधना में रहने वाले ऋषि ने ग्रह-नक्षत्रों की चाल और गणना को समझ लिया था। वह प्रवेश था और प्रकृति में प्रवेश ही परमात्मा तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
- सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Wednesday, October 23, 2013

भारतीय जनतंत्र की मुखर आवाज थे भानु भैया के शब्द

आज भैया निश्चित रूप से हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियां, उनकी यादें पल-पल हमको प्रेरणा देती हैं। भानु भैया कहते थे कि जीवन में न तो अभाव दिखना चाहिए और न ही प्रभाव। चित्त में भी अभाव नहीं होना चाहिए। वैभव का, पदों का अथवा प्रतिष्ठा का प्रभाव भी चित्त में नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर न तो तुम सत्य कह सकोगे और न ही उसे अपने जीवन में धारण कर सकोगे। सत्य के पक्ष में खड़े नहीं हो सकोगे और परेशान हो जाओगे। यदि सत्य कहना है तो उसके लिए व्यक्तित्व में नैतिकता की आग जलनी चाहिए। केवल छवि और छाया में जी रहे हो तो तुम असली नहीं हो, तुम्हारी छवि पत्रकार जगत जानता है। यह बात सभी जानते हैं कि मीडिया के द्वारा छवि बनती है और छाया भी बनती है। छवि और छाया सही हो यह ज़रूरी नहीं है। आपने जिसके गीत गा गाकर उसे जनता के मानस पटल पर स्थापित कर दिया उसके पास राष्ट्र का दर्द है भी या नहीं, यह बात आम जनता नहीं जानती। यह भी हो सकता है कि किसी चरित्रवान व्यक्ति की छवि और छाया को बिगाड़ दिया जाए। वीर सावरकर जैसे भारत माता के लाल के लिए पार्लियामेंट में यह चर्चा हो कि इनका चित्र यहाँ लगना चाहिए या नहीं, यह शर्मनाक है। जिन्होंने समुद्र की उत्ताल तरंगों में पौरुष के अभिलेख लिखे या अंडमान की काली कोठरियों में अपने रक्त से पत्थर की भित्तियों पर शौर्य की कहानियां लिखीं आज उनका नाम लेने में हमको डर क्यों लगता है? हम शर्मिन्दा क्यों होते हैं?

भानु भैया कहते थे कि पत्रकारिता एक मिशन होना चाहिए। वो केवल आपका कैरियर भर नहीं हो सकता और हाँ पत्रकार ही क्यों? अगर कोई देश का प्रधानमंत्री बनने की कल्पना भी करता है तो प्रधानमंत्री बनना साधन तो हो सकता है लेकिन साध्य नहीं हो सकता। मात्र राष्ट्रनिर्माण की कल्पना को साकार करने के लिए वो पद एक साधन मात्र है और अगर पद साध्य बन जाएंगे तो फिर लक्ष्य को कैसे पाया जा सकेगा? अभी तक तो हमने यही देखा है। डाॅक्टर बनना क्या उद्देश्य है? डिग्री हासिल करना क्या उद्देश्य है? धन कमाना क्या उद्देश्य है? नहीं वो तो केवल सााधन मात्र है। वह उद्देश्य नहीं हो सकता। उद्देश्य के बिना जीवन पशु के समान होता है। अगर आपका कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं है तो फिर आपकी जि़न्दगी निरर्थक है इसलिए वो जो हमारे पास आ गया वो तो मात्र साधन है लेकिन उसके माध्यम से जो पाना आना है वो उद्देश्य है। उद्देश्य क्या है? राष्ट्र निर्माण उद्देश्य है, सारी सृष्टि में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना जागृत बनी रहे वो उद्देश्य हो सकता है। माँ भारती के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे वो उद्देश्य है। मेरा जीवन समष्टि के लिए अर्पित हो ये उद्देश्य हो सकता है। मेरा ‘अहं’ परिवर्तित होकर ‘वयं’ बने, ये उद्देश्य है। मेरा जीवन सत्य को धारण करे, मैं सत्य को जी सकूँ, मैं धर्म को धारण कर करूँ, धर्म के फल को धारण करूँ ये उद्देश्य है। मैं मनुष्य होकर अपने भीतर के मनुष्यत्व को जाग्रत करूँ, नारायणी भाव को प्राप्त करूँ। उद्देश्य ये है कि मैं केन्द्र के बिन्दु को भी जानूँ और परिधि के परिधान को भी जानूँ। उद्देश्य ये है कि व्यक्ति से मैं समष्टि हो जाऊँ, उद्देश्य ये है कि मैं पेट और पैसे के लिए नहीं अपितु परमात्मा के लिए जियूं, और परमात्मा मात्र कोई छोटी धारणा नहीं है वो विराट है और उद्देश्य क्या है? व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समष्टिगत सेवा में तत्पर होना उद्देश्य है।

भानु भैया ने इन्हीं सब उद्देश्यों के लिए अपने जीवन को जिया। उनकी लेखनी को देखिए उनकी किसी भी पुस्तक में। उनके द्वारा वह सब जो सन् 1980 या 85 में लिखा गया, आज भी प्रासंगिक लगता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह सब आज के लिए ही लिखा गया हो, अभी इस क्षण के लिए लिखा गया हो। भानु भैया कहते थे कि अतीत ही सत्य है क्योंकि लोग कहते हैं न कि बीती को बिसार दे। वो कहते थे कि केवल उपदेशक होकर यदि कोई अपनी मति या गति का परिचय देना चाहता है तो वह एक तरह का अनर्गल प्रलाप करता है क्योंकि अभी अभी जो पल है वो अभी-अभी ही अतीत भी हो जाएगा। अतीत में डाला हुआ बीज ही तो वर्तमान में वृक्ष है या भविष्य का फल है तो अतीत में से क्या लोगे। अतीत में मूल्य हैं, अतीत में निष्ठा है, अतीत में प्रमाणिकता है। अतीत को उठाकर देखिये, वहाँ सत्य की आभा है, वहाँ अपने लिए नहीं अपनों के लिए चित्त में जीने का भाव है। अतीत के उन मूल्यों के साथ ही, उसकी उस बुनियाद के साथ ही तुम भविष्य के उस भवन को खड़ा कर सकते हो।

मैं भानु भैया के साथ बहुत वात्सल्य, नेह, पे्रम के नाते से जुड़ी रही। वात्सल्य ग्राम के कण-कण में भानु भैया विराजमान हैं, उनका विचार विराजमान है। एक बार मैंने उनसे कहा कि -‘भैया, मैं ऐसे नवजात बच्चों को, जिन्हें लोग कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं, त्याज्य मानकर संसार उनको अवैध कहता है तो मैं बहुत व्याकुल हो जाती हूँ, इस बारे में आप कहोगे?’ तो भैया बोले -‘माँ, सम्बन्ध भले ही अवैध हो सकता है लेकिन संतान कभी अवैध नहीं होती। वो तो सनातन की होती है।’ मैंने कहा -‘भैया, मैं कल्पना करती हूँ कि देश के बच्चों को ममतामयी गोद मिले, प्यार मिले।’ वो बोले -‘माँ, तुम एक ऐसा गाँव बनाओ जो देवकियों की कोख वाला गाँव न हो बल्कि यशोदाओं की गोद वाला हो। तुम ऐसा प्रयत्न करो कि कण्व ऋषि का वो वात्सल्य नेह प्रेम साकार हो जो तुम्हारे दिल में उमड़ता, घुमड़ता रहता है।’ भानु भैया ने ही मुझे नाम दिया ‘दीदी माँ’।

उन्होंने कहा कि दुनिया तुमको दुर्गा और चण्डी के रूप में जानती है। तुम हमेशा क्रोध में रहती हो ऐसा लोग तुम्हें जानते हैं पर जब मैंने तुम्हें नजदीक आकर देखा तो लगा कि वो नन्हें-नन्हें बच्चे तुम्हारे आस-पास हैं, किलकारियां तुम्हारे आस-पास हैं, सहजता और सरलता तुम्हारे आस-पास है तो फिर ये प्रकट क्यों नहीं होनी चाहिए?’ ऐसा कहते हुए उन्होंने ‘हस्तिनापुर’ में दस एकड़ जमीन का जिक्र करते हुए कहा कि तुम वहाँ वात्सल्य ग्राम बनाओ। मैंने कहा -‘भैया, हस्तिनापुर नाम आते ही मन में महाभारत का आभास होने लगता है। एक उहापोह और द्वन्द्व प्रकट होने लगता है। यशोदा के आस-पास ही कन्हैया का जीवन था, तो फिर तय किया कि वृन्दावन में ही हम वात्सल्य ग्राम के स्वप्न को साकार रूप देंगे। फिर भावांे के इस जगत का निर्माण वृन्दावन की भूमि पर ही हुआ। भानुभैया ने कहा था -‘माँ, अपनी वात्सल्य ग्राम की निरन्तरता को छोड़ना मत।’ मैंने कहा कि -‘भैया, मैं जानती हूँ, छोड़ा तो वो जाता है जिसे गृहण किया गया हो लेकिन जो स्वभाव है वो कभी नहीं छूटता। हाँ, कभी देश अगर पुकारे तो अपनी भूमिका अवश्य निभानी होती है। निश्चित रूप से वो स्वभाव नहीं है वो निश्चित रूप से देश के प्रति हमारी भूमिका रही। पहले भी रही, देश पुकारेगा तो फिर रहेगी। पर मैं तो स्वभाव में विराजमान हूँ, सातत्य जिन्दगी का सच होता हैं। नदी बार-बार सागर सेे मिलती है। सागर कहता है मैं तो खारा हूँ और तू मीठी। आखिर कब तक मुझसे आकर मिलती रहेगी? नदी ने कहा जब तक तू मीठा नहीं हो जाता तब तक तुमसे आकर मिलती रहूँगी। इस निरन्तरता को प्रवाह कहते हैं, ये प्रवाह ही निरंतरता है, इसीलिए भारतीयों की सन्तानें संतति कहलाती हैं। जो हमारी परम्परा की सतत् प्रवाहवान उस परम्परा की संवाहक बनती हैं वही तो संततियां होतीं हैं। और आप भी तो संतति के रूप में यहाँ विराजमान हो उस तेजस्विता की उस ओज से भरी पत्रकारिता की संतानों को कैसी होना चाहिए?

आज आप यहाँ सुन रहे हो, कि संकट कितना बड़ा है? उधर क्या हो रहा है, उधर क्या हो रहा है, किसी और से पता करना पड़ रहा है क्योंकि जो सुना और दिखाया जा रहा है उस पर भरोसा नहीं हो रहा। और किसी समाज के लिए सबसे बड़ा संकट तब खड़ा होता है जब एक तो प्रमाणिकता भंग हो जाए और दूसरा जो लिखा और बताया जा रहा है उस पर से भरोसा उठ जाए। तब समाज की स्थिति क्या होगी? क्या आने वाले समय में हम निश्चित करेंगे कि हमारी लेखनी प्रमाणित होगी, कैसे होगी? जब हम प्रमाणित होंगे। जब प्रलोभ हमें प्रलोभित करेगा, जब लालच में विदेश जाने की यात्रा चित्त को आकर्षित करेगी, जब स्वर्ण के भंडार हमारी चित्त चेतना में हलचल पैदा करेंगे या तो फिर कुछ बिगाड़ दिये जाने का भय मन में होेगा।

भानु भैया कहते थे कि भारत भय और माया की मृग मरीचिका में से गुज़र रहा है। इस भय और प्रलोभन से जो पत्रकारिता मुक्त होती है, वही भानु भैया की तरह चाँदनी बनकर सदैव चमकती रहती है। हाँ, सŸाा पर विराजमान लोगों की आरतियाँ उतरती हैं। हाँ, भानुप्रताप जी जैसे लोगों को संगठन और संस्थाओं के माध्यम से अलग-थलग करने के प्रयत्न भी होते हैं। मैं यह भी मानती हूँ कि मन में आई हुई पीड़ा शरीर में कैंसर जैसा रोग भी बन जाती है। पर किसी भी पत्रकार को इससे भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है तब कहीं जाकर सत्य की संस्थापना हो पाती है। तब यह लगता है कि आज से तीस साल पहले भी लिखा हुआ आज के लिए ही कहा था।
भानुप्रताप शुक्ल उस आभा, उस ओज, उस तेज के धनी थे जिससे आज हम सब आलोकित हो रहे हैं। निश्चित रूप से कोई देश अपनी भूमि से महान नहीं होता बल्कि वहाँ रहने वाले देशवासियों की भूमिका के कारण महानता के शिखर छूता है।

 मैं विद्यार्थियों से कहना चाहती हूँ कि लकडि़यां जब चूल्हे में जलती हैं तो जलकर उनका क्या होता है? राख बन जाती हैं, उससे या तो बर्तन मांजे जाते हैं या उनसे मल-मूत्र ढँक दिया जाता है। लेकिन वही लकडि़यां जब हवनकुण्ड की समिधा के साथ, उस आग में भी जलतीं हैं तो जलकर राख नहीं बनतीं, फिर वे विभूति बनती हैं, भस्म बनती हैं। यतियांे के माथे का सिंगार बनतीं हैं अथवा शंकर के माथे पर आरूढ हो जाती हैं। कदाचित् पत्रकारिता का जगत अपने को समिधा बनाए, और राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में स्वयं को होम करे तो आने वाला कल सुरभित होगा, आभा से युक्त होगा। प्रणाम है, उनका भावभीना स्वागत करती हूँ और आशा करती हूँ कि आने वाले कल में उसी ओज और तेज के साथ

सच चाहें जितना कड़वा हो,
धँस जाए तीर सा सीने में
सुनने वाला तिलमिला उठे,
लथपथ हो जाए पसीने में।  

सच कड़वा ही होता है लेकिन शास्त्र कहते हैं कि सच को किस तरह रखा जाना चाहिए उसके पीछे सकारात्मक सोच होनी चाहिए। बहुत बार सच आग बनकर फैलता है कदाचित् सच यज्ञ कुण्ड की खुशबू बनकर फैले। बहुतों का भला होता है, बहुतों का कल्याण होता है माँ भारती ऐसे तेजस्वी पुत्रों का इन्तज़ार करती है।

भानुभैया ने मुझसे कहा था कि माँ, मैं विदा नहीं हो सकता। शरीर जर्जर हो गया है लेकिन देश का काम अधूरा है, इसलिए माँ मैं लौटूँगा, ज़रूर लौटूँगा। और मुझे लगता है कि इतने सारे तरूण पत्रकारों के बीच में मेरे भानु भैया ही लौट आए हैं। काश उनका दर्द आपका दर्द बने और काश उनके दर्द की दवा भी आप ही बन जाएं।

- दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा
- 13 सितम्बर 2013, पत्रकारिता समारोह, वात्सल्य ग्राम

Monday, October 7, 2013

परमशक्ति पीठ शाखा बाड़मेर में हुआ वात्सल्य सेवा केन्द्र का लोकार्पण

परमशक्ति पीठ शाखा बाड़मेर में दिनांक 22 सितम्बर 2013 को परम पूज्या दीदी माँ जी के कर कमलों द्वारा वात्सल्य सेवा केन्द्र का लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ। 6000 वर्ग फुट के निर्माणाधीन इस भवन के भूतल का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है और प्रथम तल निर्माणाधीन है।

वात्सल्य सेवा केन्द्र का उद्देश्य आर्थिक रूप से अक्षम परिवार की बेटियों को औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ स्वावलम्बी बनाने हेतु व्यावसायिक शिक्षा जैसे- सिलाई-कढ़ाई, कम्प्यूटर कोर्स, गृह उद्योग प्रशिक्षण इत्यादि की भी समुचित व्यवस्था करना है। इसके साथ ही इस केन्द्र में बालिकाओं के व्यक्तित्व विकास हेतु शारीरिक, आध्यात्मिक शिक्षा जैसे ध्यान, योग, प्राणायाम, आत्म सुरक्षा हेतु भी प्रशिक्षित किया जाएगा।

Wednesday, September 25, 2013

स्नेहभरा सहारा उत्तराखंड वासियों की प्राथमिक आवश्यकता

‘भयानक प्राकृतिक आपदा से बिखर चुके उत्तराखंड के अनेक गांवों में चारों ओर से राहत सामग्री का पहुंचना जारी है। मैंने पहाड़ी रास्तों पर से गुजरते हुए कई स्थानों पर देखा कि बच्चे धीरे-धीरे चल रही गाडि़यों की पीछे दौड़ते हैं। अपने दोनों हाथ फैलाये हुए उन्हें देखकर मन दुःख से भर उठता है। हर कोई उन्हें आकर कुछ न कुछ देता है। भय इस बात का है कि इस त्रासदी के बाद लगातार चल रहा राहत अभियान कहीं उन बच्चों को ‘याचक’ मनोवृति से न भर दे। अपने कठिन परिश्रम के दम पर पहाड़ों की विषम परिस्थितियों में जीने वाले ये स्वाभिमान गिरिवासी कहीं दीन-हीन भावना से न भर उठें, अपने राहत कार्यों के दौरान हमें इन बातों का भी विशेष ध्यान रखना होगा। हम यदि किसी को रोटी दे रहे हैं तो यह बहुत अच्छी बात है लेकिन यह भाव तब और भी सुन्दर रूप ले उठेगा जब हम उसे रोटी कमाने लायक बना दें।

    हमने तय किया कि इन प्रभावित इलाकों में जहाँ भी जिसे जैसी जरूरत होगी उसे वह सामग्री या सहायता प्रदान करेंगे लेकिन सर्वोच्च प्राथमिकता होगी उन लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने की जिनका सबकुछ छिन चुका है इस विपति में। परमशक्ति पीठ के माध्यम से हम बच्चों की अच्छी शिक्षा व्यवस्था करेंगे। पति या बच्चों के बिछोह से दुखी महिलाओं को सहानुभूतिपूर्वक उस दुःख से निकालकर हम वात्सल्य सेवा केंद्रों के माध्यम से स्वाभिमानपूर्ण स्वरोजगार की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

    मैंने उत्तराखंड में अपने बच्चों से बिछुड़ गई माँ की ममता को तड़पते देखा है। रोज रात को अपनी माँ की गोद में सिर रखकर, उसका हाथ पकड़कर उसकी लोरियां सुनते हुए सो जाने वाले बच्चों को अपने माता-पिता की याद में बिलखते देखा है। बहनें, भाईयों की याद में तड़प रही हैं और भाई जंगलों में, घाटियों में अपनी बहन को तलाश रहे हैं। अनकहे दर्द से सारी केदारनाथ घाटी चुपचाप आंसू बहाती है दिन रात। जो बिछुड़ गए अब उन्हें तो नहीं मिलाया जा सकता लेकिन हाँ उनकी पीड़ा को हम सभी मिलकर कम जरूर कर सकते हैं। हमने परमशक्ति पीठ के माध्यम से दानदाता बंधु-भगिनियों से आव्हान किया है कि वे हमारे इस अभियान के माध्यम से पीडि़त मानवता की सेवा में आगे आएं। यह बताते हुए प्रसन्नता है कि दुनिया भर से हमारे इस कार्य को लोगों ने केवल सराहा ही नहीं बल्कि अपना भरपूर सहयोग भी प्रदान किया है।
- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा

Monday, September 23, 2013

क्यों कुपित है प्रकृति?

मैं विज्ञान का विरोध नहीं करती क्योंकि वह तो नैसर्गिक रूप से ही प्रकृति में चारों ओर विद्यमान है लेकिन ऐसा विज्ञान जो प्रकृति से खिलवाड़ करने लगे, हमें क्या किसी भी समझदार मनुष्य को स्वीकार्य नहीं होगा। हम आधुनिक विज्ञान की चकाचैंध में अपनी लोक मान्यताओं को दकियानूसी नहीं मान सकते। आज धर्म और विज्ञान का जो संघर्ष दिखाई देता है वह प्राचीन भारत में नहीं था। क्योंकि तब विज्ञान को धार्मिक कृत्यों के साथ जोड़ा गया था। तब आज की तरह धर्म को व्यापार बनाने की होड़ नहीं थी। हमारे सभी ऋषि-मुनि मूलतः वैज्ञानिक थे। उस समय उनके द्वारा किए गए वैज्ञानिक अनुसंधानों तथा धारणाओं को सामान्य लोगों तक पहुंचाने मंे सहायक प्रसार माध्यमों का अविष्कार नहीं हुआ थी। इसीलिये उन्हें नित्यप्रति दैनिक जीवन से जोड़ने के लिए धर्म का सहारा लिया गया। उन्होंने बताया कि मानव मूलतः पूर्णरूपेण प्रकृति द्वारा नियंत्रित है, उसकी सभी आवश्यकताएं भी वही पूर्ण करती है इसीलिए उसे माता का दर्जा दिया गया। वृक्ष हमें प्राणवायु देते हैं, इसीलिए उनमें देवताओं का वास माना गया। नदियां हमें जीवन जल देती हैं इसीलिए उन्हें माता माना गया। भारतीय मनीषा में धरती के कण-कण में ईश्वर का वास माना गया क्योंकि इस धरती पर सबकी अपनी महत्ता है।

आज चारों ओर बहस इस बात पर हो रही है कि कि धर्म बड़ा या विज्ञान? आज हम जिस युग से गुजर रहे हैं उसमें तकनीकी योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। लेकिन विचार की बात यह है कि आज से हज़ारों वर्श पहले भी तो विज्ञान था। श्री केदारनाथ मंदिर के इतिहास में जाने पर यह मालूम होता है ज्ञात इतिहास में 9 वीं शताब्दी के आसपास उसका जीर्णोद्धार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने करवाया था। अभी हाल की विभीशिका में इस मंदिर के आसपास के लगभग सारे भवन तिनकों के समान जलप्रलय में बह गये लेकिन मंदिर का मुख्य भवन जस का तस टिका रहा। यह वर्णन भी मिलता है कि 14 वीं शताब्दी में जब धरती पर एक छोटा हिमयुग चल रहा था तब केदारनाथ मंदिर की वर्तमान इमारत 400 वर्श तक बर्फ में दबी रही! आप कल्पना कीजिए कि उस समय शिल्प विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा जिसने इतना मजबूत भवन बनाया जो ग्लेशियरों में दबकर भी सैकड़ों वर्ष तक सुरक्षित रहा। हज़ारों-लाखों वर्श पूर्व क्या तब विज्ञान नहीं था जब हमारे ऋशि-मुनियों ने ग्रह-नक्षत्रों की सटीक गणना कर खगोलशास्त्र की रचना की। कहने का आशय है कि हमारी एक भी मान्यता ऐसी नहीं है जो विज्ञानसम्मत ना हो।

केदारनाथ त्रासदी की बाद एक बहस और चली कि उसी क्षेत्र में बन रहे एक बांध के बीच में आ रही धारीदेवी की प्रतिमा को योजनाकारों ने बिना किसी आवश्यक अनुष्ठान आदि के वहां से हटाकर अन्यत्र स्थापित करने का प्रयत्न किया।  16 जून 2013 को शाम साढ़े सात बजे देवी की वह प्रतिमा वहां से हटाई गई और उसके तुरंत बाद ही यह जलप्रलय हो गई। इस धार्मिक कारण का खण्डन कर रहे तमाम वैज्ञानिकों से मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहती हूँ कि भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई विकसित देशों में भी लोकमान्यताओं को महत्व दिया जाता है। आज भी हमारे देश के ऐसे पहाड़ी और अभावग्रस्त इलाकों में जहाँ चिकित्सा की प्राथमिक सुविधाएं ही नहीं वहाँ उस गाँव में पूजे जाने वाले देवी-देवता ही उनके रक्षक होते हैं, उन्हें रोगों या प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हैं।
यदि इस तर्क को न माना जाये और विज्ञान पर ही विश्वास किया जाये तो हम पायेंगे कि भूवैज्ञानिकों द्वारा भी बरसों से चेतावनियां दी जाती रही हैं कि केदारनाथ धाम के मुख्य मंदिर की पश्चिमी पट्टी पर किसी भी भवन का निर्माण वास्तुविरुद्ध है। वह हिमालय के प्राकृतिक जल बहाव का क्षेत्र है। यही अनुसंधान उस युग का भी है जब आज का तथाकथित विज्ञान नहीं जन्मा था। विकास के नाम पर उस पुरातन मान्यता की अनदेखी के परिणामस्वरूप हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कुछेक बातों को छोड़ दिया जाये तो हमारी लगभग प्रत्येक मान्यता विज्ञान आधारित ही है।

 मैं वैज्ञानिक विकास का विरोध नहीं करती लेकिन मैं उस प्रगति के विरुद्ध हूं जिसे प्रकृति के साथ बलात्कार करके हासिल किया गया हो। केदारनाथ की त्रासदी बेशक दुखद है लेकिन यह मनुश्य द्वारा विकास की अंधाधुंध दौड़ में प्रकृति से छेड़छाड़ के विरुद्ध एक सीमित चेतावनी भी है। वृक्ष धरती माता के वस्त्र हैं, हम उनकी कटाई करके केवल उसे नग्न ही नहीं कर रहे बल्कि अपने लिए विनाश को आमंत्रित भी कर रहे हैं। विज्ञान के दंभ पर फूलकर हम धरती लांघकर चांद पर जा बसने की तैयारी कर रहे हैं। हम क्यों ये कोशिश नहीं करते कि हमारी यह धरती माता ही चांद से सुंदर बन जाये।

स्मरण रखियेगा कि देवालय शक्तिस्थल होते हैं। वहां जाकर हमें एक नई जीवनी शक्ति अर्जित होती है। भारत के जितने भी सिद्ध और महापुरुश हुए वे अपने जीवन में एक ना एक बार हिमालय जरूर गए। वहां जाकर उन्होंने जप-तप किया फिर नीचे आकर जनता को अपना मार्गदर्शन दिया। देवों की इस तपोभूमि को आज हमारी नवागत पीढ़ी ने रंगभूमि बना दिया है। किस दिशा में जा रही है आज हमारी युवा पीढ़ी? आज इन महान तीर्था में हम दर्शन करने नहीं रंजन करने जाते हैं। यह विभीशिका हमारे ही दुश्कर्मों के द्वारा प्राकृतिक आपदा का भयानक रूप धरकर हमारे ही सामने खड़ी हुई है। पूरा हिमालय क्षेत्र देवाधिदेव महादेव की तपस्थली है। वही महादेव जो विश को अपने कंठ में धारण कर जगत को अमृत बांटते हैं। हिमालय दर्शन को अवश्य जाइये लेकिन अपना प्रदूशण पीछे मत छोड़कर आइए। हिमालय को हिमालय ही रहने दीजिए जहां से जीवन की धारा बहती है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा