About Didi Maa

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Wednesday, November 20, 2013

वात्सल्य धारा से तृप्त होते जीवन...

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी लगातार इसी क्षेत्र में रहकर पीडि़तों के आहत दिलों पर अपनी करुणा का मरहम लगाने का सतत् प्रयत्न कर रही हैं। पूरी केदारघाटी में जगह-जगह अभी भी मार्ग पूरी तरह से सुगम नहीं हुए हैं। भूस्खलन का खतरा निरन्तर बना हुआ है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी वे यहाँ संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों’ को अपना पावन मार्गदर्शन देकर यहाँ के लोगों को इस दुखद घटना से उबारने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं। अपनों को खोने का दर्द अव्यक्त होता है। अपने किसी प्रिय का अचानक दुनिया से चले जाना तोड़कर रख देता है।

रूद्रप्रयाग जिले की पहाडि़यों में बसा एक छोटा सा गाँव है - सेमी। 16 जून को बरसी आसमानी आफत ने सारे गाँव को खंडहर करके रख दिया। खेती और चारधाम यात्रा संबंधी छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े यहाँ के निवासियों ने पाई-पाई जोड़कर अपने घर बनाए थे जो घर तो अब भी दिखते हैं लेकिन रहने लायक नहीं रहे। घनघोर बारिश के बाद इस पूरे गाँव की जमीन ही अपने आप नीचे की ओर धंसने लगी। देखते ही देखते दरकते मकान उनमें रहने वालों के सपने भी चकनाचूर कर गए। दुःख की बात तो यह है कि शासकीय तौर पर ऐसे घरों को पूर्णतया नष्ट नहीं माना गया है इसलिए राहत राशि भी उतनी नहीं मिली। मरम्मत की राहत राशि से भला चित्र में दिखाई दे रहे मकान को क्या रहने लायक बनाया जा सकता है? बहरहाल, पास आते जा रहे भीषण ठण्ड के मौसम की डरा देने वाली आशंकाओं के बीच इस गाँव के लोग टेण्टों में रहने को विवश हैं। वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ के ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ ने इस गांव की पीड़ा को अनुभव किया और उनके बीच सभी आवश्यक राहत सामग्री का वितरण किया। गाँव के प्रधान बताते हैं कि वात्सल्य सेवा केन्द्र के माध्यम से हमें केवल सहायता ही नहीं बल्कि इस मुसीबत से लड़ने की शक्ति भी मिली है।

त्रियुगीनारायण - उत्तराखंड के अतिप्राचीन स्थानों में से एक। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान शिवशंकर एवं माता पार्वती का विवाह हुआ था। हजारों वर्ष पुराना यह स्थान रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड त्रासदी की
रात को यहाँ के निवासियों ने सैकड़ों तीर्थयात्रियों को भोजन-पानी और आश्रय देकर उनकी प्राणरक्षा की। यहीं पर रहने वाले पेशे से ड्राइवर ललितप्रसाद किसी शारीरिक बीमारी के दौरान हुए इलाज में किसी दवाई के दुष्प्रभाव से इनके दोनों पैर अशक्त हो गए। वे बिना किसी की सहायता के एक कदम भी नहीं चल सकते। दुर्भाग्य ने यहीं पीछा नहीं छोड़ा। जंगल में अचानक आग लगी और वहाँ घास लेने गई पत्नी की झुलसने से मृत्यु हो गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र के इस पिता के पास गुजारे का कोई साधन न था। जैसे तैसे गाँव वालों की कृपादृष्टि से बस जीवन चल रहा था। उत्तराखंड त्रासदी के बाद दीदी माँ जी के पावन मार्गदर्शन में वहाँ राहत कार्य आरंभ हुए। ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों के कार्यकर्ता भाई-बहन जब त्रियुगीनारायण पहुंचे तो वहाँ उनकी मुलाकात ललितप्रसाद से हुई। जब उन्हें बताया गया कि ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए वात्सल्य सेवा केंद्रों में रहने और स्कूली शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की गई है तो वे अपनी दोनों बेटियों को वहाँ भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। ये दोनों बच्चियां इस समय केदारनाथ मार्ग स्थित ग्राम कोरखी में संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ में रहकर अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। पुत्र की स्कूल फीस भी संस्था ही वहन करती है। ललितप्रसाद बहुत ही कृतज्ञ भाव से कहते हैं कि -‘मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर बहुत चिंतित था कि कैसे इनकी पढ़ाई-लिखाई होगी लेकिन दीदी माँ जी की कृपा से आज वे दोनों अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी ग्रहण कर रही हैं। मैं तो आजीवन उनका ऋणी रहूँगा।’ उनकी दोनों बेटियां शिवानी और काजल यहाँ रह रहे सब बच्चों के साथ बहुत खुश हैं। पहले की तरह अब उन्हें अपने घर की याद नहीं आती। पांचवी और चैथी कक्षाओं में अध्ययनरत् ये दोनों बच्चियां दीदी माँ जी का स्नेहिल प्यार पाकर अभीभूत हैं।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
  सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Wednesday, September 25, 2013

स्नेहभरा सहारा उत्तराखंड वासियों की प्राथमिक आवश्यकता

‘भयानक प्राकृतिक आपदा से बिखर चुके उत्तराखंड के अनेक गांवों में चारों ओर से राहत सामग्री का पहुंचना जारी है। मैंने पहाड़ी रास्तों पर से गुजरते हुए कई स्थानों पर देखा कि बच्चे धीरे-धीरे चल रही गाडि़यों की पीछे दौड़ते हैं। अपने दोनों हाथ फैलाये हुए उन्हें देखकर मन दुःख से भर उठता है। हर कोई उन्हें आकर कुछ न कुछ देता है। भय इस बात का है कि इस त्रासदी के बाद लगातार चल रहा राहत अभियान कहीं उन बच्चों को ‘याचक’ मनोवृति से न भर दे। अपने कठिन परिश्रम के दम पर पहाड़ों की विषम परिस्थितियों में जीने वाले ये स्वाभिमान गिरिवासी कहीं दीन-हीन भावना से न भर उठें, अपने राहत कार्यों के दौरान हमें इन बातों का भी विशेष ध्यान रखना होगा। हम यदि किसी को रोटी दे रहे हैं तो यह बहुत अच्छी बात है लेकिन यह भाव तब और भी सुन्दर रूप ले उठेगा जब हम उसे रोटी कमाने लायक बना दें।

    हमने तय किया कि इन प्रभावित इलाकों में जहाँ भी जिसे जैसी जरूरत होगी उसे वह सामग्री या सहायता प्रदान करेंगे लेकिन सर्वोच्च प्राथमिकता होगी उन लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने की जिनका सबकुछ छिन चुका है इस विपति में। परमशक्ति पीठ के माध्यम से हम बच्चों की अच्छी शिक्षा व्यवस्था करेंगे। पति या बच्चों के बिछोह से दुखी महिलाओं को सहानुभूतिपूर्वक उस दुःख से निकालकर हम वात्सल्य सेवा केंद्रों के माध्यम से स्वाभिमानपूर्ण स्वरोजगार की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

    मैंने उत्तराखंड में अपने बच्चों से बिछुड़ गई माँ की ममता को तड़पते देखा है। रोज रात को अपनी माँ की गोद में सिर रखकर, उसका हाथ पकड़कर उसकी लोरियां सुनते हुए सो जाने वाले बच्चों को अपने माता-पिता की याद में बिलखते देखा है। बहनें, भाईयों की याद में तड़प रही हैं और भाई जंगलों में, घाटियों में अपनी बहन को तलाश रहे हैं। अनकहे दर्द से सारी केदारनाथ घाटी चुपचाप आंसू बहाती है दिन रात। जो बिछुड़ गए अब उन्हें तो नहीं मिलाया जा सकता लेकिन हाँ उनकी पीड़ा को हम सभी मिलकर कम जरूर कर सकते हैं। हमने परमशक्ति पीठ के माध्यम से दानदाता बंधु-भगिनियों से आव्हान किया है कि वे हमारे इस अभियान के माध्यम से पीडि़त मानवता की सेवा में आगे आएं। यह बताते हुए प्रसन्नता है कि दुनिया भर से हमारे इस कार्य को लोगों ने केवल सराहा ही नहीं बल्कि अपना भरपूर सहयोग भी प्रदान किया है।
- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा

Monday, September 23, 2013

क्यों कुपित है प्रकृति?

मैं विज्ञान का विरोध नहीं करती क्योंकि वह तो नैसर्गिक रूप से ही प्रकृति में चारों ओर विद्यमान है लेकिन ऐसा विज्ञान जो प्रकृति से खिलवाड़ करने लगे, हमें क्या किसी भी समझदार मनुष्य को स्वीकार्य नहीं होगा। हम आधुनिक विज्ञान की चकाचैंध में अपनी लोक मान्यताओं को दकियानूसी नहीं मान सकते। आज धर्म और विज्ञान का जो संघर्ष दिखाई देता है वह प्राचीन भारत में नहीं था। क्योंकि तब विज्ञान को धार्मिक कृत्यों के साथ जोड़ा गया था। तब आज की तरह धर्म को व्यापार बनाने की होड़ नहीं थी। हमारे सभी ऋषि-मुनि मूलतः वैज्ञानिक थे। उस समय उनके द्वारा किए गए वैज्ञानिक अनुसंधानों तथा धारणाओं को सामान्य लोगों तक पहुंचाने मंे सहायक प्रसार माध्यमों का अविष्कार नहीं हुआ थी। इसीलिये उन्हें नित्यप्रति दैनिक जीवन से जोड़ने के लिए धर्म का सहारा लिया गया। उन्होंने बताया कि मानव मूलतः पूर्णरूपेण प्रकृति द्वारा नियंत्रित है, उसकी सभी आवश्यकताएं भी वही पूर्ण करती है इसीलिए उसे माता का दर्जा दिया गया। वृक्ष हमें प्राणवायु देते हैं, इसीलिए उनमें देवताओं का वास माना गया। नदियां हमें जीवन जल देती हैं इसीलिए उन्हें माता माना गया। भारतीय मनीषा में धरती के कण-कण में ईश्वर का वास माना गया क्योंकि इस धरती पर सबकी अपनी महत्ता है।

आज चारों ओर बहस इस बात पर हो रही है कि कि धर्म बड़ा या विज्ञान? आज हम जिस युग से गुजर रहे हैं उसमें तकनीकी योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। लेकिन विचार की बात यह है कि आज से हज़ारों वर्श पहले भी तो विज्ञान था। श्री केदारनाथ मंदिर के इतिहास में जाने पर यह मालूम होता है ज्ञात इतिहास में 9 वीं शताब्दी के आसपास उसका जीर्णोद्धार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने करवाया था। अभी हाल की विभीशिका में इस मंदिर के आसपास के लगभग सारे भवन तिनकों के समान जलप्रलय में बह गये लेकिन मंदिर का मुख्य भवन जस का तस टिका रहा। यह वर्णन भी मिलता है कि 14 वीं शताब्दी में जब धरती पर एक छोटा हिमयुग चल रहा था तब केदारनाथ मंदिर की वर्तमान इमारत 400 वर्श तक बर्फ में दबी रही! आप कल्पना कीजिए कि उस समय शिल्प विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा जिसने इतना मजबूत भवन बनाया जो ग्लेशियरों में दबकर भी सैकड़ों वर्ष तक सुरक्षित रहा। हज़ारों-लाखों वर्श पूर्व क्या तब विज्ञान नहीं था जब हमारे ऋशि-मुनियों ने ग्रह-नक्षत्रों की सटीक गणना कर खगोलशास्त्र की रचना की। कहने का आशय है कि हमारी एक भी मान्यता ऐसी नहीं है जो विज्ञानसम्मत ना हो।

केदारनाथ त्रासदी की बाद एक बहस और चली कि उसी क्षेत्र में बन रहे एक बांध के बीच में आ रही धारीदेवी की प्रतिमा को योजनाकारों ने बिना किसी आवश्यक अनुष्ठान आदि के वहां से हटाकर अन्यत्र स्थापित करने का प्रयत्न किया।  16 जून 2013 को शाम साढ़े सात बजे देवी की वह प्रतिमा वहां से हटाई गई और उसके तुरंत बाद ही यह जलप्रलय हो गई। इस धार्मिक कारण का खण्डन कर रहे तमाम वैज्ञानिकों से मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहती हूँ कि भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई विकसित देशों में भी लोकमान्यताओं को महत्व दिया जाता है। आज भी हमारे देश के ऐसे पहाड़ी और अभावग्रस्त इलाकों में जहाँ चिकित्सा की प्राथमिक सुविधाएं ही नहीं वहाँ उस गाँव में पूजे जाने वाले देवी-देवता ही उनके रक्षक होते हैं, उन्हें रोगों या प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हैं।
यदि इस तर्क को न माना जाये और विज्ञान पर ही विश्वास किया जाये तो हम पायेंगे कि भूवैज्ञानिकों द्वारा भी बरसों से चेतावनियां दी जाती रही हैं कि केदारनाथ धाम के मुख्य मंदिर की पश्चिमी पट्टी पर किसी भी भवन का निर्माण वास्तुविरुद्ध है। वह हिमालय के प्राकृतिक जल बहाव का क्षेत्र है। यही अनुसंधान उस युग का भी है जब आज का तथाकथित विज्ञान नहीं जन्मा था। विकास के नाम पर उस पुरातन मान्यता की अनदेखी के परिणामस्वरूप हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कुछेक बातों को छोड़ दिया जाये तो हमारी लगभग प्रत्येक मान्यता विज्ञान आधारित ही है।

 मैं वैज्ञानिक विकास का विरोध नहीं करती लेकिन मैं उस प्रगति के विरुद्ध हूं जिसे प्रकृति के साथ बलात्कार करके हासिल किया गया हो। केदारनाथ की त्रासदी बेशक दुखद है लेकिन यह मनुश्य द्वारा विकास की अंधाधुंध दौड़ में प्रकृति से छेड़छाड़ के विरुद्ध एक सीमित चेतावनी भी है। वृक्ष धरती माता के वस्त्र हैं, हम उनकी कटाई करके केवल उसे नग्न ही नहीं कर रहे बल्कि अपने लिए विनाश को आमंत्रित भी कर रहे हैं। विज्ञान के दंभ पर फूलकर हम धरती लांघकर चांद पर जा बसने की तैयारी कर रहे हैं। हम क्यों ये कोशिश नहीं करते कि हमारी यह धरती माता ही चांद से सुंदर बन जाये।

स्मरण रखियेगा कि देवालय शक्तिस्थल होते हैं। वहां जाकर हमें एक नई जीवनी शक्ति अर्जित होती है। भारत के जितने भी सिद्ध और महापुरुश हुए वे अपने जीवन में एक ना एक बार हिमालय जरूर गए। वहां जाकर उन्होंने जप-तप किया फिर नीचे आकर जनता को अपना मार्गदर्शन दिया। देवों की इस तपोभूमि को आज हमारी नवागत पीढ़ी ने रंगभूमि बना दिया है। किस दिशा में जा रही है आज हमारी युवा पीढ़ी? आज इन महान तीर्था में हम दर्शन करने नहीं रंजन करने जाते हैं। यह विभीशिका हमारे ही दुश्कर्मों के द्वारा प्राकृतिक आपदा का भयानक रूप धरकर हमारे ही सामने खड़ी हुई है। पूरा हिमालय क्षेत्र देवाधिदेव महादेव की तपस्थली है। वही महादेव जो विश को अपने कंठ में धारण कर जगत को अमृत बांटते हैं। हिमालय दर्शन को अवश्य जाइये लेकिन अपना प्रदूशण पीछे मत छोड़कर आइए। हिमालय को हिमालय ही रहने दीजिए जहां से जीवन की धारा बहती है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा 

Tuesday, September 10, 2013

निष्काम कर्म ही सेवा कार्य की ऊर्जा है

उत्तराखण्ड में परमशक्ति पीठ ने राहत के जो कार्य आरंभ किए हैं। जब हमने यह संकल्प किया था तब मैं अकेली थी लेकिन आज मुझे यह कहते हुए यह गर्व होता है कि आज इस कार्य में मेरी गुरु बहनें, मेरी शिष्याएं और समाज के अनेक बंधु-भगिनी लगे हैं। और सबसे बड़ी कृपा तो मेरे पूज्य गुरुदेव जी की है। हरिद्वार स्थित गुरुदेव के आश्रम को हमने सबसे पहला आधार शिविर बनाया जहां से उत्तराखण्ड पीडि़तों के लिए राहत सामग्री भेजी गई।

मुझे यह कहते हुए भी अति प्रसन्नता है कि हमारे श्री जयभगवान जी अग्रवाल ने आपदा प्रभावितों के लिए बहुत बड़ा सामग्री संग्रह दिल्ली से किया। गृहस्थी की जरूरतों का कोई भी ऐसा सामान नहीं बचा था जिसे उन्होंने हरिद्वार स्थित परमशक्ति पीठ के आधार शिविर पर भेजने में कोई कसर छोड़ी हो। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था फिर भी उनके मन के उत्साह ने उन्हें फिर से कर्तव्य के मैदान में खड़ा किया। क्योंकि जयभगवान जी किसी भी शुभकार्य में सहयोग के लिए कभी इंकार कर ही नहीं सकते।
     
मैं अपने गुरुदेव पूज्य युगपुरुष जी महाराज के पावन श्रीचरणों में भी कोटि-कोटि प्रणाम करती हूं जिन्होंने हरिद्वार के आश्रम में स्वयं उत्तराखंड वासियों के लिए जाने वाली राहत सामग्री की एक-एक वस्तु को स्वयं देखा और कार्यकर्ताओं को अपना पावन मार्गदर्शन दिया। जब मैं आपदाग्रस्त क्षेत्रों को स्वयं देखने के लिए संजय भैया  जी के साथ हरिद्वार से निकल रही थी तब गुरुदेव ने हंसकर कहा कि -‘ऋतंभरा तुम्हारा शरीर इतना भारी है, तुम कैसे चढ़ पाओगी उत्तराखण्ड के पहाड़ी गांवों तक?’ मैंने कहा -गुरुदेव, आपकी कृपा से मेरा संकल्प भी तो भारी है। मेरा शरीर उसपर भारी नहीं पड़ेगा।’
    
इस कार्य को आरंभ करते हुए मैंने अपनी छोटी-छोटी साध्वी शिष्याओं में अपार उत्साह देखा। जब वो उत्तराखंड के वात्सल्य सेवा केंद्रों की ओर प्रस्थान कर रही थीं तब उन्होंने मुझसे कहा -‘दीदी मां जब उन पहाड़ों पर चारों ओर मौत बरस रही हो तो शायद हमें थोड़ा भय लगेगा। उस समय हम क्या करें? मैंने कहा -‘उस समय इन पंक्तियों को गुनगुनाना…
"वो देखो पास खड़ी मंजिल
इंगित से हमें बुलाती है
साहस से बढ़ने वालों के
माथे पर तिलक लगाती है
साधना कभी ना व्यर्थ जाती
चलकर ही मंजिल मिल पाती
फिर क्या बदली, क्या घाम है
चलना ही अपना काम है.. "
      
मैनें उन्हें कहा कि हमेशा उत्साह से भरे रहना। क्योंकि सेवा का कार्य तो एक गर्भस्थ शिशु जैसा होता है। जो तिल-तिल बढ़ते हुए फिर एक दिन जन्मकर एक फल के रूप में सामने आता है। और हमेशा स्मरण रखना कि जो दिल महत्वाकांक्षाओं से मुक्त होता है वही सेवा में तत्पर होता है। कदाचित व्यासपीठों के आकर्षण बहुत बार सेवाधारियों को भी विचलित करते हैं। क्योंकि यश और कीर्ति ऐसी चीजें हैं कि लोग कंचन और कामिनी को तो छोड़ देते हैं किन्तु प्रसिद्धी की चाह को छोड़ पाना बहुत मुश्किल है। हां यह अलग बात है कि जब भी कहीं कोई फूल खिलता है तो उसकी खुशबू तो अपने आप ही फिजाओं में फैलती है। मैं परमशक्ति पीठ ओंकारेश्वर को संचालित करने वाली अपनी गुरुबहने साध्वी साक्षी चेतना दीदी को बहुत धन्यवाद देती हूं जिनके संरक्षण में रहीं हुई मेरी अनेक छोटी-छोटी शिष्याओं उत्तराखण्ड की दुर्गम परिस्थितियों में सेवाकार्य कर रही हैं। साध्वी शिरोमणि जी ने सबसे पहले सेवाकार्यों की कार्ययोजना पर काम किया। बहन विचित्र रचना ने भी अनेक दुर्गम पहाड़ी गांवों तक जाकर राहत कार्यों में अपना योगदान दिया जो अब भी वहीं हैं।
     
जब हमने उत्तराखण्ड त्रासदी पीडि़तों के लिए अपने राहत कार्य चलाने की योजना सोची तो सबसे पहले हमारे परमशक्ति पीठ आफ अमेरिका के बंधु श्री रक्षपाल जी सूद के नेतृत्व में वहां की टीम सक्रिय हुई। वो बोले कि दीदी मां हम सबसे पहले इस कार्य के लिए अपना योगदान देंगे। उनकी उस टोली के सदस्य श्री बालू जी आडवाणी एक लाख डाॅलर लेकर भारत आए और विगत गुरुपूर्णिमा के अवसर पर उन्होंने वह राशि उत्तराखण्ड आपदा राहत के लिए परमशक्ति पीठ के लिए मुझे भेंट की। हम सब हदय से उनके आभारी हैं।
    
सबसे पहले हमने यह सोचा कि इस आपदा में अनाथ हो गए बच्चों या महिलाओं को वात्सल्य ग्राम लाया जाये लेकिन गढवाली लोग किसी भी हाल में अपने गांव से पांच-सात किलोमीटर से आगे जाते ही नहीं। तो हमने विचार किया कि हम स्वयं चलकर उनके पास जाएंगे। यानि कुआं प्यासे के पास जायेगा। और फिर हमने गुप्तकाशी और उखीमठ में ‘वात्सल्य सेवा केंद्रों’ का संचालन आरंभ किया। मुझसे जुड़े हुए सभी लोग तन्मयापूर्वक इस पुण्यकार्य में सहयोग दे रहे हैं। मैं सोचती थी कि किसी भी कार्य में राजा उदार और प्रशासक कठोर होना चाहिए लेकिन कल पूज्य गुरुदेव कह रहे थे कि अगर व्यवस्थाओं के दौरान भावनाओं का ख्याल ना रहें तो व्यवस्था बेकार है और यदि केवल भावनाएं हों और व्यवस्थायें ना हों तो वो भी बेकार है। इसलिए हमें भावनाओं और व्यवस्थाओं दोनों को संतुलित करते हुए अपने कार्यों को गति प्रदान करनीं है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा 
सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, सितम्बर 2013 

Tuesday, August 13, 2013

दर्द का सैलाब जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा...

‘टूट चुकी सड़कों और कभी भी भरभराकर गिर पड़ने वाले पहाड़ी मलबे के बीच से होकर हम उत्तराखण्ड के उन गांवों की ओर बढ़ रहे थे जहाँ कई जिंदगियाँ असमय मृत्यु की भेंट चढ़ चुकी थीं। हमने देखा कि इन गांवों में हलचल के नाम पर केवल करुण स्वरों का विलाप था जो दिल को भीतर गहरे तक चीर कर रख देता था। कुछ गांवों के तो सारे पुरुष चाहे वो पति हो या बेटे, सभी उस रात हुई अनायास जल प्रलय में समा गए थे। तूफानी वेग से बहकर गुजर रही किसी पहाड़ी नदी के पास खड़े होकर विलाप करती हुई माँ जब उस नदी से अपने बेटे का शव मांगती है तो कलेजा जैसे बैठ सा जाता है। एक माह से अधिक बीत चुका...अब कोई संभावना नहीं कि अपना खोया हुआ वापिस आएगा लेकिन सूनी आंखें अब भी पहाड़ की ओर टकटकी लगाकर देखती हैं कि शायद पति या बेटा कहीं से घर लौट आए। आशा और निराशा के बीच झूलती जिंदगी मृत शरीर सी बिस्तर पर पड़ी हुई त्रासदी को भोग रही है...मैंने देखा है दर्द के उस सैलाब को अपनी आंखों से जो अब भी मौजूद है उत्तराखंड की पहाडि़यों में’

वो पहाड़ जो हमेशा से उनकी जिंदगी रहे हैं, आज उनके उन शिखरों को देखकर उन्हें सिहरन होती है जहां से पत्थर दिल मौत बरसी थी। टूटे रास्तों पर घायल पड़ी जिंदगियां राहत का रास्ता देख रही हैं। सारे देश के दिल को उत्तराखंड आपदा ने दहला दिया है। देशवासियों ने दिल खोलकर राहत कार्यों में योगदान दिया है लेकिन इस वक्त की जरूरत है घायल दिलों पर अपने स्नेह के लेपन की। अपनों को खो देने का दर्द जीवन भर सालता रहता है। आहत दिलों को अपनेपन के दुलार से राहत की जरूरत है। उत्तराखंड के दूरदराज पहाड़ों में कई गांव ऐसे हैं जहां लगभग हर घर से कोई न कोई पुरुष इस आपदा में काल कवलित हुआ है। इन तमाम गांवों में महिलाओं की आंखों में गहरा सूनापन है..प्रतीक्षा है उन अपनों की जो शायद कभी लौटकर नहीं आएंगे।
 
लगभग टूट चुके खतरनाक रास्तों और गिरते हुए पहाड़ी मलबे के बीच इन आहत दिलों को सहलाने के लिए निकल पड़ी दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा जी गहरी संवेदनाओं से भरी हुई हंै। अपने तमाम नियमित कार्यक्रमों को निरस्त कर उन्होंने उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में जाकर आपदा पीडि़तों को गले लगाया। उनकी उन सभी जरूरतों को पूरा करने का वादा किया जिनको पूरा करने का प्रयत्न करते-करते चारधाम यात्रा मार्ग में उनके पति या पुत्र मारे गए।
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मैं ऐसे ही एक गांव ल्वारा तहसील ऊखीमठ के एक घर में गई जहां.एक साधनहीन छोटे से किसान श्रीपुरुषोत्तम शुक्ला के घर में मातम पसरा पड़ा है। इस घर के दो बच्चे हेमन्त शुक्ला और अजय शुक्ला आज तक लापता हैं। मैं जब उनके आंगन में गई तो वहां की नीरवता चीत्कारों से गूंज उठी। उन बच्चों के मूक-बधिर पिता के मुंह से शब्द तो नहीं निकले लेकिन आंखों से झरते आंसू उनके हदय की पीड़ा को बयां कर रहे थे। मां सरस्वती देवी की आंखें अपने दोनों बच्चों की प्रतीक्षा मंे पथरा गई थीं। बच्चों की मौसी मुझसे लिपटकर चीत्कार करती हुई बोली -‘मां, सारे गांव के बच्चे एक-एक कर लौट आए लेकिन बस हमारे ही बच्चे नहीं लौटे। सब दिलासा देते हैं कि वो पहाडों में ही कहीं होंगे। कहां गए हमारे बच्चे?’ रोते-रोते उनका गला सूख गया। मैंने जब बच्चों की मौसी को पानी पिलाना चाहा तो उसका कुछ पलों के लिए रुका रुदन फिर से फूट पड़ा -‘क्या पानी पिउं मां, हमें पानी पिलाने वाले ही चले गए।’ पिता बोल-सुन नहीं सकता, मां स्तब्ध है और मौसी का चीत्कार दिल को दहला देता है। अपनी युवा बहन रंजना शुक्ला की शादी का सपना संजोये दोनों भाई कुछ कमाने के लिए निकले थे। उन्हीं तैयारियों में बड़े उत्साह से मकान बनवाना शुरू किया था। छत पड़ने ही वाली थी और आसमानी आफत ने घर आंगन की नींव को दरका दिया। बनते हुए मकान में बल्लियां अभी भी वहीं टिकी हुई इंतजार कर रही हैं कि उनके दमपर छत भरी जायेगी लेकिन माता-पिता के जीवन के सहारे ढह गए। उनकी लाशें नहीं मिलीं लेकिन एक माह बीत जाने के बाद जैसे उनकी उम्मीदें भी अब आंसुओं के सैलाब में बहती जा रही हैं। माता-पिता और मौसी का क्रंदन तथा बहन के चेहरे की बेनूरी ने मेरे दिल को झकझोर कर रख दिया। उनके साथ मैं भी उस सूने आंगन में देर तक बैठी रोती रही। अपने मन के पक्के संकल्प के साथ मैंने उनसे वादा किया कि हम आपके बेटों को तो वापस नहीं ला सकते लेकिन निश्चित रूप से आपकी इस बेटी की शादी का सारा खर्च परमशक्ति पीठ वहन करेगा।

समझ नहीं आता कि अपनों के बिछोह से पीडि़त लोगों को कैसे सांत्वना दी जाये, कैसे उन्हें संभाला जाये? मुझे लगा कि इस समय इन लोगों को राहत सामग्री के साथ ही स्नेह लेप की जरूरत भी है जो इनके मन के गहरे घावों को भर सके। मैंने परमशक्ति पीठ की अनेक साध्वी बहनों को इस कार्य के लिए उत्तराखंड भेजने की योजना बनाकर उसे मूर्तरूप देने की शुरूआत की है जो इस कार्य को सम्पन्न करेंगी। वे उन महिलाओं तक पहुंचने का पूरा प्रयत्न कर रही हैं जिनके पति या बेटे इस आपदा में या तो लापता हैं या मृत हो चुके हैं। संस्था से जुड़े हमारे भाई क्षतिग्रस्त हुए गांवों की नुकसानी का आकलन करेंगे और वास्तव में जिन्हें आवश्यकता होगी उन तक सहायता सामग्री पहुंचाएंगे। यह कार्य लंबे समय तक चलाये जाने की आवश्यकता है और बहुत व्यापक स्तर पर इसमें समाज के सहयोग की आवश्यकता होगी। मैं सभी देशवासियों से अपील करती हूं कि वे परमशक्ति पीठ को इस पुनीत कार्य में सहयोग देकर उत्तराखण्डवासियों की सहायता करें। 

वहां चारों तरफ बस भय ही भय है। मृत्यु के इस भय के बीच में जिंदगी कैसे जी जाती है यह पहाड़ों के बीच बसे इन गांवों में देखा जा सकता है। अजीब-अजीब सी घटनायें घट रहीं हैं। दर्द से कराह रही देवभूमि के दर्शन की इस यात्रा के अंतिम दिन हम जिस मकान में रुके थे, आधी रात के बाद उसके पास स्थित मकान से भयंकर विस्फोट की आवाज सुनकर हम लोग बाहर निकले। पास के मकान की छत उड़ चुकी थी, उसकी दीवारें चारों ओर बाहर की तरफ बिखरी हुई थीं। सौभाग्य की बात थी कि उस घर में कोई जनहानि नहीं हुई। हमने पता किया कि कहीं कोई गैस सिलेण्डर का विस्फोट तो नहीं हुआ। लेकिन घर के लोगों ने अंदर किसी भी प्रकार के विस्फोट से इंकार किया। बाहर बारिश या मकान पर बिजली गिरने जैसी भी कोई घटना नहीं हुई थी। वह एक रहस्यमयी विस्फोट था जिसने उस मकान के परखच्चे उड़ा दिए। इस घटना का आशय यह निकला कि वहां अभी भी प्रकृति कु्रद्ध है। पहाड़ों की टूटन जारी है।     
 
हमारी भारतीय संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारे संस्कार, प्रकृति के प्रति सहदय होने की प्रेरणा देते हैं। हमने अपने चित्त के अंदर जब भी परमात्मा को पाने की जिज्ञासु वृत्ति को देखा तो अनुभव किया कि नहीं हमें हिमालय की गोद में हरितिमा और प्रकृति जहां आनन्द और उत्सव के साथ अपने आपको प्रकट करती है वो देवभूमि वो देवलोक जहां हम अपने देह, मन और इन्द्रियों के साम्राज्य से परे, माया के जाल से मुक्त होकर उस परमात्म सत्ता को अनुभव कर सकते हैं तो सहज रूप से हमारे चरण उठते हैं देवभूमि हिमालय की तरफ। उत्तरांचल का वह क्षेत्र जहां बद्री भगवान अपनी विशालता को लिए हुए विराजमान हैं। नर-नारायण जहां नित्यप्रति तप-निरत हैं और केदारनाथ भगवान जहां अपने पूरे शिवत्व के साथ प्रकृति के उस अद्भुत और विहंगम दृश्यों के बीच विराजमान हैं। जहां गौमुख से निःसृहित होने वाली गंगा और यमुना मैया का उद्गम स्थान यमुनोत्री। ये चारधाम की यात्रा प्रत्येक भारतीय के हदय में एक चाह के समान होती है कि जिंदगी में कभी न कभी हमें ऐसे अवसर मिलें जब यह यात्रा कर सकें।

बहुत वर्षों पहले जब भारत में तीर्थयात्री यात्रा करता था तब उस यात्रा के पीछे तप की दृश्टि थी। साधना का मर्म था। परमात्मा को पाने की चित्त के अंदर जिज्ञासा थी। यात्री उस भावना के साथ यात्रा प्रारंभ करता था कि यदि अब लौट के नहीं भी आना होगा तो मन की पूरी तैयारी है इसके लिए। जीवन के उत्तरार्ध में, जीवन के चैथेपन में मोक्ष के द्वार पर दस्तक देने के लिए कोई भी जिज्ञासु, मुमुक्षु या भक्त केदारनाथ भगवान की शरण में जाता था। धीरे-धीरे आधुनिकता का प्रभाव हम पर हुआ और हम सुविधाभोगी जीवन जीने के आदी हुए। हम जीवन के ‘कम्फर्ट झोन’ में जीना चाहते हैं। तीर्थयात्रा में रहकर भी तीर्थत्व का भाव न रहते हुए जब मनोरंजन का भाव प्रबल हुआ तो फिर इस यात्रा का स्वरूप बदला। बड़ी संख्या में बाल-बच्चे और युवा जोड़े इन तीर्थयात्राओं की तरफ उन्मुख हुए। एक ओर तो यह बहुत संुदर लगता है कि हमारी युवा तरुणाई तीर्थयात्राओं पर जा रही है, लेकिन दूसरी ओर लगा कि इस यात्रा के पीछे जो यात्री का एक चित्त होता है, भगवान को पाने की अभिलाषा होती है वह नहीं थी। वर्षों पहले इस यात्रा में दुर्गम रास्तों और पर्वत श्रंृखलाओं के बीच में भीषण ठंड को झेलते हुए यात्री तप-निरत रहता था। मौन रहते हुए उस परम स्थिति को प्राप्त करने के लिए वह यात्रा एक साधना की तरह होती थी। अब वह समय बीत गया है। हम सब सुविधा में जीना चाहते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि यात्रा, यात्रा नहीं रह गई। तीर्थों में जाकर तीरथवास करने के भाव से हम कोसों दूर चले गए। दुष्परिणाम सामने है। प्रकृति कुपित हुई, देव कुपित हुए और हमने देखा कि कैसे मनुष्यता विवश होकर मंदाकिनी के प्रवाह में तिनकों की तरह बिखर गई। हमारी व्यवस्थायें बिखर गईं। हम अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं के जिन भवनों को मंदाकिनी के प्रवाह मार्ग में बनाकर बैठे थे वो ताश के पत्तों की तरह ढह गये। परिणामस्वरूप बहुत दण्ड भोगा। किसने भोगा यह दण्ड? सारे देश ने यह दण्ड भोगा लेकिन सबसे ज्यादा उन्होंने भोगा जिनका कोई दोष नहीं था। उन बहनों, उन देवियों का क्या दोष जिन्होंने अपनी मांग के सिंदूर खो दिए, अपने पुत्रों को खो दिया। मै इस दृष्टि से उत्तरांचल के प्रवास में आई कि मैं स्वयं वहां देखूं कि वहां क्या स्थिती है, हम कहां किस पीडि़त के साथ किस प्रकार से खड़े हो सकते हैं।
    
उत्तराखंड के उन गांवों में जाकर यह दर्दनाक बात पता चली कि दसवीं-बारहवीं कक्षाओं के अधिकांश बच्चे उस
जल त्रासदी में समा गए। माताएं प्रतीक्षा करती रह गईं अपने बच्चों की। देवियां अपने पतियों की प्रतीक्षा करती रह गईं। उनके रुदन, उनके विलाप चित्त को विव्हल करते हैं। उनके हदय से उठती हूक दिशाओं को भी क्रंदित कर देती है। हमारे जैसे साधु-साध्वियों का चित्त भी मौन हो जाता है। ढांढस के शब्द छोटे पड़ जाते हैं। इन सारी विडंबनाओं के बीच चिंतन चलता है कि हम कहां थे और आज कहां आ पहुंचे। अगर देखा जाये तो उत्तरांचल का जीवन ही अपने आप में एक त्रासदी है। केदारनाथ, उखीमठ और उत्तरकाशी के गांव-गांव मंे घूमते हुए मैंने अनुभव किया कि वहां कि प्रत्येक रात दुःखों और मुसीबतों से भरी हुई है। तेज बारिश कहीं हमारी छत को न बहा ले जाये। पहाड़ का मलबा कहीं हमारे पूरे घर को ही समेटकर नहीं में न गिरा दे, इन सारी आशंकाओं के बीच वहां के निवासियों की रातें कटती हैं। जाने कब बादल फट जायें और विपत्ति जाने किस रूप में जाने कब सामने आकर खड़ी हो जाये। यात्रा करते समय हमने देखा कि हमारे सामने ही पर्वत से एक बड़ा पत्थर टूटकर नीचे गिरा और वहां खड़े एक तरुण की मृत्यु उसके आघात से हो गई।
    
भय के बीच में जीवन कैसे जिया जाता है इसे मैं अभी उत्तराखण्ड में देखकर आई हूं। मन में चिंतन चल रहा है कि इन सारी परिस्थितियांे के बीच हम क्या कर सकते हैं मैं तो बस यही संभावनायें तलाश रही हूं। यहां मृत्यु को साक्षात नृत्य करते हुए मैंने देखा है जहां प्रत्येक व्यक्ति बस मृत्यु से ही घिरा हुआ हैै। मृत्यु के इसी तांडव के बीच जीवन को संभालना बस यही इंसानियत का गौरव और जीवन की धन्यता है।
    
मुझे लगता है कि कदाचित् हमने प्रकृति के साथ अपना सहधर्म निभाया होता तो शायद यह स्थिति नहीं आती। हमारी पूरी पूजा पद्धति, हमारी मान्यताएं, परंपराएं प्रकृति के साथ सहधर्म निभाने की पे्ररणा देती हैं। हमारे कर्मकाण्ड आप देख लीजिए जिसमें तुलसी है, दुर्वा है, पुष्प हैं, बिल्व पत्र हैं। प्रकृति के माध्यम से हम परमात्मा को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे समय में जब हमारी महत्वाकांक्षायें सिर उठा रही हैं तब हम प्रकृति का दोहन-शोषण कर रहे हैं। मां के स्तन से दुग्ध का पान तो शोभा देता है लेकिन मां के स्तन से रक्त का पान करें यह निश्चित रूप से अशोभनीय है। हमने प्रकृति के साथ बिलकुल ऐसा ही व्यवहार किया है। उसके दोहन की सारी सीमाओं का अतिक्रमण हमने किया। परिणाम सामने है। 
    
हिमालय के शिखरों पर जहां भगवान केदारनाथ अपने विभिन्न रूपों में विराजमान हैं हमने इन पुण्यस्थलों को पिकनिक स्पाॅट बना डाला। भगवान शिवशंकर जहां शान्त भाव से तप-निरत रहते हैं हमारे कोलाहल ने निश्चित रूप से उसमें व्यवधान डाला है। लोग पहले वहां जाते थे और भगवान को प्रणाम करके लौट आते थे, एक नई ऊर्जा से भरकर। लेकिन आज वहां जाने कितने होटल बना दिए गए हैं। जब हम लंबे समय तक देवों या गुरु के पास रहते हैं तो उनके सम्मान में मर्यादायें बनाये रखना कठिन होता है।
    
शायद भगवान केदारनाथ को यात्रियों का यह अमर्यादित व्यवहार पसंद नहीं आया। वहीं पर मलमूत्र का त्याग करना, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करना, संभवतः यही दुराचरण इस विनाशलीला का कारण बना और भगवान ने एक ही क्षण मंे यह सब समेट दिया। प्रकृति ने हमें हमारी सीमायें बता दीं। अब समय आ गया है हमारे आत्मचिंतन का। विकास कैसा होना चाहिए इस पर चिंतन होना चाहिए। आज हिमालय में विकास के नाम पर चारों ओर डायनामाइटों के विस्फोट किए जा रहे हैं। एक विस्फोट होता है और चारों दिशाएं हिल जाती हैं। चारों ओर पर्वत शिखरों का क्षरण हो रहा है। हिमालय का मलबे में बदलना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारी व्यवस्थाओं में प्रकृति के प्रति संवेदना होनी चाहिए।
    
भारत ने सदैव कहा है कि त्यागपूर्वक भोगने में ही सुख है। जब त्याग जीवन का लक्ष्य नहीं रह जाता तब मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता वह भक्षी बन जाता है। वह प्रकृति का भक्षण करता है, वह मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, वह धर्म के द्वारा प्रदत्त मान्यताओं का भक्षण करता है। और जहां धर्म भी व्यापार जाये, जहां भगवान के सम्मुख खड़े होने के लिए भी तुम्हें दो नंबर के रास्ते तलाशने पड़ें, वहां दुर्भाग्य के अतिरिक्त फिर और कुछ हो ही नहीं सकता। पैसा दोगे तो फिर शार्टकट में भगवान के दर्शन हो जाएंगे। क्या भगवान केदारनाथ को यह स्वीकार होगा कि एक ओर तो जिनके पास पैसा नहीं है वह पसीने से लथपथ जनता घंटों तक पंक्ति में खड़ी रहकर उनके दर्शनों की प्रतीक्षा करे और आप धन के बल पर कुछ मिनटों में ही भगवान के सम्मुख पहुंच जायें। जिन्हांेने प्रकृति का अपमान किया वे मेरी मूर्ति की आराधना करने आ गए। नहीं भगवान को यह स्वीकार नहीं हुआ। और संभवतः उनका ऐसा भीषण तांडवी रूप हमारे सम्मुख आया है।
    
आने वाला समय कैसा होगा मैं यह बता नहीं सकती क्योंकि मैं भविष्यवक्ता तो हूँ नहीं लेकिन निश्चित रूप से उत्तराखण्ड के इस प्रवास ने चित्त को बहुत व्याकुल किया है। मैं घर-घर गई, गांव-गांव गई, एक-एक बहन को गले लगाया, उसकी आंखों के बहते अश्रु प्रवाह के आगे कदाचित मंदाकिनी का प्रवाह भी मद्धिम लगा। वह प्रवाह प्रश्न करता है कि आखिर हमारा क्या दोष था? ये किसके कर्माें का दण्ड हमें भोगना पड़ा? शब्द को ब्रम्ह कहा जाता है लेकिन शब्द ब्रम्ह से भी परे है उस अबला के दुःख को व्यक्त करना जो इस जगत में नितांत अकेली रह गई हो, जिसने अपने किशोरवय बच्चों को खो दिया हो, जिसकी पथराई हुई आंखें आज भी प्रतीक्षा करती हैं कि जाने कौनसे पहाड़ से उतरकर मेरा पुत्र मेरे घर-आंगन को महका देगा। ऐसी विलाप करती माताओं, बहनों और पत्नियों के बीच बैठकर ऐसा लगा जैैसे कि यदि कोई पत्थर भी हो तो शायद इनका दर्द अनुभव कर पिघल जाएगा। इन सबकी सहायता करने के लिए हमने ऊखीमठ और गुप्तकाशी में परमशक्ति पीठ वात्सल्य सेवा केंद्र स्थापित किए हैं जहां लगातार प्रवास करके हमारी साध्वी बहनें और कार्यकर्ता भाई प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन और उन्हें वांछित सहायता पहुंचाने का हरसंभव प्रयत्न करेंगे। उत्तराखण्ड के इन प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय तक कार्य करके वात्सल्य अपनी भूमिका निभायेगा।     
- दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा
सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, अगस्त २०१३