About Didi Maa

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Saturday, April 11, 2015

निष्क्रिय सज्जनता किसी काम की नहीं होती

‘आज यहाँ पोर्टब्लेयर में विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह में भाग लेते हुए मैं बहुत भावुक हूँ क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद और मेरे जीवन को एक साथ पचास वर्ष पूरे हुए हैं। मेरा जीवन हिन्दू जाति की सेवा करने के लिए है और मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी मृत्यु भी हिन्दू स्वाभिमान के लिए लड़ते हुए हो तो शायद मेरी मृत्यु भी सार्थक हो जाए। क्योंकि मैं मानती हूँ कि मेरे रोम-रोम में मेरी परम्परा का रक्त बहता है। आप उस भगवा को पूजते हो जिसके पीछे सूर्य का तेज है, चन्द्रमा की शीतलता है, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु और वीर सावरकर जैसे हुतात्माओं का समर्पण है। 

भगवा को प्रणाम करना यानि भारत की उस उज्ज्वल परम्परा को प्रणाम करने जैसा है। मैं समझती हूँ कि सारा विश्व त्राण पाएगा जब हिन्दू विचार प्रबल होकर सारे विश्व के जनमानस में फैलेगा क्योंकि जहाँ हिन्दू है वहाँ सब सुरक्षित हैं हिन्दू ही है जो दुनिया भर के मतावलंबियों को अपने में आत्मसात् कर लेता है। हमारी आस्था तो वह है जो पत्थर पर भी सिन्दूर चढ़ाकर हनुमन्तलाल को प्रकट कर देती है इसलिए इस आस्था में जीने वाले, इस श्रद्धा को जीने वाले हम हिन्दू, हमें समझाएंगे ये फिल्म बनाने वाले लोग कि कैसी होनी चाहिए हमारी पूजा पद्धति? एक फिल्म और भी बनी है उसमें भी सच को सच बताया है। हमारे सामने समस्या यह नहीं है कि हम पूजा पद्धति कैसे रखें। हमारे सामने समस्या यह है कि भारत को तोड़ने वाली ताकतें प्रबल होकर, भारत में भेष बदलकर घूम रही हैं और अपने मंसूबों को कारगर सिद्ध करने में लगी हैं। इस समस्या का एक ही समाधान है सजग भारतीय, जागरूक भारतीय और सबसे बड़ी बात निष्ठावान होकर सक्रिय भारतीय। आप भले ही निष्ठावान हो लेकिन निष्क्रिय रहो तो भला किस काम के? आपकी सज्जनता किस काम की? बहुतेरे सज्जन पलायनवादी होते हैं। वो बुरों के लिए रास्ता छोड़ देता है। अरे सज्जन हो तो भी सीना तान के खड़े होना सीखो। किस बात का डर है?

इस अवसर पर विहिप के अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त सचिव श्री राघूवल्लभजी, विहिप स्वर्ण जयंती समिति के अध्यक्ष श्री उत्पल शर्मा, मंत्री श्री ए.के.माहेश्वरी एवं विहिप अंडमान-निकोबर द्वीप समूह के संगठन सचिव श्री पार्थ मण्डल प्रमुख रूप से सम्मिलित हुए।

दिनांक 31 जनवरी 2015
विश्व हिन्दू परिषद स्वर्ण जयंती समारोह
पोर्टब्लेयर, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह

Monday, April 6, 2015

तीन बातें सफलता की...

एक बहेलिये ने जंगल में एक नन्हें से पंछी को पकड़ लिया। वो बेचारा चिल्लाने लगा -‘मुझे छोड़ दो, मुझे छोड़ दो। देखो तो, मैं कितना छोटा सा हूँ। अगर तुम ये सोचते हो कि तुम मुझे बनाकर खाओगे तो मेरे जरा से मांस से तुम्हारा पेट भी नहीं भरेगा। मैं इतना सुन्दर भी नहीं हूँ कि तुम मुझे किसी को बेच दो क्योंकि पंछियों को लोग इसीलिए खरीदते हैं कि या तो वो बोलते हों या फिर उनके पंख सुन्दर हों। मेरे साथ तो ये दोनों ही बातें नहीं हैं। इसलिए तुम मुझे छोड़ दो।’

    बहेलिये ने कहा -‘नहीं छोडूँगा।’ यह सुनकर पंछी ने कहा -‘जीवन में हमेशा सफल रहने के तीन रहस्य मैं तुम्हें बता सकता हूँ लेकिन तभी जब तुम मुझे छोड़ दो।’ उस बहेलिये के मन में लालच पैदा हुआ -‘अरे! ये नन्हा सा पंछी मुझे सफलता के तीन रहस्य बनाएगा!’ उसने लोभवश तुरंत उसे जाल से आजाद कर दिया। छूटते ही वह पास के एक पेड़ पर जा बैठा। बहेलिये ने कहा -‘लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया। तुम कहते थे ना कि सफलता के तीन रहस्य बताओगे। अब बताओ मुझे वो रहस्य।’

    पंछी बोला -‘सबसे पहला रहस्य तो यह है कि जो बात तुम्हारी बुद्धि में ना आए उसको मानना नहीं।’ जैसे कि मैं आप सब सामने बैठे बच्चों से यह कहूँ कि -‘ये जो बिटिया बैठी है ना, इसको रात को पंख निकल आते हैं। फिर ये उड़कर उस मन्दिर के ऊपर बैठ जाती है। तो बताओ बच्चों, क्या इस बात को आपकी बुद्धि कभी मानेगी? जो बात आपकी बुद्धि में ना समाये उसे कभी मत मानना।’ फिर बहेलिये ने कहा दूसरा बताओ। पंछी ने कहा -‘दूसरा रहस्य यह है कि असंभव को संभव बनाने की कोशिश नहीं करना। जो हो नहीं सकता उसे करने की कोशिश कभी नहीं करना।’ जैसे मैं आपसे पूछूँ कि कोई इंसान कहे कि मैं तो मरूँगा ही नहीं। तो क्या उसका हमेशा जीवित रहना संभव है? क्या वह कभी नहीं मरेगा?’ और उस पंछी ने तीसरा रहस्य बताया कि -‘नुकसान हो जाने के बाद कभी भी पछताना नहीं।’

    ये तीन रहस्य हैं सफलता के। यह सुनकर वह बहेलिया चिल्लाने लगा -‘तू बड़ा ही बुरा पंछी है, तूने मुझे धोखा दिया है। ये भी भला कोई रहस्य हैं। मैं तो समझता था कि तू पता नहीं कौन सा खजाना मुझे बताने वाला है।’ तो पंछी ने कहा -‘ऐ भाई सुनो, इधर देखो मेरी ओर।’ बहेलियों ने जब उसकी ओर देखा तो वह बोला -‘मेरे दिल में कोहिनूर हीरा है।’ जैसे ही बहेलिये ने ये सुना वह पेड़ पर चढ़कर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा। पंछी एक डाल से दूसरी डाल उसे नचाता हुआ उड़कर दूसरे पेड़ पर जा बैठा। बहेलिया फिर दूसरे पेड़ पर चढ़ा। इसी अफरातफरी में बहेलिया पेड़ से नीचे गिर पड़ा और उसका एक पैर टूट गया। नीचे पड़ा-पड़ा वह पछता रहा था -‘अरे, मैंने इसे क्यों छोड़ा। मैं मारने के बाद इसे काटता तो इसके दिल से कोहिनूर हीरा निकलता।’

    पंछी फिर से उसके पास आकर बोला -‘देखो, तुमने मेरी एक भी बात नहीं मानी। मैंने तुम्हें सफलता के तीन रहस्य बताए थे। एक - जो बुद्धि में ना आए उसे मत मानो। दूसरा - असंभव को संभव करने की कोशिश ना करो और तीसरा - हानि हो जाने के बाद पछताना नहीं।’ मेरे दिल में कोहिनूर का हीरा है भला यह बात बुद्धि में आने जैसी है क्या? फिर भी तुमने मुझे पकड़ने का प्रयास किया। मेरे तो पंख हैं लेकिन तुम्हारे नहीं, तुम मुझे कैसे पकड़ सकते हो? क्या यह असंभव नहीं था जिसे तुमने संभव बनाने का प्रयत्न किया। तीसरा जब मैं तुमसे छूट ही गया था तो फिर पछताते हुए तुम मुझे पकड़ने की हाय-हाय में क्यों दौड़े जिसके परिणाम में तुम्हारा पैर टूट गया?

जीवन में इन तीन बातों को ख्याल रखना बहुत जरुरी है। यह केवल एक मनोरंजक कहानी नहीं है बल्कि जीवन की बड़ी सीख मिलती है। अक्सर हममें से अधिकतर लोग कही-सुनी बातों पर विश्वास कर लेते हैं। उन बातों पर भी अमल करना शुरू कर देते हैं। जिन्हें पहली बार सोचने में तो हमारी बुद्धि ही उसे मानने से इंकार कर देती है, फिर केवल अपनी जिद के कारण हम जीवन में बहुत से ऐसे कार्यों को पूरा करने की कोशिश में अपना ऊर्जा नष्ट करते हैं जो संभव ही नहीं होते। जिन्हें लाख प्रयत्न करने पर भी संभव नहीं बनाया जा सकता और फिर इन दोनों ही बातों के कारण जब कभी भी हमें बहुत बड़ी हानि होती है तो हम पछताने की प्रक्रिया से गुजरने लगते हैं जो अंततः हमें मानसिक अवसाद तक ही स्थिति में पहुँचा देती है। इस कहानी को सदैव स्मरण रखें और अपने जीवन को सार्थक बनाने में स्वयं की सहायता करें।

साभार - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Saturday, April 4, 2015

सुखी हो जाने की कला

हम स्मरण करते हैं भारत के उन सत्पुरुष महामानवों को जिनका स्मरण मात्र ही चित्त में पावनता का संचार करता है। कदाचित अपने स्वरूप को, अपने आप को खोकर जीने का अर्थ समाप्त हो जाता है। दूसरों के श्रेष्ठ को धारण स्वीकार करना, ये मनुष्य की गरिमा होती है लेकिन अपने श्रेष्ठ को भूल जाना ये मनुष्य का आलस्य और प्रमाद होता है, आत्महीनता की पहचान होती है, इसलिए मेरा जो अपना श्रेष्ठ है जो मुझे मेरे पुरखों से मिला, मेरी परम्परा से मिला, मेरे धर्म से मिला, मेरे देश की माटी के सौंधेपन से मिला, वो है कपिल, कणाद की परम्परा से मिला और सबसे खूबसूरत जो मिला वो भारत की धरती पर ‘मातृभाव’ मिला, ‘मातृसत्ता’ मिली। भारत की मानवी ने जाना कि माँ होने के अर्थ क्या होते हैं। माँ कैसी होती है, माँ क्यों होती है और माँ की गरिमा क्या होती है। अगर सारे विश्व की मानवी को टटोलोगे तो भारत की स्त्री में ही वह स्वरूप दिखाई देगा जो धन्य करता है मनुष्यता को। सबसे पहले भारत ने ही दी है - मातृसत्ता। एक जगह चर्चा चल रही थी कि बच्चों का अच्छा विकास कैसे होगा। संभव है, उन्हें अच्छा भोजन दो, अच्छा वातावरण दो, अच्छी औषधियाँ दो, बच्चा अच्छा बनेगा लेकिन कैसे अच्छा बनेगा अगर उसे जन्म देने वाली माता आत्महीनता की शिकार है, अगर वो मानुषी भाव को खो चुकी है, अगर वो मातृत्व की गरिमा को नहीं पहचानती, अगर वो ये नहीं जानती की संसार का सबसे श्रेष्ठ सृजन मेरे हाथों से हो रहा है, तो फिर उस संतान को मानसिक, आत्मिक और शारीरिक विकास कैसे मिल सकता है? इसलिए अगर भारत अपनी संतानों को खूबसूरत देखना चाहता है, सर्वगुण सम्पन्न देखना चाहता है तो फिर कार्य तो भारत की स्त्री पर ही करना होगा।

आज से बहुत वर्षों पहले विदेश से एक विद्वान आए थे महाराष्ट्र के अन्दर। एक गाँव देखा था उन्होंने। उसके जलाशय के अन्दर स्नान करती स्त्रियों को देखा उन्होंने। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि मैंने देखा भारत की स्त्री को, जिसका तन और मन दोनों की बहुत सुन्दर हैं। सकुचा गई थीं वो देवियाँ, जलाशय के पास किसी पराये पुरुष को देखकर। लज्जा, शील, संकोच ये भारत की स्त्री के आभूषण हैं। कदाचित् वो खुलती हैं अपनों के बीच में, लेकिन जब कोई पराया दिखता है तो संकोच में सिकुड़ती जाती हैं। और उनका वही शील उनको खूबसूरत बनाता है। उनका वही शील उनको धन्य बनाता है। उनको चरित्र के शिखर पर पहुँचाता है। उन्होंने लिखा कि कदाचित् यूरोप की स्त्री उस गरिमा को समझ नहीं पाएगी क्योंकि वो अपनी मानसिक और शारीरिक भूख को मिटाने के लिए अपनी संतान को छोड़कर पराये पुरुष के साथ जाती है, अपने पति का त्याग कर देती है, और उसका अपना पति किसी विवाहित स्त्री के साथ अपनी वासना तृप्त करने के चक्कर में लगा रहता है जिसके कारण किसी और का घर बिगड़ जाता है। इस चक्कर में वे संतानें अकेली रह जाती हैं जो किसी भी देश का भविष्य होती हैं। यूरोप की स्त्री कभी नहीं समझ पाएगी उस भाव को, जिसे भारत की स्त्री अपने मन-मानस में जीते हुए अपने घर में स्वर्ग को उतार लेती है।

    लौटकर देखिये उस चिन्तन को, आप कहोगे कि जब हम अपनी बात कहेंगे तो लोग कहते हैं कि ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।’ लेकिन यदि आप संसार में घूमकर टटोलेंगे तो आपको मानना ही पड़ेगा कि आपके ऋषियों ने आपको जो दिया है वो संसार की सबसे श्रेष्ठ जीवन पद्धति है। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज, वो एक पुत्र ही तो थे, माँ भारती के लाल ही तो थे। इटली गए थे वो। वहाँ की एक स्त्री ने प्रस्ताव रखा था उनके सामने कि विवेकानन्द तुम कितने खूबसूरत हो, तुम्हें देखकर चित्त में लालसा पैदा होती है। चित्त के अन्दर वो एक भाव पैदा होता है जो कहता है कि तुम मुझे अंगीकार करो। मुझे आलिंगन में बाँधो। वचन देती हूँ कि तुम्हारे जैसा बेटा पैदा करूँगी। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा -‘मेरे जैसा तो मैं ही हो सकता हूँ देवी। इसलिए आज से मुझे अपना पुत्र स्वीकार कर लीजिये और मेरी माता बन जाइये।’

    इस देश के अन्दर यहीं तक नहीं स्वर्ग की अप्सराओं को भी ऐसा ही उत्तर अर्जुन ने दिया था, जब उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय कामना की थी। उर्वशी ने कहा -‘तुमने मेरे प्रणय निमंत्रण को ठुकराया है। याद रखना, तुम किन्नर बनोगे।’ तब अर्जुन ने कहा था -‘देवी, नपुंसक बनना स्वीकार कर लूँगा, उस समय का भी कोई सदुपयोग हो जाएगा लेकिन मेरे चित्त में तुम्हारे प्रति वासना पैदा हो नहीं सकती।’ ये वो प्रामाणिक देश है जिसके देशवासियों ने अपने जीवनमूल्यों को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ जिया। आज कहाँ खड़े हैं हम? जीवन के प्रत्येक मोड़ पर मैं अपनों से पूछ रही हूँ - हम दुनिया को बदल रहे या हमको बदल रही है दुनिया।

आज पश्चिम का कितना बड़ा प्रभाव है हम पर। हमें भौतिकता के शिखर छूने हैं। हमें वस्तुएं चाहिए। दुनिया भूल गई हमको, लेकिन हम नहीं भूलते दुनिया को। पदार्थ चाहिए हमको? आश्रमों में सारा संसार आता है, ध्यान की गहराईयों में उतरने के लिए और भारत का कोई भी व्यक्ति बैठता है गोरी चमड़ी वाले के पास और पूछता है -‘कैमरा बेचोगे?’ कितना अन्तर है उस गोरे की दृष्टि हमारे ज्ञान पर, हमारे ध्यान पर और हमारी दृष्टि उसकी वस्तु पर। क्या हुआ? ये कैसा आकर्षण पैदा हुआ? क्या भारत के ऋषि उस युग को भारत के अन्दर नहीं लाये थे जब हम भौतिकता के शिखरों पर भी थे। मन की गति से चलने वाले विमान थे हमारे पास। उन युगों में भी हम उन्नति और प्रगति के शिखरों पर थे। ‘हिन्दू मिथक’ कही जाने वाली अनेक मान्यताओं का आश्रय भी अपने आधुनिक अविष्कारों के लिए वर्तमान युग के वैज्ञानिकों ने लिया लेकिन हमारे ही देश में अपनी परम्पराओं को गाली दी गई। अपने ही मुँह पर तमाचा मारने को प्रगतिशीलता कहा गया। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जहाँ आकर खड़े हैं वहाँ बड़ी विचित्र स्थिति है। हम दूसरों को देखकर सोचते हैं कि हम दुनिया के साथ दौडेंगे, लेकिन कभी लगता है कि हम ध्यान में उतर लें और कभी लगता है कि धन बटोर लें। जीवन दुविधा में है। स्पष्टता नहीं है।
आज इन स्थितियों पर आकर विचार करना बहुत प्रासंगिक है। स्वामी विवेकानन्द का स्मरण करते हुए हम अपने मूल्यों को स्पष्टता से देखें। विचार करें कि हमारा लक्ष्य क्या है? क्या स्त्री भोग्या है, कामिनी है, क्या उसको केवल अपने तन की सुन्दरता का ही ख्याल रहेगा? क्या तन नंगा और मन क्रूर हो जाएगा तो हम धन्य हो जाएंगे? चिन्तन तो करना चाहिए कि मेरे तन का नंगापन और मेरे मन की क्रूरता मेरी संतानों को कहाँ ले जाएगी? मेरे राष्ट्र को कहाँ ले जाएगी? मेरे समाज को कहाँ ले जाएगी? ये धन की भूख और ये भौतिकता की लालसा क्या मेरे घर को बिखरा तो नहीं देगी? क्या मुझे इसका चिन्तन नहीं करना चाहिए? हाँ, हम प्यार करते थे व्यक्तियों से और इस्तेमाल करते थे वस्तुओं का। अब हम प्यार करते हैं वस्तुओं से और इस्तेमाल करते हैं व्यक्तियों का। दोहन करो, शोषण करो, किसके साथ खड़े होने से लाभ होगा और किसके साथ बात करने से हानि हो जाएगी, यदि हमारे चिन्तन की यह धारा हो गई तो फिर समझ लीजिये कि कहाँ पहुँचेंगे हम।

    आप सोचोगे कि दीदी माँ तो अपनी बात ही निराशावाद से प्रारम्भ कर रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कभी-कभी स्वयं का पोस्टमार्टम करना भी जरूरी होता है। अपने चेहरे के रोग को पाऊडर से ढाँकना, ये कोई रास्ता होता नहीं। पहले रोग को स्वीकार किया जाए फिर उसका इलाज संभव होता है। रोग को अगर हम छुपाने की कोशिश करते हैं तो फिर वो लाइलाज बनता है। तो रोग क्या है? आत्महीनता रोग है। यही हमारी सबसे बड़ी रुग्णता है। अपने श्रेष्ठ के प्रति श्रद्धा का अभाव, ये रोग है। हाँ मैं मानती हूँ कि सामाजिक जीवन में फोड़े पैदा हुए। दुष्वृŸिायाँ आईं, कुरीतियाँ आईं। फोड़े का इलाज होना चाहिए ना? उसके लिए पूरे शरीर को खण्ड-खण्ड करके फेंका तो नहीं जा सकता ना? हमारी गुलामी के लंबे काल ने हमारे समाज को आत्महीन बनाया, यह सच है।

कभी-कभी चर्चा होती है श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की, कि क्यों हम गलियों की खाक छानते रहे। क्या हमें नहीं पता कि परमात्म सत्ता केवल एक मन्दिर तक ही सीमित नहीं बल्कि वो तो कण-कण में व्याप्त है? फिर क्या कारण था कि एक मन्दिर के लिए गाँव-गाँव और नगर-नगर भटक रहे थे हम लोग? वो मात्र एक मन्दिर का विषय नहीं था। वो भारतीय परम्परा के तेज और ओज तथा भारतीय स्वाभिमान, जो धुआँ बनकर उड़ रहा था आसमान में, को स्थापित करने का एक महा अभियान था। बुनियाद थी वो, जिस पर आज आप स्वाभिमान को भव्य भवन देख रहे हो। आज आप वो दिन देख पा रहे हो जब देश के प्रधानपन्त दुनिया में जाकर कहते हैं कि मेरे पास देने के लिए गीता से बढ़कर और कुछ नहीं है, और आपके पास गीता से बढ़कर पाने के लिए और कुछ नहीं है। इस दिन को देखने के लिए आँखें तरस रही थीं। क्या इतने थोड़े से समय में हमें नरेन्द्रभाई ने भव्य भारत दे दिया? लेकिन उसी दिन धन्य हो गई चित्त-चेतना, जिस दिन भारत माता का वो लाल काशी में गंगा के किनारे हाथ में दीप पकड़कर खड़ा हो गया। बाबा काशी विश्वनाथ के मन्दिर में उन्हें अभिषेक करते देखने के बाद छह घण्टों तक मेरी आँखों से अश्रुधारा बहती रही। मैंने अपने गुरुदेव से कहा -‘गुरुदेव, मैं थक गई रोते-रोते।’ वे बोले -‘ऋतम्भरा, आँखों ने वह दिन देख लिया जिसके लिए वर्षों से हम लोग गाँव-गाँव और गली-गली देशाटन कर रहे थे।’ लोग मुझसे पूछते थे कि आप क्यों भटक रही हो हिन्दुस्तान में? हम एक ही बात कहते थे कि बस एक ही चाह है:

लोकसभा बासन्ती चोला पहन के जिस दिन आएगी
गली-गली मेरे भारत की वृन्दावन बन जाएगी

अब हम सब मिलकर निश्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तब ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देश की दशा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निष्ठावान होकर अपने राष्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देश सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है। आप अंदाजा लगाकर देखो देवियों, देने में सुख है कि पाने में सुख है। आज के दौर में सब कहते हैं कि हमें अपनी तरह से जीना है। अरे भाई, ये अपनी तरह से जीने का अर्थ क्या है? मैं  विरोध नहीं करती प्रगति का, लेकिन कहाँ ले जाकर खड़ा करेगी ये स्वच्छंदता हमें? बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में पहुँचाएगी। संतानें ‘अवैध’ रूप से जन्मेंगी जिन्हें अनाथाश्रमों में पलना पड़ेगा। ये जो स्वच्छंदता है, घर के तिनके बिखेर देगी। माँ-पिता को लज्जित कर देगी और हम सुखी हो जाएंगे, यह संभव नहीं है।

    क्या है एक परिवार की संकल्पना? मेरा दिल जो कर रहा है उसमें पिताजी राजी हैं या नहीं?, और अगर उनकी रजामंदी है तो फिर जो मैं कर रहा हूँ, वह वास्तव में करने लायक है। यदि वे राजी नहीं हैं तो फिर मेरा मन ‘मनमुखी’ तरह से चल रहा है और वह कार्य करने लायक नहीं है, जिसे मैं चाह रहा हूँ। गुरुजनों को देखते हैं, बड़ों को देखते हैं, अग्रजों को देखते हैं, उनका कहा मानते हैं, यही तो है परिवारभाव। अब इस बात के लिये कोई राजी नहीं है कि जो बड़े कर रहे हैं हमें उसमें अपनी सहमति देनी है। महिलाएं कहती हैं कि हम घर में भले ही आया रख लेंगे लेकिन ये सासू जी का अनुशासन झेलने को तैयार नहीं हैं। अब स्थिति क्या हुई कि जो देश की संतानें हैं उनको बाईयाँ पाल रही हैं, जिनको दादियों और नानियों की गोद में पलना चाहिए था। संयुक्त परिवार की रसधार केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि दस व्यक्तियों से जुड़ी होती है। आज एकल परिवारों में रहने वाले पति-पत्नी में अगर कुछ गड़बड़ हुई तो कई बार उनमें से कोई एक पंखे से लटकता हुआ मिलता है क्योंकि दोनों को समझाने वाला कोई नहीं था। पहले कितने रिश्ते हुआ करते थे। पड़ोसी तक घर के किसी विवाद में बड़े ही अधिकारपूर्वक हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाला करता था। जीवन व्यर्थ नहीं लगता था। आज केवल एक के ही साथ चित्तवृत्ति अटक गई है। हमारे मूड के आन/आॅफ का स्विच ही किसी और के हाथ में होता है। हम कहते हैं ना कि हमारा मूड आॅफ है आज।

    कई बार लोग मुझे कहते हैं कि हम दिल से नहीं हँस पाते। मैंने कहा अरे भाई क्यों नहीं हँस पाते। भगवान ने इंसान को हँसने के लिए ही तो भेजा है दुनिया में। आप ये बताओ कि कभी किसी गधे को हँसते देखा है आपने? क्यों बोझिल होते हो आप? क्योंकि अहंकार की चट्टान छाती पर रखकर बैठे हो। अभिमान है - नाम का, धन का, पद का, प्रतिष्ठा का। बहुत ऊँचे शिखर पर भले ही पहुँच गए हो लेकिन जानते हो शिखर का सच? शिखर हमेशा अकेला होता है और अपने आप में जो अकेला होता है वह संसार का सबसे अभागा मनुष्य होता है। 

सौभाग्यशाली वह है जिसे विश्व की ख्याति मिल जाए तो भी वो अपने माँ-पिता के चरणों में आकर वैसे ही बैठे जैसे कोई नन्हा बच्चा अपने माँ और पिता का आँचल पकड़कर मचलता है। भारतीय चिन्तन को धारण करके क्या कभी उदासी आ सकती है मन में? नैराष्य कभी आ सकता है? हँसिए, मुस्कुराईये और इस बात को निश्चित कर लीजिये कि केवल अपने लिए ही नहीं जीना बल्कि अपनों के लिए भी जीना है। केवल अपनों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, जड़-जंगम सारा ब्रह्माण्ड अपना है यह भाव जिस दिन मन में आ गया उस दिन अपना संसार के सबसे सुखी मनुष्य होने का दर्जा प्राप्त कर लोगे।

अब हम सब मिलकर निष्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देष की दषा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निश्ठावान होकर अपने राश्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृश्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निष्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देष सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है।

साभार - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Tuesday, January 20, 2015

वृद्धों की सेवा हमारा नैतिक दायित्व

‘हमारे समाज में ऐसे कितने बच्चे हैं जो बड़े होकर अपने बचपन को याद करते होंगे? जब रातों को सोते समय हम अपने बिस्तर पर ही मल-मूत्र का त्याग करते थे। जब हमारी माँ ने न जाने कितनी रातों को हमारे मूत्र से बिस्तर के गीले हो उठे भाग पर स्वयं सोकर हमें सूखे में सुलाया होगा। हमारी एक खाँसी और छींक पर वह सारी रात सोई नहीं होगी। हमारे पिता ने हमारा भविष्य सुन्दर हो इसके लिए जाने कितना परिश्रम किया होगा।

    बहुत ही गहरी वेदना का विषय है कि आज समाज में एकाकी वृद्धावस्था के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। अपनी संतानों के लिये जीवनभर कष्ट सहने वाले माता-पिता जब असहाय अवस्था में वृद्धाश्रम की दहलीज पर ढकेल दिये जाते हैं तो मैं समझती हूँ कि जीवन का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कोई हो ही नहीं सकता। ऐसा करते हुए संतानों को यह जरूर सोच लेना चाहिए कि एक दिन उनकी भी यही हालत होगी। क्योंकि जो व्यवहार वे अपने माता-पिता से कर रहे हैं, उनके बच्चे भी वही व्यवहार उनसे करने वाले हैं। केवल अपने माता-पिता ही नहीं बल्कि हर उस बुजुर्ग का ख्याल रखिये जो अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता। उसकी सेवा-सुश्रुषा एक ऐसा पुण्यकार्य है जो लाखों यज्ञानुष्ठानों के बराबर फलदायी है। उनका आशीर्वाद जीवनभर साथ चलकर सुख-समृद्धि की मंजिल तक ले जाता है। आइये, नववर्ष में हमसब संकल्प लें अपने बुजुर्गों की सेवा का’
                                                                                                                        -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
वात्सल्य निर्झर, जनवरी 2015

Friday, February 28, 2014

हमने क्या दिया इस जगत् को ?

मैंने लोगों को अक्सर यह कहते सुना है कि ‘हमने देश को, समाज को, लोगों को ये दिया, वो दिया लेकिन उसके बदले में हमें क्या मिला।’ परमार्थ के कार्य करने वालों तक को इस सोच से ग्रसित पाया गया है। प्रतिफल की चाह रखने वाली यह छोटी सी सोच उस कार्य के महत्व को गौण कर देती है, जो शीर्षस्तर का होता है। संस्था के किसी कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में ‘मेरा नाम नहीं छपा या मंच पर से मेरा नाम नहीं लिया गया’ मन की यह हीन भावना अनेकों कर्मठ कार्यकर्ताओं को भी उनके पथ से विचलित कर देती है। इन सब बातों पर विचार करते हुए कभी स्वयं को अपनी उस आत्मा के सामने खड़ा करना चाहिए जो सच्चाई का दर्पण है। हमने जो सद्कार्य किया उसकी प्रशंसा दूसरों से ही हमें क्यों मिलनी चाहिए? क्या हम कभी चुपचाप अपने अन्तर्मन में स्थित रहकर अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं कर सकते? ऐसी प्रशंसा जिसमें कोई अहंकार न हो, केवल अपने उस सद्कार्य के प्रति भावविभोर होकर क्या हम कभी प्रभु के सम्मुख नतमस्तक नहीं हो सकते, जिन्होंने हमें उस कार्य के लिए चुना? हमारा अहंकार ही हमारे भीतर यह भाव पैदा करता है कि ‘हमने यह किया’ या ‘हमने वह किया।’ यही अहंकार हमें कर्ता के रूप में खड़ा करता है और इसीके फलस्वरूप हमें अपने सम्मान की चाह उत्पन्न होती है। जो न मिलने पर जीवन घोर कुण्ठा के गर्त में जा गिरता है।

हम यह क्यों नहीं मानते कि करवाने वाला तो परमात्मा है, हम तो केवल उसके साधन भर हैं। हमें यह भी सोचना होगा कि क्या अपने किसी कार्य की वाहवाही लूटने वाले अपने यश को हमेशा कायम रख सके या फिर प्राणिमात्र के कल्याण के लिए निःस्वार्थ अपना जीवन तक दे देने वालों की यशगाथा अमर है। यह विचार करते हुए जब हम अपने गौरवशाली इतिहास मे झाँकंेगे तो निश्चित रूप से यह तथ्य सामने आएगा कि यश उनका ही अमर है जिन्होंने लाभ-हानि की चिन्ता किए बगैर केवल लोकहित को ध्यान में रखकर अपना सर्वस्व न्यौछावर किया।    

हर समय आनन्दमय रहने वाले देवलोक में चारों ओर अंधियारा छाया हुआ था। अप्सराओं के नृत्य से जगमग रहने वाले देवराज इन्द्र के दरबार में सन्नाटा पसरा हुआ था। देवगण आदि कहीं दिखाई नहीं देते थे। कारण था घनघोर तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्तकर दैत्यराज ‘वृत्रासुर’ का सम्पूर्ण देवलोक पर बलपूर्वक अधिकार कर लेना। महान् बल तथा पराक्रम वाले उस असुर ने चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर तथा यम के अधिकारों को छीनकर एक प्रकार से तीनों लोकों पर ही एकधिकार प्राप्त कर लिया था। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। वृत्रासुर निरंकुश होकर अत्याचार कर रहा था। देवराज इन्द्र ने त्रसित होकर बृहस्पति जी के निर्देशानुसार ब्रह्माजी से प्रार्थना करके यह रहस्य जाना कि वृत्रासुर की मृत्यु महर्षि दधीचि की अस्थियों के द्वारा निर्मित किये गए वज्र के प्रहार से ही हो सकती है। देवराज इन्द्र अपने समस्त देवताओं के साथ महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे जहाँ वे साधना में लीन थे। अपने दोनों हाथ जोड़कर इन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया। महर्षि ने भी अपने आसन से उठकर उनका अभिवादन किया एवं ससम्मान उन्हें उचित स्थान पर विराजित करवाकर समस्त देवताओं के साथ उनके वहाँ पधारने के प्रयोजन को जानना चाहा -‘कहिये देवराज, आपको स्वयं चलकर यहाँ क्यों आना पड़ा, मुझे बतलाइये?’ देवराज इन्द्र ने निवेदन किया -‘हे मुनिश्रेष्ठ, ब्रह्माजी की तपस्या के फलितार्थ उनसे वरदान पाकर वृत्रासुर नामक एक राक्षस हम लोकपालों को जीतकर स्वयं त्रिलोकेश हो गया है।
   
मुनिश्रेष्ठ! हम सभी देवतागण उसके भय से स्वर्ग छोड़कर मनुष्यों की भाँति इस मृत्युलोक में निवास कर रहे हैं। मैं न तो यज्ञभाग प्राप्त कर पा रहा हूँ और न कोई हमारी पूजा ही कर रहा है। इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त हुआ मैं आपसे और कुछ क्या कहूँ। आप ही कृपा करके यदि देवताओं का उद्धार करें, तभी दुःखरूपी सागर में निमग्न हम देवताओं का उद्धार हो सकेगा, आप ही हमारे उद्धारक हैं।’

दधीचि बोले -‘जो हो चुका है और जो आगे होगा, वह सब मैं अपनी विशिष्ट विज्ञानरूपी नेत्रों से जान रहा हूँ। इन्द्र! मुझे क्या करना है, वह मुझे बताइये।’ देवराज ने कहा -‘ब्रह्मान्! मैं क्या कहूँ! मुझे बड़ा भय लग रहा है। महामुने! मैं जिसके लिये आपके पास आया हूँ, उसे सुनिये। ब्रह्माजी ने उस वृत्रासुर की मृत्यु किसी अन्य प्रकार से निश्चित नहीं की है, अपितु आपकी अस्थियों से बनाये गये अस्त्रों से ही उसकी मृत्यु सम्भव है। इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! जिसके लिये मेरा आगमन हुआ है, वह सब मैंने आपको बता दिया। अब जैसा उचित हो, वैसा आप विचार करें।’

देवराज इन्द्र के ऐसा कहने पर मुनीश्वर दधीचि विचार करने लगे कि क्या मैं इनको निराश करके लौटा दूँ अथवा जगत् कल्याण के लिये अपनी देह का त्याग करूँ। इस प्रकार दुविधा में पड़े हुए महामति दधीचि ने अन्त में देह त्याग का निश्चय करते हुए इन्द्र से कहा -‘देवराज! यदि राज्य से च्युत देवतागण मेरी अस्थियों के द्वारा महान् असुरराज वृत्र से छुटकारा पा सकते हैं तो मैं अवश्य ही योगबल से अपना यह शरीर त्याग दूँगा। उसी प्राणी का शरीर धन्य है, जिसका उपयोग दूसरे के सुख के लिये हो। यह शरीर तो अनित्य है और धर्म ही नित्य है। अतः मैं इस शरीर का त्याग कर रहा हूँ।’ ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि ने योग के द्वारा अपने तेज से अत्यन्त दैदिप्यमान अपने शरीर को देवराज इन्द्र के सामने ही त्यागकर मोक्ष को प्राप्त किया।

    यह देखकर देवराज इन्द्र बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए ‘लौकिक विषयों की कामना करने वाले हम देवताओं को धिक्कार है’ इस प्रकार स्वयं की निन्दा करते हुए अत्यन्त विषादपूर्ण स्थिति में बहुत समय तक वहीं पर खड़े रहे। तत्पश्चात् इन्द्र ने बहुत ही आदरपूर्वक उनकी अस्थियों को ग्रहणकर उनके द्वारा वृत्रासुर के वध के लिए अनेकों प्रकार के अस्त्र बनवाये। तदन्तर सफल पराक्रम वाले, प्रचण्ड धनुर्धर, देवताओं के नायक इन्द्र उस महान् असुर वृत्रासुर के पास अपनी समस्त देवसेना के साथ गए और उसे युद्ध के लिये ललकारा। वृत्रासुर और देवताओं के साथ उस भयंकर युद्ध में इन्द्र ने दधीचि जी की अस्थियों से बने वज्र और अन्य अस्त्रों द्वारा वृत्रासुर पर भयंकर प्रहार किए जिसके कारण वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                     सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, फ़रवरी 2014 

Wednesday, November 20, 2013

वात्सल्य धारा से तृप्त होते जीवन...

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी लगातार इसी क्षेत्र में रहकर पीडि़तों के आहत दिलों पर अपनी करुणा का मरहम लगाने का सतत् प्रयत्न कर रही हैं। पूरी केदारघाटी में जगह-जगह अभी भी मार्ग पूरी तरह से सुगम नहीं हुए हैं। भूस्खलन का खतरा निरन्तर बना हुआ है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी वे यहाँ संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों’ को अपना पावन मार्गदर्शन देकर यहाँ के लोगों को इस दुखद घटना से उबारने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं। अपनों को खोने का दर्द अव्यक्त होता है। अपने किसी प्रिय का अचानक दुनिया से चले जाना तोड़कर रख देता है।

रूद्रप्रयाग जिले की पहाडि़यों में बसा एक छोटा सा गाँव है - सेमी। 16 जून को बरसी आसमानी आफत ने सारे गाँव को खंडहर करके रख दिया। खेती और चारधाम यात्रा संबंधी छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े यहाँ के निवासियों ने पाई-पाई जोड़कर अपने घर बनाए थे जो घर तो अब भी दिखते हैं लेकिन रहने लायक नहीं रहे। घनघोर बारिश के बाद इस पूरे गाँव की जमीन ही अपने आप नीचे की ओर धंसने लगी। देखते ही देखते दरकते मकान उनमें रहने वालों के सपने भी चकनाचूर कर गए। दुःख की बात तो यह है कि शासकीय तौर पर ऐसे घरों को पूर्णतया नष्ट नहीं माना गया है इसलिए राहत राशि भी उतनी नहीं मिली। मरम्मत की राहत राशि से भला चित्र में दिखाई दे रहे मकान को क्या रहने लायक बनाया जा सकता है? बहरहाल, पास आते जा रहे भीषण ठण्ड के मौसम की डरा देने वाली आशंकाओं के बीच इस गाँव के लोग टेण्टों में रहने को विवश हैं। वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ के ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ ने इस गांव की पीड़ा को अनुभव किया और उनके बीच सभी आवश्यक राहत सामग्री का वितरण किया। गाँव के प्रधान बताते हैं कि वात्सल्य सेवा केन्द्र के माध्यम से हमें केवल सहायता ही नहीं बल्कि इस मुसीबत से लड़ने की शक्ति भी मिली है।

त्रियुगीनारायण - उत्तराखंड के अतिप्राचीन स्थानों में से एक। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान शिवशंकर एवं माता पार्वती का विवाह हुआ था। हजारों वर्ष पुराना यह स्थान रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड त्रासदी की
रात को यहाँ के निवासियों ने सैकड़ों तीर्थयात्रियों को भोजन-पानी और आश्रय देकर उनकी प्राणरक्षा की। यहीं पर रहने वाले पेशे से ड्राइवर ललितप्रसाद किसी शारीरिक बीमारी के दौरान हुए इलाज में किसी दवाई के दुष्प्रभाव से इनके दोनों पैर अशक्त हो गए। वे बिना किसी की सहायता के एक कदम भी नहीं चल सकते। दुर्भाग्य ने यहीं पीछा नहीं छोड़ा। जंगल में अचानक आग लगी और वहाँ घास लेने गई पत्नी की झुलसने से मृत्यु हो गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र के इस पिता के पास गुजारे का कोई साधन न था। जैसे तैसे गाँव वालों की कृपादृष्टि से बस जीवन चल रहा था। उत्तराखंड त्रासदी के बाद दीदी माँ जी के पावन मार्गदर्शन में वहाँ राहत कार्य आरंभ हुए। ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों के कार्यकर्ता भाई-बहन जब त्रियुगीनारायण पहुंचे तो वहाँ उनकी मुलाकात ललितप्रसाद से हुई। जब उन्हें बताया गया कि ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए वात्सल्य सेवा केंद्रों में रहने और स्कूली शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की गई है तो वे अपनी दोनों बेटियों को वहाँ भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। ये दोनों बच्चियां इस समय केदारनाथ मार्ग स्थित ग्राम कोरखी में संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ में रहकर अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। पुत्र की स्कूल फीस भी संस्था ही वहन करती है। ललितप्रसाद बहुत ही कृतज्ञ भाव से कहते हैं कि -‘मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर बहुत चिंतित था कि कैसे इनकी पढ़ाई-लिखाई होगी लेकिन दीदी माँ जी की कृपा से आज वे दोनों अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी ग्रहण कर रही हैं। मैं तो आजीवन उनका ऋणी रहूँगा।’ उनकी दोनों बेटियां शिवानी और काजल यहाँ रह रहे सब बच्चों के साथ बहुत खुश हैं। पहले की तरह अब उन्हें अपने घर की याद नहीं आती। पांचवी और चैथी कक्षाओं में अध्ययनरत् ये दोनों बच्चियां दीदी माँ जी का स्नेहिल प्यार पाकर अभीभूत हैं।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
  सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Saturday, November 16, 2013

प्रकृति में प्रवेश करें, प्रहार नहीं

भगवान केदारनाथ की तपस्थली जहाँ पल-प्रतिपल देवत्व की अनुभूति होती है ऐसी पावन धरा पर आकर जीवन अपनी धन्यता को अनुभूत करता है। देवभूमि उत्तराखंड जाकर मैंने इस संभावना को तलाशा कि हम वहाँ के आपदा प्रभावित माताओं और बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं। निश्चित रूप से पूरा विश्व उत्तराखंड में आई इस आपदा के कारण मानसिक रूप से उद्वेलित हुआ है। मदद के लिए चाहे कोई आ पाया हो या नहीं लेकिन इस संकट को सबने अपने मन में एक घोर कष्ट के रूप में अनुभव किया। मुझे लगता है कि प्रकृति तो माँ है। वो सबका भरण-पोषण करती है, लेकिन जब हम अपनी सीमाओं से बाहर जाते हैं तो जैसे माँ अपने बच्चे की किसी गलती पर उसे तमाचा मार देती है ना, बस वैसा ही कुछ इस त्रासदी में प्रकृति ने हमारे साथ किया है। जब मैं आपदा के तुरन्त बाद पहली बार उत्तराखंड गई थी तब मंदाकिनी मैया से मैंने मन ही मन कहा कि -‘हे माँ तुम तो वात्सल्यमयी हो ना, अपनी संतानों पर वात्सल्य लुटाने वाली? तुम तो वात्सल्य का मर्म हो ना? तुम्हीं तो प्राण हो, तुम ही तो प्रेरणा हो। तुम देवभूमि का उत्सव हो माँ। फिर तुम क्रोधित क्यों हुईं? तुमने इतना विकराल रूप क्यों दिखाया कि तुम्हारी अपनी संतानें तुम्हारे प्रबल प्रवाह में पत्तों की तरह बह गईं? ऐसे बहुत सारे उद्वेलन भरे प्रश्न मन में थे। उत्तर कहाँ से तलाशेंगे? यदि हमारे मन में कहीं विचलन है तो उसका समाधान भी हमें ही खोजना होता है।

हम यदि गंभीरतापूर्वक अनुभव करें तो पाएंगे कि भूमि के कंकर-कंकर में शंकरत्व समाया हुआ है। जैसे देवों के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। माता-पिता के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। उसी प्रकार का व्यवहार प्रकृति माता के साथ भी किया जाना चाहिए। माँ के स्तन से दूध पीना शोभा देता है परन्तु माँ के स्तन से उसका रक्त पीना एकदम अशोभनीय है। यह बात सारे संसार के लिए पाथेय है। हजारों वर्ष पहले के भारतीय ऋषियों ने ईश्वरीय सत्ता से केवल मानवता के लिए ही नहीं बल्कि वनस्पतियों, औषधियों और अंतरिक्ष तक के लिए शांति मांगी थी। इसका मतलब यह है कि युगों पहले भारतीय संस्कृति के संवाहक ऋषियों को यह दृष्टि थी कि एक समय वह भी आएगा जब केवल धरती ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष की शांति भी भंग हो जाएगी। इसीलिए उन्होंने चारों ओर शांति के लिए प्रार्थना की। जब धरा मनुष्य की फेंकी हुई गंदगी से त्रस्त हो जाएगी। जब औषधियां भी विषाक्त हो जाएंगी। ऐसे समय में केवल शांति की आवश्यकता होगी। उस शांति की कामना भारत के ऋषियों ने की थी। यह कैसे संभव होगा! इसके लिए अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य चाहिए। इस सामथ्र्य को पैदा करने के लिए जीवन में साधना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर साधना करनी होगी।

प्रकृति परमेश्वर है उसे पाना है तो उसमें प्रवेश करना होगा। प्रहार करने से वो आहत होती है। हमने प्रहार किया वृक्षों पर, हमने पर्वतों को नोंच डाला अपने क्षुद्र स्वार्थों के कारण। प्रकृति कभी बदला नहीं लेती बल्कि हम ही अपने दुष्कर्मों को त्रासदियों के रूप में भोगते हैं। ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ केवल कहावत नहीं प्रासंगिकता है। हम जो भोग रहे हैं उसे हमने ही निमंत्रित किया है। किसी भी अनहोनी से बचने के लिए हम सदा परमात्मा को पुकारते हैं। लेकिन प्रकृति में छुपा परमात्मा क्या उस पर प्रहार करने से मिलेगा? नहीं, उसे पाने के लिए हमें उसमें प्रेमपूर्वक प्रवेश करना होगा। प्रवेश की यह सुन्दर प्रक्रिया फिर विनाश का कारण नहीं बनेगी अपितु हमें उस विराट का एक हिस्सा बना लेगी जिस पर हमारा जीवन निर्भर है।

अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य हमें शंकर बनाती है। जबसे मैंने देवभूमि के दिव्य आभामंडल में प्रवेश किया है तब से मन से यह बात निकलती है कि आप उत्तराखंडवासी इतनी भयानक विपत्ति के समय में भी अपने भीतर स्थित रहे। मौत के इस तांडव को अपनी आँखों से देखने के बाद भी उनका विवेक बना रहा। यही धर्म का प्रसाद है कि हम घोर संहार के बीच में भी जो अविनाशी तत्व है उसका दर्शन करें। धर्म दृष्टि देता है कि जब सब कुछ मिटने वाला नाशवान है तो फिर हम पदार्थों के पीछे पागल क्यों हों। लोग कहते हैं कि महानगर तो केवल पदार्थों की ही दुनिया है। लेकिन भारत का गौरवशाली अतीत पदार्थों के पीछे नहीं भागा था। परमात्मा के लिए, प्रेम के लिए, प्रीत के लिए, सेवा के लिए, करुणा के लिए, असहायों का हाथ पकड़ने के लिए उस भारत के मन में भाव था। हम पैसे या पेट के लिए नहीं पैदा हुए। ये जो देवभूमि है वह सारे संसार के आकर्षण का केन्द्र है। जब सारा संसार पदार्थों के पीछे भागते-भागते थक जाता है तब वह शांति की तलाश में इसी देवभूमि पर आता है। लेकिन क्या वह यात्री भाव से आता है? नहीं, वह केवल मनोरंजन के लिए आता है। उसकी वह तथाकथित शांति केवल ‘इंटरटेनमेण्ट’ है। जिस देवभूमि में तीर्थयात्री भाव से आना था उस पर वह केवल मनोरंजन के भाव से आता है। यहाँ आकर तो मन का भंजन हो जाना चाहिए, यहाँ आकर तो ‘अ’ मन हो जाना चाहिए। यह वह भूमि है जहाँ मेरे शंकर का परिचय है जो ‘अ’मन के लिए रहता है और विवाह करता है। मेरे शंकर ऐसे हैं जो नैतिकता के लिए पत्नी का त्याग कर सकते हैं। मेरे शंकर अपनी पत्नी का शव लादकर सृष्टि में दौड़ सकते हैं। मेरे शंकर तो ऐसे हैं जो अपने ही दोषों को संहार कर सकते हैं। मेरे शंकर तो खतरों का श्रृंगार कर सकते हैं। मेरे शंकर सारे संसार का विष पी सकते हैं। मेरे शंकर तो घोर अभावों के बीच भी जी सकते हैं। मेरे शंकर और उनका शिवत्व कभी नष्ट नहीं होता। इसी शिवत्व का दर्शन करने के लिए सारा संसार एक आकर्षण में बंधकर इस देवभूमि पर आता है।

इस भूमि पर विराजमान शिव एक असाधारण शक्ति हैं। वो मात्र पदार्थों या वासना के लिए नहीं जीते। हम सबका यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है कि हमारी यह देवभूमि ‘देवभूमि’ बनी रहे। हम दुनिया को बदलेंगे। अगर दुनिया ने हमको बदल दिया तो हमारी परंपरा, हमारी मान्यताएं, हमारी शांति और आनन्द वह तो फिर सब नष्ट हो जाएगा। अभी तो उल्टा हो गया। हमने दुनिया को बदलना था लेकिन दुनिया ने हमें बदल दिया! हम पदार्थों के पुजारी हो गए! निश्चित रूप से प्रकृति या परमात्मा के द्वारा प्राणियों को जो चोट पहुँचाई जाती है वो नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि कुछ नया आकार देने के लिए होती है। जैसे बच्चे में कोई दोष आ जाए तो माता उसे थोड़ा सा दण्ड देकर सुधारती है, मैं इस दृष्टि से उत्तराखंड की इस प्राकृतिक आपदा को देखती हूँ। घोर विपति के इस समय में मैंने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों के घरों में जाने का प्रयास किया। मैंने देखा कि यहाँ मातृशक्ति के पसीने से ही यह देवभूमि हरी भरी है। मन करता है कि मैं देवभूमि की माताओं का वंदन करूं।

घर में चूल्हा जला, मवेशियों को चारा मिला, तुमने खेतों को अपने पसीने से सींचा, तुमने संतानों को भी संस्कार दिया। हे माँ, जब मैं तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि मैंने साक्षात् पार्वती माता का दर्शन कर लिया। वो अम्बा, वो जगदम्बा जो अपनी संतानों के लिए श्रम का पसीना बहाकर अपने मकान को ‘घर’ बनाए, मैं उसका दिल से अभिनन्दन करती हूँ। तेरे कारण ही तो मंदिरों के दीप जगर-मगर होते हैं माँ। तेरी साधना अविरत है माँ। वह तो एक नदी की तरह सतत् प्रवाहमान है। तुम्हारी संतानों को देवत्व मिले ये जिम्मेदारी तुम्हारी है। परिस्थितियों से घबराकर असहाय हो जाना शंकर के भक्त जानते ही नहीं हैं क्योंकि घोर अभावों के बीच भी वे अपने आप में स्थित रहने की कला जानते हैं। इसलिए इस समय हमारे लिए जो करणीय है वो हमें करना चाहिए। चिंतन करना चाहिए और उसी चिंतन के मंथन में से अमृत निकलेगा ये बात निश्चित है।

अगर हम शंकर नहीं बने तो क्या हुआ। अरघे के ऊपर नहीं बैठ सके तो क्या हुआ? लेकिन अरघे तक भक्तों जो सैलाब उमड़कर जाता है यदि उन सीढि़यों के कंकर बनने का अवसर भी यदि मिल जाए तो यह भी एक बहुत बड़ा सौभाग्य है। कौन ऐसा शंकर है जो कंकरों मंे से पैदा नहीं होता? क्योंकि कहा भी गया है कि ‘पत्थर जो चोट खा कर टूट गया, कंकर बन गया और पत्थर जो चोट को सह गया वह शंकर बन गया।’ इसलिए परिस्थितियों की चोटों के बीच भी हमें हमारे अस्तित्व, हमारी परंपराओं, हमारी मान्यताओं को शुभ और शिव के साथ जोड़े रखना है। मैं उत्तराखंडवासियों के बीच बैठकर यह अनुभव करती हूँ कि मुझे सहज रूप से वहाँ के नन्हें बच्चों और माता-बहनों के उत्कर्ष के लिए कार्य करना है। वृंदावन के वात्सल्य ग्राम में भी हमने इन्हीं भाव संबंधों पर कार्य किया और एक बड़ा वात्सल्य परिवार बनाया। जिनका कोई नहीं था उन सबको मिलाकर एक अद्भुत परिवार बन गया। हमने कोशिश की है कि हम उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों के लोगों तक अपने सेवाकार्यों को पहुंचा सकें। देवभूमि में पवित्रता पाने के लिए आया जाता है, कुछ देने के लिए नहीं। इसलिए हम अपनी सेवाएं भी इसी भाव के साथ यहाँ समर्पित कर रहे हैं। अपनी सेवाओं के बदले हम सब लोगों को यहाँ की पावनता और शुचिता का प्रसाद मिल सके, यही भाव है परमशक्ति पीठ का। उत्तराखंड की बहनों की आँखों से बहे आँसुओं ने मुझे बहुत भीतर तक द्रवित किया। मैं भूल गई कि मैं एक संन्यासिनी हूँ। मैंने केवल एक साधारण स्त्री के दर्द को अपने अन्दर महसूस किया। मैंने अपने गुरुदेव से कहा कि उत्तराखंडवासी बहनों के आशुओं के प्रवाह में मेरे विवेक का बाँध टूट गया। मैं एक सामान्य स्त्री के धरातल पर आकर खड़ी हो गई। उनकी वो पीड़ा मेरी आँखों से मंदाकिनी के प्रवाह की तरह बहती रही। मैं भी एक स्त्री हूँ, मैं भी एक माँ हूँ, मैं भी दीदी हूँ। मैं यह जानती हूँ कि जब मन का दर्द बहुत ज्यादा हो जाता है तो मनुष्य को स्वयं ही उसकी दवा भी बनना पड़ता है। बहुत सारे दुखद दृश्यों को यहाँ आकर देखना पड़ा। लेकिन अपने पैरों पर खड़ा ही एक मार्ग है। किसी दूसरे की ओर आशा से देखना स्वाभिमानशून्यता है। किसी दूसरे पर निर्भर होना भारत के किसी भी बच्चे और स्त्री को शोभा नहीं देता। हम अपनी विषम परिस्थितियों से निकलकर स्वयं ही अपने पैरों पर खड़े होंगे, हमें यह निश्चय करना है। भारत को यही निश्चय चाहिए। तात्कालिक परिस्थितियां ज़रूर कभी-कभी ऐसी होती हैं कि वो बड़े-बड़ों को हाथ फैलाने पर विवश कर सकती हैं लेकिन बहुत लंबे समय तक ऐसा नहीं रहना चाहिए। हम यदि गिरें तो भले ही किसी का हाथ उठने में हमारी सहायता कर दे लेकिन फिर आगे का सफर हमें अपने कदमों पर ही तय करना चाहिए। सहायता भी एक सीमा तक ही लेनी चाहिए। नहीं तो सहायता लेते ही रहना हमें अकर्मण्य बना देता है। यहाँ उत्तराखंड में वात्सल्य का हमारा यह कार्य यहाँ के लोगों को त्रासदी से उबारकर अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए ही चलाया जा रहा है। निश्चित रूप से यह ईश्वर की किसी बड़ी योजना का ही एक हिस्सा होगा क्योंकि हम सब तो उनके हाथों की कठपुतली भर हैं। उन्हें हमसे जो करवाना है वह उसे हमें अपना निमित बनवाकर कर लेते हैं।

यहाँ वे सारे लोग जिनको इस त्रासदी में फंसकर अन्त्येष्टि की आग भी नसीब नहीं हुई, जो मंदाकिनी मैया की धार में बहे या फिर पहाड़ों के नीचे दब गए मैं उन सबको अपनी करुणा का अघ्र्य अर्पित करती हूँ। निश्चित रूप से भगवान शंकर सबका कल्याण करते हैं। ये मृत्यु बहुत दुखदायी थीं लेकिन वह जो कुछ भी था प्रभु की योजना था। उनकी योजना के सामने कोई योजक टिक नहीं सकता। उसका प्रवाह ऐसा है कि मनुष्य का अहंकार उसके आगे पत्तों की तरह बिखर जाता हैै। इसलिए हम अपने उस अभिमान से मुक्त होकर शिवत्व को समझें। इस त्रासदी के सभी मृतक प्रभु के चरणों में हैं उनका कल्याण ही होगा। मैं भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उत्तराखंडवासियों का जीवन दोबारा पटरी पर आए, भगवान केदारनाथ जी के दर्शनों की यात्रा पुनः प्रारंभ हो ताकि यहाँ के निवासी फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें ताकि हम किसी के मुखापेक्षी ना बनें, लेकिन उस मर्यादा के साथ जो भगवान ने हमारे लिए निश्चित की है।

मैं समझती हूँ कि सबसे सुन्दर दृश्य संस्थाओं या पदार्थों को खड़ा करके नहीं उत्पन्न होगा बल्कि इसके लिए वैचारिक क्रांति को जन्म देना होगा। हमें अपनी प्राचीन पवित्रता को लौटाना होगा। मर्यादाओं के साथ अपनी जीवन की तेजस्वी आभा को प्राप्त करना होगा। लेकिन इसके लिए हमें प्रवेश करना होगा। आप जानते हो कि महंगा धन तिजोरी में रखा जाता है और फिर उस पर एक मजबूत ताला लगाया जाता है। ताला तिजोरी से भी कम कीमती होता है जिसके भरोसे पर ही धन को छोड़ा जाता है। फिर उस ताले को खोलने और बन्द करने वाली चाबी तो ताले से भी कम कीमती होती है लेकिन सबसे ज्यादा भरोसा उस छोटी सी चाबी पर ही किया जाता है ना? इतने महंगे धन को उससे कम कीमत की तिजोरी में रखा, उससे भी कम कीमत का ताला लगाया और सबसे कम कीमत की चाबी के भरोसे उसे छोड़ा! एक दिन हथौड़े ने चाबी से पूछा कि ‘मैं दिनभर ठक-ठक करता रहूँ तो ये ताला टूट तो जाएगा लेकिन खुलेगा नहीं लेकिन तू इसे चुपचाप इतनी आसानी से कैसे खोल लेती है?’ चाबी ने उत्तर दिया -‘भैया, इस ताले के चुपचाप खुलने और बन्द होने का रहस्य इतना सा है कि मैं इसे खोलने के लिए इसके भीतर प्रवेश करती हूँ और तुम इसे खोलने के लिए इस पर प्रहार करते हो।’ कदाचित हम भी उस चाबी की तरह ही प्रेमपूर्वक अपनी भूमिका में प्रवेश करना सीखें। ये जो आपदा उत्तराखंड मंे आई यह प्रकृति पर हमारे निरन्तर प्रहार का ही नतीजा है। हमने आस्थापूर्वक प्रकृति में आंचल में प्रवेश करना सीखा ही नहीं। भारत के ऋषियों का दर्शन हमें प्रवेश करना सिखाता है। इसीलिए वर्षों तक साधना में रहने वाले ऋषि ने ग्रह-नक्षत्रों की चाल और गणना को समझ लिया था। वह प्रवेश था और प्रकृति में प्रवेश ही परमात्मा तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
- सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Friday, April 15, 2011

The Ultimate Dream of Param Pujya Didi Maa Sadhvi Ritambhara Ji

There are thousands of spiritualists in the country who are serving the nation by their valuable contribution. But few of them have set examples for the others in this respective field. Param Pujya Didi Maa Sadhvi Ritambhara Ji is one of them. She has become a symbol of maternal love and patriotism all over the world. She is also one of the most listened and followed spiritualists of India.

Didi Maa is highly concerned about the condition of women in India. There are millions of women who are being exploited by the family members and society. Their contribution has a significant role in the making of a family but it is easily neglected. Certain steps have been taken by the government to eradicate this evil but they are not enough. Didi Maa is trying to give a bit of relief to such women through her NGO Param Shakti Peeth. She is the president of this NGO that has done miracles in the field of women empowerment through its vocational training programs. She is highly appreciated for her work towards women empowerment in India.

The most important work by Didi Maa is the formation of Vatsalya Gram- A village of maternal love. In the divine land of Vrindavan, it is a great place where the abandoned children are cared and loved properly. They get good education at Samvid Gurukulam that is an international level school in the premises of Vatsalya Gram. The destitute women and old ladies live in a family made by strong bound of love. In every Vatsalya Family, there is an aunty, a granny, a mother and seven children including five sisters and two brothers.
Apart from that, she is also trying to develop a sense of patriotism in every Indian. That is why she is going to conduct a campaign named ‘Vatsalya Ganga Abhiyan’ which will work among the tribal section of India. The focus of this campaign is to wipe out the darkness of illiteracy from these regions so that the tribes can also contribute equally in the development of the country.