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Wednesday, November 20, 2013

वात्सल्य धारा से तृप्त होते जीवन...

उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी लगातार इसी क्षेत्र में रहकर पीडि़तों के आहत दिलों पर अपनी करुणा का मरहम लगाने का सतत् प्रयत्न कर रही हैं। पूरी केदारघाटी में जगह-जगह अभी भी मार्ग पूरी तरह से सुगम नहीं हुए हैं। भूस्खलन का खतरा निरन्तर बना हुआ है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी वे यहाँ संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों’ को अपना पावन मार्गदर्शन देकर यहाँ के लोगों को इस दुखद घटना से उबारने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं। अपनों को खोने का दर्द अव्यक्त होता है। अपने किसी प्रिय का अचानक दुनिया से चले जाना तोड़कर रख देता है।

रूद्रप्रयाग जिले की पहाडि़यों में बसा एक छोटा सा गाँव है - सेमी। 16 जून को बरसी आसमानी आफत ने सारे गाँव को खंडहर करके रख दिया। खेती और चारधाम यात्रा संबंधी छोटे-मोटे व्यवसायों से जुड़े यहाँ के निवासियों ने पाई-पाई जोड़कर अपने घर बनाए थे जो घर तो अब भी दिखते हैं लेकिन रहने लायक नहीं रहे। घनघोर बारिश के बाद इस पूरे गाँव की जमीन ही अपने आप नीचे की ओर धंसने लगी। देखते ही देखते दरकते मकान उनमें रहने वालों के सपने भी चकनाचूर कर गए। दुःख की बात तो यह है कि शासकीय तौर पर ऐसे घरों को पूर्णतया नष्ट नहीं माना गया है इसलिए राहत राशि भी उतनी नहीं मिली। मरम्मत की राहत राशि से भला चित्र में दिखाई दे रहे मकान को क्या रहने लायक बनाया जा सकता है? बहरहाल, पास आते जा रहे भीषण ठण्ड के मौसम की डरा देने वाली आशंकाओं के बीच इस गाँव के लोग टेण्टों में रहने को विवश हैं। वात्सल्यमूर्ति पूज्या दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी के पावन मार्गदर्शन में परमशक्ति पीठ के ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ ने इस गांव की पीड़ा को अनुभव किया और उनके बीच सभी आवश्यक राहत सामग्री का वितरण किया। गाँव के प्रधान बताते हैं कि वात्सल्य सेवा केन्द्र के माध्यम से हमें केवल सहायता ही नहीं बल्कि इस मुसीबत से लड़ने की शक्ति भी मिली है।

त्रियुगीनारायण - उत्तराखंड के अतिप्राचीन स्थानों में से एक। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान शिवशंकर एवं माता पार्वती का विवाह हुआ था। हजारों वर्ष पुराना यह स्थान रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखंड त्रासदी की
रात को यहाँ के निवासियों ने सैकड़ों तीर्थयात्रियों को भोजन-पानी और आश्रय देकर उनकी प्राणरक्षा की। यहीं पर रहने वाले पेशे से ड्राइवर ललितप्रसाद किसी शारीरिक बीमारी के दौरान हुए इलाज में किसी दवाई के दुष्प्रभाव से इनके दोनों पैर अशक्त हो गए। वे बिना किसी की सहायता के एक कदम भी नहीं चल सकते। दुर्भाग्य ने यहीं पीछा नहीं छोड़ा। जंगल में अचानक आग लगी और वहाँ घास लेने गई पत्नी की झुलसने से मृत्यु हो गई। दो पुत्रियों और एक पुत्र के इस पिता के पास गुजारे का कोई साधन न था। जैसे तैसे गाँव वालों की कृपादृष्टि से बस जीवन चल रहा था। उत्तराखंड त्रासदी के बाद दीदी माँ जी के पावन मार्गदर्शन में वहाँ राहत कार्य आरंभ हुए। ‘वात्सल्य सेवा केन्द्रों के कार्यकर्ता भाई-बहन जब त्रियुगीनारायण पहुंचे तो वहाँ उनकी मुलाकात ललितप्रसाद से हुई। जब उन्हें बताया गया कि ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए वात्सल्य सेवा केंद्रों में रहने और स्कूली शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था की गई है तो वे अपनी दोनों बेटियों को वहाँ भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। ये दोनों बच्चियां इस समय केदारनाथ मार्ग स्थित ग्राम कोरखी में संचालित ‘वात्सल्य सेवा केन्द्र’ में रहकर अपनी स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। पुत्र की स्कूल फीस भी संस्था ही वहन करती है। ललितप्रसाद बहुत ही कृतज्ञ भाव से कहते हैं कि -‘मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर बहुत चिंतित था कि कैसे इनकी पढ़ाई-लिखाई होगी लेकिन दीदी माँ जी की कृपा से आज वे दोनों अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी ग्रहण कर रही हैं। मैं तो आजीवन उनका ऋणी रहूँगा।’ उनकी दोनों बेटियां शिवानी और काजल यहाँ रह रहे सब बच्चों के साथ बहुत खुश हैं। पहले की तरह अब उन्हें अपने घर की याद नहीं आती। पांचवी और चैथी कक्षाओं में अध्ययनरत् ये दोनों बच्चियां दीदी माँ जी का स्नेहिल प्यार पाकर अभीभूत हैं।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
  सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Saturday, November 16, 2013

प्रकृति में प्रवेश करें, प्रहार नहीं

भगवान केदारनाथ की तपस्थली जहाँ पल-प्रतिपल देवत्व की अनुभूति होती है ऐसी पावन धरा पर आकर जीवन अपनी धन्यता को अनुभूत करता है। देवभूमि उत्तराखंड जाकर मैंने इस संभावना को तलाशा कि हम वहाँ के आपदा प्रभावित माताओं और बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं। निश्चित रूप से पूरा विश्व उत्तराखंड में आई इस आपदा के कारण मानसिक रूप से उद्वेलित हुआ है। मदद के लिए चाहे कोई आ पाया हो या नहीं लेकिन इस संकट को सबने अपने मन में एक घोर कष्ट के रूप में अनुभव किया। मुझे लगता है कि प्रकृति तो माँ है। वो सबका भरण-पोषण करती है, लेकिन जब हम अपनी सीमाओं से बाहर जाते हैं तो जैसे माँ अपने बच्चे की किसी गलती पर उसे तमाचा मार देती है ना, बस वैसा ही कुछ इस त्रासदी में प्रकृति ने हमारे साथ किया है। जब मैं आपदा के तुरन्त बाद पहली बार उत्तराखंड गई थी तब मंदाकिनी मैया से मैंने मन ही मन कहा कि -‘हे माँ तुम तो वात्सल्यमयी हो ना, अपनी संतानों पर वात्सल्य लुटाने वाली? तुम तो वात्सल्य का मर्म हो ना? तुम्हीं तो प्राण हो, तुम ही तो प्रेरणा हो। तुम देवभूमि का उत्सव हो माँ। फिर तुम क्रोधित क्यों हुईं? तुमने इतना विकराल रूप क्यों दिखाया कि तुम्हारी अपनी संतानें तुम्हारे प्रबल प्रवाह में पत्तों की तरह बह गईं? ऐसे बहुत सारे उद्वेलन भरे प्रश्न मन में थे। उत्तर कहाँ से तलाशेंगे? यदि हमारे मन में कहीं विचलन है तो उसका समाधान भी हमें ही खोजना होता है।

हम यदि गंभीरतापूर्वक अनुभव करें तो पाएंगे कि भूमि के कंकर-कंकर में शंकरत्व समाया हुआ है। जैसे देवों के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। माता-पिता के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार किया जाता है। उसी प्रकार का व्यवहार प्रकृति माता के साथ भी किया जाना चाहिए। माँ के स्तन से दूध पीना शोभा देता है परन्तु माँ के स्तन से उसका रक्त पीना एकदम अशोभनीय है। यह बात सारे संसार के लिए पाथेय है। हजारों वर्ष पहले के भारतीय ऋषियों ने ईश्वरीय सत्ता से केवल मानवता के लिए ही नहीं बल्कि वनस्पतियों, औषधियों और अंतरिक्ष तक के लिए शांति मांगी थी। इसका मतलब यह है कि युगों पहले भारतीय संस्कृति के संवाहक ऋषियों को यह दृष्टि थी कि एक समय वह भी आएगा जब केवल धरती ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष की शांति भी भंग हो जाएगी। इसीलिए उन्होंने चारों ओर शांति के लिए प्रार्थना की। जब धरा मनुष्य की फेंकी हुई गंदगी से त्रस्त हो जाएगी। जब औषधियां भी विषाक्त हो जाएंगी। ऐसे समय में केवल शांति की आवश्यकता होगी। उस शांति की कामना भारत के ऋषियों ने की थी। यह कैसे संभव होगा! इसके लिए अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य चाहिए। इस सामथ्र्य को पैदा करने के लिए जीवन में साधना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने-अपने स्तर पर साधना करनी होगी।

प्रकृति परमेश्वर है उसे पाना है तो उसमें प्रवेश करना होगा। प्रहार करने से वो आहत होती है। हमने प्रहार किया वृक्षों पर, हमने पर्वतों को नोंच डाला अपने क्षुद्र स्वार्थों के कारण। प्रकृति कभी बदला नहीं लेती बल्कि हम ही अपने दुष्कर्मों को त्रासदियों के रूप में भोगते हैं। ‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई’ केवल कहावत नहीं प्रासंगिकता है। हम जो भोग रहे हैं उसे हमने ही निमंत्रित किया है। किसी भी अनहोनी से बचने के लिए हम सदा परमात्मा को पुकारते हैं। लेकिन प्रकृति में छुपा परमात्मा क्या उस पर प्रहार करने से मिलेगा? नहीं, उसे पाने के लिए हमें उसमें प्रेमपूर्वक प्रवेश करना होगा। प्रवेश की यह सुन्दर प्रक्रिया फिर विनाश का कारण नहीं बनेगी अपितु हमें उस विराट का एक हिस्सा बना लेगी जिस पर हमारा जीवन निर्भर है।

अशांति के इस विष को अपने कण्ठ में रखने की सामथ्र्य हमें शंकर बनाती है। जबसे मैंने देवभूमि के दिव्य आभामंडल में प्रवेश किया है तब से मन से यह बात निकलती है कि आप उत्तराखंडवासी इतनी भयानक विपत्ति के समय में भी अपने भीतर स्थित रहे। मौत के इस तांडव को अपनी आँखों से देखने के बाद भी उनका विवेक बना रहा। यही धर्म का प्रसाद है कि हम घोर संहार के बीच में भी जो अविनाशी तत्व है उसका दर्शन करें। धर्म दृष्टि देता है कि जब सब कुछ मिटने वाला नाशवान है तो फिर हम पदार्थों के पीछे पागल क्यों हों। लोग कहते हैं कि महानगर तो केवल पदार्थों की ही दुनिया है। लेकिन भारत का गौरवशाली अतीत पदार्थों के पीछे नहीं भागा था। परमात्मा के लिए, प्रेम के लिए, प्रीत के लिए, सेवा के लिए, करुणा के लिए, असहायों का हाथ पकड़ने के लिए उस भारत के मन में भाव था। हम पैसे या पेट के लिए नहीं पैदा हुए। ये जो देवभूमि है वह सारे संसार के आकर्षण का केन्द्र है। जब सारा संसार पदार्थों के पीछे भागते-भागते थक जाता है तब वह शांति की तलाश में इसी देवभूमि पर आता है। लेकिन क्या वह यात्री भाव से आता है? नहीं, वह केवल मनोरंजन के लिए आता है। उसकी वह तथाकथित शांति केवल ‘इंटरटेनमेण्ट’ है। जिस देवभूमि में तीर्थयात्री भाव से आना था उस पर वह केवल मनोरंजन के भाव से आता है। यहाँ आकर तो मन का भंजन हो जाना चाहिए, यहाँ आकर तो ‘अ’ मन हो जाना चाहिए। यह वह भूमि है जहाँ मेरे शंकर का परिचय है जो ‘अ’मन के लिए रहता है और विवाह करता है। मेरे शंकर ऐसे हैं जो नैतिकता के लिए पत्नी का त्याग कर सकते हैं। मेरे शंकर अपनी पत्नी का शव लादकर सृष्टि में दौड़ सकते हैं। मेरे शंकर तो ऐसे हैं जो अपने ही दोषों को संहार कर सकते हैं। मेरे शंकर तो खतरों का श्रृंगार कर सकते हैं। मेरे शंकर सारे संसार का विष पी सकते हैं। मेरे शंकर तो घोर अभावों के बीच भी जी सकते हैं। मेरे शंकर और उनका शिवत्व कभी नष्ट नहीं होता। इसी शिवत्व का दर्शन करने के लिए सारा संसार एक आकर्षण में बंधकर इस देवभूमि पर आता है।

इस भूमि पर विराजमान शिव एक असाधारण शक्ति हैं। वो मात्र पदार्थों या वासना के लिए नहीं जीते। हम सबका यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है कि हमारी यह देवभूमि ‘देवभूमि’ बनी रहे। हम दुनिया को बदलेंगे। अगर दुनिया ने हमको बदल दिया तो हमारी परंपरा, हमारी मान्यताएं, हमारी शांति और आनन्द वह तो फिर सब नष्ट हो जाएगा। अभी तो उल्टा हो गया। हमने दुनिया को बदलना था लेकिन दुनिया ने हमें बदल दिया! हम पदार्थों के पुजारी हो गए! निश्चित रूप से प्रकृति या परमात्मा के द्वारा प्राणियों को जो चोट पहुँचाई जाती है वो नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि कुछ नया आकार देने के लिए होती है। जैसे बच्चे में कोई दोष आ जाए तो माता उसे थोड़ा सा दण्ड देकर सुधारती है, मैं इस दृष्टि से उत्तराखंड की इस प्राकृतिक आपदा को देखती हूँ। घोर विपति के इस समय में मैंने उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों के घरों में जाने का प्रयास किया। मैंने देखा कि यहाँ मातृशक्ति के पसीने से ही यह देवभूमि हरी भरी है। मन करता है कि मैं देवभूमि की माताओं का वंदन करूं।

घर में चूल्हा जला, मवेशियों को चारा मिला, तुमने खेतों को अपने पसीने से सींचा, तुमने संतानों को भी संस्कार दिया। हे माँ, जब मैं तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि मैंने साक्षात् पार्वती माता का दर्शन कर लिया। वो अम्बा, वो जगदम्बा जो अपनी संतानों के लिए श्रम का पसीना बहाकर अपने मकान को ‘घर’ बनाए, मैं उसका दिल से अभिनन्दन करती हूँ। तेरे कारण ही तो मंदिरों के दीप जगर-मगर होते हैं माँ। तेरी साधना अविरत है माँ। वह तो एक नदी की तरह सतत् प्रवाहमान है। तुम्हारी संतानों को देवत्व मिले ये जिम्मेदारी तुम्हारी है। परिस्थितियों से घबराकर असहाय हो जाना शंकर के भक्त जानते ही नहीं हैं क्योंकि घोर अभावों के बीच भी वे अपने आप में स्थित रहने की कला जानते हैं। इसलिए इस समय हमारे लिए जो करणीय है वो हमें करना चाहिए। चिंतन करना चाहिए और उसी चिंतन के मंथन में से अमृत निकलेगा ये बात निश्चित है।

अगर हम शंकर नहीं बने तो क्या हुआ। अरघे के ऊपर नहीं बैठ सके तो क्या हुआ? लेकिन अरघे तक भक्तों जो सैलाब उमड़कर जाता है यदि उन सीढि़यों के कंकर बनने का अवसर भी यदि मिल जाए तो यह भी एक बहुत बड़ा सौभाग्य है। कौन ऐसा शंकर है जो कंकरों मंे से पैदा नहीं होता? क्योंकि कहा भी गया है कि ‘पत्थर जो चोट खा कर टूट गया, कंकर बन गया और पत्थर जो चोट को सह गया वह शंकर बन गया।’ इसलिए परिस्थितियों की चोटों के बीच भी हमें हमारे अस्तित्व, हमारी परंपराओं, हमारी मान्यताओं को शुभ और शिव के साथ जोड़े रखना है। मैं उत्तराखंडवासियों के बीच बैठकर यह अनुभव करती हूँ कि मुझे सहज रूप से वहाँ के नन्हें बच्चों और माता-बहनों के उत्कर्ष के लिए कार्य करना है। वृंदावन के वात्सल्य ग्राम में भी हमने इन्हीं भाव संबंधों पर कार्य किया और एक बड़ा वात्सल्य परिवार बनाया। जिनका कोई नहीं था उन सबको मिलाकर एक अद्भुत परिवार बन गया। हमने कोशिश की है कि हम उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों के लोगों तक अपने सेवाकार्यों को पहुंचा सकें। देवभूमि में पवित्रता पाने के लिए आया जाता है, कुछ देने के लिए नहीं। इसलिए हम अपनी सेवाएं भी इसी भाव के साथ यहाँ समर्पित कर रहे हैं। अपनी सेवाओं के बदले हम सब लोगों को यहाँ की पावनता और शुचिता का प्रसाद मिल सके, यही भाव है परमशक्ति पीठ का। उत्तराखंड की बहनों की आँखों से बहे आँसुओं ने मुझे बहुत भीतर तक द्रवित किया। मैं भूल गई कि मैं एक संन्यासिनी हूँ। मैंने केवल एक साधारण स्त्री के दर्द को अपने अन्दर महसूस किया। मैंने अपने गुरुदेव से कहा कि उत्तराखंडवासी बहनों के आशुओं के प्रवाह में मेरे विवेक का बाँध टूट गया। मैं एक सामान्य स्त्री के धरातल पर आकर खड़ी हो गई। उनकी वो पीड़ा मेरी आँखों से मंदाकिनी के प्रवाह की तरह बहती रही। मैं भी एक स्त्री हूँ, मैं भी एक माँ हूँ, मैं भी दीदी हूँ। मैं यह जानती हूँ कि जब मन का दर्द बहुत ज्यादा हो जाता है तो मनुष्य को स्वयं ही उसकी दवा भी बनना पड़ता है। बहुत सारे दुखद दृश्यों को यहाँ आकर देखना पड़ा। लेकिन अपने पैरों पर खड़ा ही एक मार्ग है। किसी दूसरे की ओर आशा से देखना स्वाभिमानशून्यता है। किसी दूसरे पर निर्भर होना भारत के किसी भी बच्चे और स्त्री को शोभा नहीं देता। हम अपनी विषम परिस्थितियों से निकलकर स्वयं ही अपने पैरों पर खड़े होंगे, हमें यह निश्चय करना है। भारत को यही निश्चय चाहिए। तात्कालिक परिस्थितियां ज़रूर कभी-कभी ऐसी होती हैं कि वो बड़े-बड़ों को हाथ फैलाने पर विवश कर सकती हैं लेकिन बहुत लंबे समय तक ऐसा नहीं रहना चाहिए। हम यदि गिरें तो भले ही किसी का हाथ उठने में हमारी सहायता कर दे लेकिन फिर आगे का सफर हमें अपने कदमों पर ही तय करना चाहिए। सहायता भी एक सीमा तक ही लेनी चाहिए। नहीं तो सहायता लेते ही रहना हमें अकर्मण्य बना देता है। यहाँ उत्तराखंड में वात्सल्य का हमारा यह कार्य यहाँ के लोगों को त्रासदी से उबारकर अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए ही चलाया जा रहा है। निश्चित रूप से यह ईश्वर की किसी बड़ी योजना का ही एक हिस्सा होगा क्योंकि हम सब तो उनके हाथों की कठपुतली भर हैं। उन्हें हमसे जो करवाना है वह उसे हमें अपना निमित बनवाकर कर लेते हैं।

यहाँ वे सारे लोग जिनको इस त्रासदी में फंसकर अन्त्येष्टि की आग भी नसीब नहीं हुई, जो मंदाकिनी मैया की धार में बहे या फिर पहाड़ों के नीचे दब गए मैं उन सबको अपनी करुणा का अघ्र्य अर्पित करती हूँ। निश्चित रूप से भगवान शंकर सबका कल्याण करते हैं। ये मृत्यु बहुत दुखदायी थीं लेकिन वह जो कुछ भी था प्रभु की योजना था। उनकी योजना के सामने कोई योजक टिक नहीं सकता। उसका प्रवाह ऐसा है कि मनुष्य का अहंकार उसके आगे पत्तों की तरह बिखर जाता हैै। इसलिए हम अपने उस अभिमान से मुक्त होकर शिवत्व को समझें। इस त्रासदी के सभी मृतक प्रभु के चरणों में हैं उनका कल्याण ही होगा। मैं भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उत्तराखंडवासियों का जीवन दोबारा पटरी पर आए, भगवान केदारनाथ जी के दर्शनों की यात्रा पुनः प्रारंभ हो ताकि यहाँ के निवासी फिर से अपने पैरों पर खड़े हो सकें ताकि हम किसी के मुखापेक्षी ना बनें, लेकिन उस मर्यादा के साथ जो भगवान ने हमारे लिए निश्चित की है।

मैं समझती हूँ कि सबसे सुन्दर दृश्य संस्थाओं या पदार्थों को खड़ा करके नहीं उत्पन्न होगा बल्कि इसके लिए वैचारिक क्रांति को जन्म देना होगा। हमें अपनी प्राचीन पवित्रता को लौटाना होगा। मर्यादाओं के साथ अपनी जीवन की तेजस्वी आभा को प्राप्त करना होगा। लेकिन इसके लिए हमें प्रवेश करना होगा। आप जानते हो कि महंगा धन तिजोरी में रखा जाता है और फिर उस पर एक मजबूत ताला लगाया जाता है। ताला तिजोरी से भी कम कीमती होता है जिसके भरोसे पर ही धन को छोड़ा जाता है। फिर उस ताले को खोलने और बन्द करने वाली चाबी तो ताले से भी कम कीमती होती है लेकिन सबसे ज्यादा भरोसा उस छोटी सी चाबी पर ही किया जाता है ना? इतने महंगे धन को उससे कम कीमत की तिजोरी में रखा, उससे भी कम कीमत का ताला लगाया और सबसे कम कीमत की चाबी के भरोसे उसे छोड़ा! एक दिन हथौड़े ने चाबी से पूछा कि ‘मैं दिनभर ठक-ठक करता रहूँ तो ये ताला टूट तो जाएगा लेकिन खुलेगा नहीं लेकिन तू इसे चुपचाप इतनी आसानी से कैसे खोल लेती है?’ चाबी ने उत्तर दिया -‘भैया, इस ताले के चुपचाप खुलने और बन्द होने का रहस्य इतना सा है कि मैं इसे खोलने के लिए इसके भीतर प्रवेश करती हूँ और तुम इसे खोलने के लिए इस पर प्रहार करते हो।’ कदाचित हम भी उस चाबी की तरह ही प्रेमपूर्वक अपनी भूमिका में प्रवेश करना सीखें। ये जो आपदा उत्तराखंड मंे आई यह प्रकृति पर हमारे निरन्तर प्रहार का ही नतीजा है। हमने आस्थापूर्वक प्रकृति में आंचल में प्रवेश करना सीखा ही नहीं। भारत के ऋषियों का दर्शन हमें प्रवेश करना सिखाता है। इसीलिए वर्षों तक साधना में रहने वाले ऋषि ने ग्रह-नक्षत्रों की चाल और गणना को समझ लिया था। वह प्रवेश था और प्रकृति में प्रवेश ही परमात्मा तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है।

- दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा 
- सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, नवम्बर 2013

Monday, July 29, 2013

मम्मी नहीं माँ कहिए और उसके अर्थ को समझें -‘दीदी माँ’ साध्वी ऋतम्भरा

दीदी माँ
अपने देश को समथ्र और समृद्ध बनाने के लिए सुप्त मातृशक्ति का जागरण जरूरी है। हमें शक्ति अर्जित करने है। हमें अपनी शक्ति को पहचानना है और विषम परिस्थितियों से घिरे भारत को एक ऐसी दिशा प्रदान करनी है कि हमारा यह देश, हमारी यह धरा, हमारा यह समाल अपने उस खोए गौरव को पुनः प्राप्त करें जिस गौरव, जिस स्वाभिमान और जिस शक्ति से सम्पन्न हमारे पूर्वज थे, हमारे पुरखे थे।
 
हमारे देश में मातृशक्ति को जागृत करने के प्रयास पश्चिम की तर्ज पर हो रहे हैं। मेरी अपनी मान्यता है कि भारत की नारी-शक्ति, भारत की स्त्री, भारत की महिला, उन पवित्र परंपराओं, मान्यताओं और भारत के गौरव से भरे हुए इतिहास से परिचित होगी तो यह सोचकर कि ‘मुझे इतनी पवित्र पावन सांस्कृतिक परंपरा में जन्म लेने का अवसर मिला है, वह अपने दायित्व, गौरव और स्वाभिमान का अनुभव करेगी। भारत में स्त्री को कभी भोग्या की दृष्टि से नहीं देखा गया। भारत मातृपूजक देश है। याहँ माँ और जननी परमपूज्या होती हैं किंतु आजादी के पूर्व जो हमारी पूज्या थी उसे भोग्या मानने-बनाने का प्रयास हुआ। भारत की मातृ-शक्ति को पीछे धकेलने की कोशिश हुई। हम धीरे-धीरे अपनी गरिमा, अपने गौरव और अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान- शून्य होते चले गए। 

भारत की स्त्री को आज के बाजार में उपभोक्ताओं को आकृष्ट करने के लिए विज्ञापन के रूप में साजाया-दिखाया जाता है। हम पाश्चात्य संस्कृति से इतने प्रभावति हैं, इसके आकर्षण में इतना आबद्ध हैं कि अपने ‘स्व’ को भूल गए हैं। अपने स्वरूप को भूल गए हैं। परिणामस्वरूप आज अजीबोगरीब वातावरण में हम अपने को खड़ा पा रहे हैं। हम यह भूल गए हैं कि माँ निर्मात्री होती है। जननी संतान को जन्म देती है, माँ उसे द्विज बनाती है। माँ पुकारने से ‘माँ’ शब्द का उच्चारण करने से हृदय में वात्सल्य, स्नेह और समर्पण का अद्भुत भाव उमड़ उठता है। प्रत्येक स्त्री को माँ होने का सौभाग्य मिला है? किन्तु हमारी अधिकाँश माताएँ, बहनें स्वयं को ‘मम्मी’ कहलाने में गौरव का अनुभव करने लगी हैं। अब कितनी बची हैं ‘माँ’ अपने देश में? अब माताएँ माँ नहीं, केवल मम्मी हैं। काश! माँ होतीं तो समझतीं कि यह सम्बोधन कितना सागरर्भित, कितना मार्मिक और कितना संस्कारक्षम है। 

हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे समस्त संवेदनशील सम्बन्धों की जीवन्तता नष्ट हो गई है। अब हमें यह बताने की आवश्यकता आन पड़ी है कि माँ कहने से हृदय में एक अजीब सी तृप्ति का अनुभव होता है जो ‘मम्मी’ कहने से नहीं हो सकता। पिता जहाँ ‘डैड’ हो गए हों, माँ जहाँ ‘मम्मी’ हो गईं हों तो क्या जाने माँ सन्तान का सुख और क्या जाने संतान माता-पिता के वात्सल्य का आनन्द? कुछ लोग कहते हैं कि शब्दों में क्या रखा है? वे यह नहीं जानते कि शब्दों में बड़े गहरे अर्थ छिपे रहते हैं। हमने जो कुछ खोया है हम उसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं। मात्र जागने की जरूरत है। केवल अनुभव करने की जरूरत है। जब घर में पुत्र का जन्म होता है तो लोग कहते हैं ‘‘आपको बधाई हो, आपके कुल का ‘दीपक’ प्रज्जवलित हो गया।’’ लेकिन जो आपके कुल का दीपक है, घर का चिराग, उसके जन्मदिन पर केक काटते, मोमबŸिायाँ बुझाते, ताली पीटते आपकोे शर्म का अनुभव नहीं होता कि, ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ का मंत्र दिया था। आज हमारा ही कुल-दीपक, दीपक बुझा रहा है और हम सीना तानकर तालियाँ पीट रहे हैं? क्या इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं हो सकता है? अपनी संतानों को प्रकाश से अंधकार की ओर नहीं, अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा दीजिए ताकि उन्हें पता चले कि प्रकाश की कीमत क्या होती है? वे यह अनुभव करें कि प्रकाश की कीमत क्या होती है?वे यह अनुभव करें कि तेजस्विता, ओजस्विता किसे कहते हैं? यह अनुभव वे कैसे करेंगी? माँ प्रातः काल उठेगी, अपनी सन्तानों को सूर्योदय का दर्शन कराएगी। तब उनके हृदय में तेजस्विता का संचार होगा। अपनी संताने तेजस्वी बनें, ओजस्वी बनें, उन्हें पता चले कि प्रकाश किसे कहते हैं, उन्हें अनुभव हो कि दूसरों को आलोक देना, प्रकाश देना कैसा होता है। यह अनुभव वे कैसे करेंगे, जब तक माँ स्वयं उस अनुभूति से न गुजरेगी?

माँ की महिमा अपार-अथाव है। पशु-जगत में एक बार में ही बारह-बारह बच्चों को जन्म देने वाले पशु पाए जाते हैं। वे बारह-बारह संतानों की जननी बन जाते हैं, तब भी उनकी महिमा नहीं गाई जाती। क्योंकि महिमा संतान को जन्म देने में नहीं महिमा संतान को जन्म देकर उसे द्विज बना देने में है। महिमा तो उन ‘विद्यावतियों’ की होती है जिन्होंने ‘भगतसिंहों’ को फाँसी के फंदे पर झूलते देखा तो उनका कलेजा श्लोकवत् वाणी में बोला कि ‘मेरी कोख आज सार्थक हो गई कि मेरे पुत्र ने भारत की गुलामी की जंजीरें काटने के लिए फाँसी का फंदा चूम लिया, आज मेरा पुत्र को जन्म देना सार्थक हो गया।’

बनना तो विद्यावती जैसी माँ बनना। माँ बनने का सौभाग्य मिला है तो फिर यशोदा जैसी माँ बनना। कोई पूछता है कि कन्हैया की माँ का नाम क्या है तो देवकी का नहीं यशोदा मैया का नाम लिया जाता है। देवकी तो कान्हा की केवल जननी थीं। उनकी माँ यशोदा थीं। जननी होना अलग बात है और माँ होना सर्वथा अलग बात। माँ बनना हो तो जीजाबाई जैसी माँ बनो। ‘स्त्री’ को स्त्री होने का अर्थ समझना चाहिए। मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हम कितनी विचित्र दासता और गुलामी की मानसिकता के दौर से गुज़र रहे हैं कि अपनी परंपरा और क्षमता पर हमें गौरव का अनुभव ही नहीं होता। अपनी शक्ति पर हम विश्वास नहीं कर पाते। परमात्मा ने माँ को सर्वोच्च स्थान दिया है। लोग जब कहते हैं कि स्त्रियों के लिए कुछ ऐसा करो कि वह पुरुषों से भी आगे निकल जाएं तो बहुत पीड़ा होती है। स्त्री को पुरुष के समकक्ष खड़ा करना मूर्खता है। जिसका स्थान देवताओं से भी ऊँचा है, उसको पुरुषों के समकक्ष और उसे आगे निकल जाने की होड़ में खड़ा करोगे? इसका अर्थ यह है कि हमने भारतीय संस्कृति को समझा ही नहीं। भारत की महिला की महिमा बड़ी विचित्र है और इसे समझने के लिए हृदय चाहिए।