About Didi Maa

Monday, August 5, 2013

परमात्मा स्वरुप हैं सदगुरुदेव...

जब वो मुस्कुराते हैं तो लगता है कि हम सबके लिए मोक्ष का द्वार खुल गया। हम बहुत सारे शिष्य-शिष्याएं हैं गुरुदेव के लेकिन सबका उनके साथ एक अलग तरह का बहुत ही खूबसूरत सा अंतरंग रिश्ता है। उस जगह को उनके सिवाय कोई और दूसरा भर ही नहीं सकता। उनकी सन्निद्धी में रहते हुए एक सुनिश्चित सुरक्षा का भाव मन में रहता है। गुरुदेव के लिये कुछ भी चयनित और चिन्हित नहीं होता। कई बार लोगों को लगता है कि गुरुदेव पात्रता देखते हैं। मेरा ऐसा अनुभव है कि वे कभी भी किसी की पात्रता नहीं देखते। वे तो बस बादलों के समान बरस जाते हैं। जब हम गुरुदेव के आश्रम में आए  तो बहुत बार लगता था कि यहाँ के लिए कुछ करने वालों को बहुत प्रतिष्ठा मिलती होगी। जैसे आश्रम में कोई एक कमरा बनवा देता था, उसके द्वार पर उसके नाम का एक शिलापट्ट लगा होता। उनमें से कई लोग इसी अभिमान से भरे होते थे कि हमने इस आश्रम के लिए एक कमरा बनवा दिया। वो लोग बार-बार अपने उस कृतित्व को व्यक्त करते।

यह सब देखकर हमने भी सोचा कि चलो अपन भी कुछ गेहूँ इकट्ठा करते हैं आश्रम के लिए, शायद यहाँ पर अपना भी कोई विशेष सम्मानजनक स्थान बन जाये। नये-नये दीक्षित हुए  थे, बालमन लिए हुए निकल पड़े। गाँव-गाँव भटकते रहे। एक जगह जाँच  चैकी पर चेंकिंग के नाम पर पुलिस ने हमें दो दिन तक रोके रखा। इस  तरह बहुत सारी परेशानियों के बाद हम गेहूँ इकट्ठा करके वापिस आश्रम पहुँचे। सोचा कि गुरुदेव बहुत प्रसन्न होंगे, सबके बीच हमारी जय-जयकार हो जायेगी। लेकिन गुरुदेव के चरणों में बैठकर जब उनके मुख की ओर देखा तो लगा कि उनपर जैसे कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं हुई उस गेहूँ संग्रहण को लेकर। वे कुछ नहीं बोले लेकिन निश्चित तौर पर मुझे ऐसा अनुभव हुआ जैसे उनका मौन मुखरित हो उठा और वे बोल रहे हैं कि -‘ऋतंभरा, आश्रम में अपनी जगह या प्रतिष्ठा बनाने के लिए इतना भटकने की क्या आवश्यकता थी, उसके लिए तो तुम्हारा समर्पण ही पर्याप्त है।’    

गुरु के आश्रम में करना या ना करना मायने नहीं रखता मात्र समर्पण ही उनकी नज़रों में आपको श्रेष्ठता प्रदान कर देता है। जो समर्पित हो गया है, वह बिन्दु जो सिन्धु में मिल गई है उसका जो आनन्द हो, उसकी विराटता का जो रोमंाच है वह बिन्दु बने रहने में संभव नहीं है। ऐसा लगता है कि हम अपने आप में कुछ नहीं होते। कई बार हमें संग का रंग जम जाता है। हमारे आश्रम में कुछ लोग आये और कहने लगे कि हमें बद्रीनाथ जाना है। हमने कहा -गुरुदेव, ये लोग बद्रीनाथ जा रहे हैं, मुझे भी जाना है।’ गुरुदेव बोले -‘तुम क्या करोगी वहाँ?’ मैंने कहा -गुरुदेव, भगवान हैं वहाँ, उनके दर्शन करूँगी।’ वे बोले -‘क्या यहाँ भगवान नहीं हैं?’ मैंने सोचा कि अब क्या करूँ, जाने का मन तो है और जो गुरुदेव कह रहे हैं वो भी सत्य है। मैंने कहा -‘गुरुदेव, वहाँ पहाड़ हैं, सुन्दर हरियाली से भरे हुए।’ गुरुदेव ने हरिद्वार के आश्रम से ही दिख रहे मन्सादेवी पर्वत की ओर संकेत करते हुए कहा -‘वो देखो, सामने हरियाली से भरा हुआ सुन्दर पर्वत।’ मैंने कहा -‘गुरुदेव, बद्रीनाथ के उन पहाड़ों पर बर्फ होती है।’ गुरुदेव ने पास खड़े शिष्यों से कहा -‘ज्योति को बर्फ पसंद है जाओ जरा जाकर बर्फ की दो चार सिल्लियाँ ले आओ और इसके आस-पास रख दो।’ मैंने कहा -गुरुदेव, आप मेरा बद्रीनाथ जाने का किराया नहीं देना चाहते।’ गुरुदेव कुछ क्षण मेरी ओर देखते रहे और बोले -‘अच्छा, हम किराया नहीं देना चाहते?’ यह कहते हुए उन्होंने अपनी जेब से कुछ रूपये निकालकर मेरी गोद में डाल दिये।

मुझे तो बस बद्रीनाथ जाने की लगी थी सो वो रूपये उठाकर रख लिये और उन गृहस्थियों के साथ हरिद्वार से बद्रीनाथ की ओर रवाना हो गई। जब ऋषिकेश के बस अड्डे पर पहुँचे तो वहाँ सूचना प्रसारित हो रही थी कि बद्रीनाथ के रास्ते पर एक बड़ा पहाड़ गिर गया है और अब सात दिनों बाद ही वह रास्ता खुलने की संभावना है। जिनके साथ मैं गई थी वो सारे गृहस्थी गंगा स्नान कर रहे थे, ऋषिकेश के मन्दिरों के दर्शन कर रहे थे लेकिन मैं जस की तस मूर्ति बनी बैठी थी। मेरे अंतर्मन ने मुझे अधिकार ही नहीं दिया कि मैं अंजुलि भरकर गंगाजी का आचमन ही कर लूँ। सांझ हुई तो मैं वापिस हरिद्वार आ गई। अब मेरा अहंकार मुझे बाधा डाल रहा था कि मैं कैसे गुरूजी के सामने जाऊँ। इसी सोच विचार में आश्रम के निकट रानी गली से गुजर रहे नाले के ऊपर बनी पुलिया पर ही मैं बैठ गई। मैंने सोचा यहीं बैठी रहूँ, कोई न कोई सन्त-महात्मा मुझे देख ही लेगा और वो गुरूजी को बता ही देगा। वही हुआ भी। किसी ने गुरूदेव को बताया कि मैं वहाँ बैठी हुई हूँ। गुरूदेव ने आश्रम के द्वार पर आकर मुझे वहीं से आवाज लगाई -‘आ जाओ, आ जाओ, लौट के बुद्धू घर को आये।’ मैं दौड़कर गुरुदेव के चरणों से लिपट गई। उनके सामने ही मन में पक्का निश्चय किया कि जहाँ गुरुदेव की इच्छा नहीं होगी वहाँ कभी नहीं जाऊँगी भले ही वह भगवान का घर ही क्यों न हो। क्यांेकि उनके संकल्पों से ही हम चलते हैं उनकी प्रेरणा ही है जो हमारी गति बन जाती है।

ऐसे सद्गुरुदेव जिन्होंने वत्सलता दी, प्रेम दिया, हमें तराशा। कल कोई हमसे पूछ रहा था कि आप सबसे ज्यादा किनके लिए व्याकुल होती हो?’ मैंने अपने आपको बहुत टटोला। क्योंकि मैं बहुतों को प्यार करती हूँ। वात्सल्य ग्राम के बच्चे, वात्सल्य परिवार के मिशन से जुड़े उन सब लोगों को स्नेह करती हूँ जो दिन रात उसकी सफलता के लिए कार्यरत् हैं। लेकिन प्राण तो गुरुदेव के चरणों में आकर ही खिलते हैं। मैं सोचती हूँ कि हम इतने अर्पित क्यों हो गये? फिर मुझे लगता है कि गुरुदेव ने कभी भी हमारी निजता का हनन नहीं किया। उन्होंने हमें पूरी तरह से खिलने दिया। नहीं तो एक संन्यासिन अपनी ममता बच्चों पर लुटाये ये दृश्य भारत की परंपरागत संन्यास परंपरा से मेल नहीं खाता। मेरे गुरुदेव ने कभी भी हम पर बाहर से कुछ नहीं थोपा और हमें अपनी निजता के साथ ही खिलने दिया। उन्होंने हमें हमेशा अपनी तरह से कार्य करने की आजादी दी। निश्चित रूप से वो ये जानते रहे होंगे कि यदि मैं इस प्रक्रिया से नहीं गुजरी तो कहीं न कहीं अधूरी रह जाऊँगी। मेरा मातृत्व कहीं अतृप्त रह जायेगा। हमने जो भी पाया है अपने गुरुदेव के चरणांे में पाया है। किसी ने कितना कर लिया, कितना पा लिया, कितनी प्रतिष्ठा और यश को पा लिया...यह सब तुच्छ है, गौण है। गुरुदेव के चरणों में बैठकर, उनकी कृपा का प्रसाद पाकर जिस धन्यता का अनुभव होता है वह एक विराट का शहंशाह बन जाने जैसी अनुभूति है।

अपने गुरुदेव के प्रेम में पगे हुए हम सब रात-दिन कार्य करते हंै। कभी बोझिल नहीं होते, कभी नहीं थकते। बस यही है वह विधा जो हमने  अपने सद्गुरु को देख-देखकर पाई है। एकबार हमने ऐसा दृश्य देखा कि जब आश्रम के सारे साधक विश्राम कर रहे थे तब वहां बने 32 शौचालयों के पास बने गटर का ढक्कन खोलकर गुरुदेव उसमें से फावड़ा भर-भरकर मल निकालकर ट्राली में भरकर दूर कहीं फिंकवा रहे हैं। मुझे लगा कि कैसे प्यारे सद्गुरु हैं जो केवल मन के कल्मष को ही नहीं ध्वस्त करते बल्कि साधकों के तन की गंदगी को भी स्वयं साफ करके उन्हें निखारकर उनका आत्मबोध जाग्रत कर देते हैं। मेरे गुरुदेव केवल व्यासपीठों पर बैठने वाले नहीं बल्कि मेहनत के मसीहा हैं।

मुझे लगता है कि शायद आने वाला युग इन सब बातों के लिये तरस जायेगा। इन बातों का यह जो अनिवर्चनीय आनन्द है उसके लिए न तो ऐसे गुरु होंगे और न ही शिष्य। एक दिन गुरुदेव कह रहे थे कि अच्छे व्यक्तियों के गुणों का उत्तराधिकारी मिलना चाहिये। ऐसा हो सके तो चित्त में प्रसन्नता होगी। परिश्रम करना, हरपल आनन्दित रहना, पगों में नृत्य उतार लेना, मन के आंगन को उत्सव वातावरण में रंग देना, हृदय को गौरीशंकर बना लेना, सबके बीच रहते हुए भी निर्लिप्त रहना यही तो मेरे गुरुदेव की दिव्यता है। हमने भगवान तो नहीं देखे लेकिन परमात्मा के रूप में गुरुदेव को देखा है। कभी वो बच्चों जैसी किलकारियां भरते हैं और कभी हम सबको एक मां के जैसे अपने आंचल में समेट लेते हैं। इसी जगत में कई ऐसे लोग हैं जो बड़े-बड़े गुरुओं के चेले होकर भी अपने गुरु के दर्शन को तरस जाते हैं लेकिन हम कितने भाग्यशाली हैं जो हम उसके साथ सहजता से मिलते हुए उनके क्षण-प्रतिक्षण पर कब्जा कर लेते हैं कि हे गुरुदेव अति आग्रहपूर्वक आपके समय के भी अधिकारी हैं। अपनी उदारता का ऐसा प्रसाद बांटने वाले सद्गुरुदेव जी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि वंदन अर्पित करती हूँ।   

                                                                                                                            -दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                       सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, जुलाई 2013

Friday, August 2, 2013

क्या तुम यह कर सकोगी माते?

वाणी की धनी, सरस्वती की कृपा पात्र, अन्नपूर्णा के रूप में सबको धन्य करने वाली, मकान को घर  बनाने वाली, संध्या के दीपों से घर को जगर-मगर करने वाली, प्रातः की प्रार्थना में अपने बच्चों को संस्कार देने वाली, इस धरा को, फिजाओं को, आसमान को एक नई रौनक देने वाली, तुम तो साक्षात् जननी हो माते, तुम निर्मात्री हो, तुम मानवता की टकसाल हो, अतीत के भारत में तुम कहीं पिछड़ी नहीं थीं। अगर ऐसा होता तो भारत के श्रेष्ठ पुरुष तुम्हें वरने के लिए लाइन लगाकर क्यों खड़े होते और तुम उसमें अपने गुणों और योग्यता के अनुरूप वर कैसे चुनतीं। अगर तुम अज्ञानी होतीं तो क्या मंदालसा बनकर अपनी संतानों को आत्मज्ञान दे सकती थीं? अगर तुम अज्ञानी होतीं तो अपनी लोरियों में ब्रह्मज्ञान की गूंज कैसे गुंजा  सकती थीं। अगर तुम केवल चूल्हे-चैके की सीमा में बंधीं होतीं तो राजा दशरथ के साथ कैकेयी क्या युद्ध के मैदान में डटी होतीं? वही आज आप लोग कर रही हो।

तब रथ  का पहिया टूटा था जो आज ‘इनरव्हील’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से की धुरी बनकर महिलाओं की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका को सुनिश्चित कर रहा है। अगर तुम डरपोक होतीं तो हज़ारों-हज़ार विदेशी आक्रमणकारियों के मुण्ड काट-काटकर माँ भारती के चरणों में अर्पित करने वाली झाँसी की रानी नहीं बन सकती थीं। अगर तुम असहाय होतीं तो फिर त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नन्हें बालक बनकर तुम्हारी गोद का आश्रय कैसे पा सकते थे? त्रिदेवों को भी उनके बौनेपन का एहसास कराकर जब तुम सती अनूसुईया बनती हो तब संसार की शक्तियों को भी नन्हे शिशु बनाकर पालने में डाल देती हो। यह भारत का वह गौरवपूर्ण इतिहास है जिसने आसमान की बुलंदियों को छुआ। इसी देश में बीस-बीस हजार छात्रों के गुरुकुल हुए और उनकी आचार्य स्त्री हुई!  जाने कितनी-कितनी ऋचाओं की रचना करने वाली भारत की ही नारियाँ हुईं। निश्चित रूप से कौशल्या की ममता, जानकी की पावनता, अनूसुईया की दृढ़ता और अहिल्या शापित होती है तो केवल भारत नहीं बल्कि ब्रह्माण्ड के नायक यदि उसकी कुटिया में जाकर अपना सौभाग्य अनुभव करते हैं तो निश्चित रूप से आज नारी को यथेष्ट सम्मान मिलने में हमसे कहाँ चूक हो रही है इस बात का चिंतन करना चाहिए। 

गुलामी का काल था इसलिए हम किसी दूसरे पर आरोप लगायें यह उचित नहीं है।  लेकिन स्त्री और स्त्रित्व का भाव जिसने कहीं न कहीं हमें हीन भावना से ग्रसित किया। देश के अन्दर वातावरण बना कि ये जो स्त्रियाँ रजस्वला होती हैं ये दण्ड है। पुत्र, पिता या पति के आधीन रहना ये दण्ड है। मुखापेक्षी होना ये दण्ड है। निश्चित रूप से बहुत व्याकुलता थी क्योंकि स्त्री ने बहुत बुरे दिन देखे। इतने बुरे दिन कि वह मिट्टी की तरह धुनी गई। उसे बच्चे पैदा करने की मशीन समझा गया। उसे पर्दे के भीतर बन्द कर दिया गया। कारण खोजने जाएंगे तो हमें बहुत सारे दूसरे-दूसरे कारण मिलेंगे लेकिन यह बात निश्चित है कि हम अपने अस्तित्व को भूल गये, अपनी गरिमा और अपने गौरव को भूल गये। देश के अन्दर एक विचित्र सा वातावरण बना कि नारी को मुक्ति का मार्ग मिलना चाहिये और वो स्त्री जिसका सशक्तिकरण होना चाहिए था उसे लगने लगा कि पति का प्यार जो कि पायल के रूप में मेरे पैरों में है वह बन्धन है। मुझे इससे मुक्त होना है। देश के अन्दर एक बड़ा विचित्र सा वातावरण बना जिसके कारण घर मकान बनने लगे। रिश्ते दरकने लगे। ‘अर्थ’ का अर्थ तो रह गया लेकिन रिश्तों का अर्थ खोने लगा।

इन सारी परिस्थितियों के बीच देश ने वह दृश्य भी देखें हैं जब राजनीति की चकाचैंध में आने के लिए महिलायें राजनेताओं के कक्ष के बाहर आधी रात तक लगाकर खड़ी रहीं हैं, आखिर क्यों? ऊँचाईयों को छूने के लिए क्या तुम अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करोगी या अपने मातृत्व का गला घोंट दोगी? क्या तुमने अपने स्त्रियत्व को तिलांजलि देकर ही ऊँचाईयों के शिखरों को छूना है। उड़ान भरना अच्छी बात है लेकिन मुझे नहीं लगता कि पूरे समय कोई आसमान में उड़ते रह सकता है। जब पंख थकने लगते हैं तो फिर किसी घरौंदे की आवश्यकता होती ही है, लौटकर वहीं आना पड़ता है। जहाँ बैठकर विश्राम किया जा सके। वो विश्राम मिले रिश्तों का, वो विश्रान्ति सन्तानों की, यदि मैंने घर को मन्दिर नहीं बनाया तो मैं अपने देश का उद्धार भी कभी नहीं कर सकती। कदाचित्, मैं समझूँ कि मैं गंगोत्री की वह बूंद हूँ जो आगे चलकर महापाटों के साथ न जाने कितने-कितने गाँवों को धन्य करती आगे बढ़ती है। कदाचित् मैं समझूँ कि मैं गायत्री की वो गंगा हूँ, मैं जीवन का वो माधुर्य हूँ जिसको पाकर मनुष्यता तृप्त होती है।

बुरा मत मानियेगा, बहुत बार सिगरेट पे सिगरेट पीने वालों को जब मैं देखती हूँ तो मुझे लगता है कि कदाचित् इसको इसकी माँ ने जीभर कर अपने स्तनों का पान करा दिया होता तो आज ये इस सिगरेट में तृप्ति की तलाश नहीं करता। मुझे लगता है कि दामिनी जैसी मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी से पेश आने वाले बच्चों को भी तो जन्म हमारी ही किसी माता ने दिया है ना? क्या हमने उन्हें बताया कि स्त्री केवल शरीर नहीं होती। वो केवल भोगने की चीज नहीं होती। भारत के अन्दर स्त्री ‘भोग्या’ हो ये तो हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। वो पूज्या के पद पर जब प्रतिष्ठित थी किसके बल पर आगे बढ़ी? अपनी प्रतिभा के बल पर। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस देश के अन्दर अगर स्त्री संन्यासी हो जाये तो बड़ा विचित्र वातावरण बन जाता था आज से 32 साल पहले। हम अपने गुरुदेव की शरण में आये। कितना वैराग्य था हमारे मन में कि अभी संन्यास चाहिये। संन्यास हुआ। फिर कार्यक्रमों का सिलसिला चल पड़ा। बहुत सारे साधु-महात्माओं के बीच में हम ऐसे चुपचाप बैठे रहते जैसे कि हमने संन्यासी होकर कोई अपराध कर दिया हो। इस देश में वातावरण बना और हम समाज के नवनिर्माण के लिए अपना योगदान देने लगे। ऐसी ही एक बड़ी सभा में अनेक सन्त-महात्माओं के  साथ मंै भी मंच पर थी। एक महात्मा जी बोले -‘ऋतम्भरा तो हमारी शक्ति है।’ यह सुनकर मेरा मन गर्व से भर उठा। लेकिन इस एक वाक्य को सुनने के लिए हमने बरसों-बरस तक भारत के धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते हुए गली-गली की धूल फाँकी। यह बताते रहे कि जब हम अभय पद पर प्रतिष्ठित होती हैं तो अपनी मृत्यु को भी ललकार सकती हैं

ऐसी निर्भयता कहाँ आयेगी? तो फिर चलो भारत के उन संस्कारों की तरफ अग्रसर हो जाओ जो सुख-दुःख की झूठी चाह से मुक्त कर देते हैं। तुम वही भीतर का केन्द्रबिन्दु हो माते जिसके चारों ओर संस्कारों का पहिया घूमता है। तुम पुरुष को तृप्ति देती हो, संतानों को संस्कार देती हो। तुम्हारी बड़ी अद्भुत भूमिका है। दुनिया कहेगी कि परिचय क्या है? कुछ साल पहले यह होता था कि डाॅक्टर की घरवाली डाॅक्टरनी कहलाती थी। बिना डिग्री के भले ही उसके पास कोई योग्यता नहीं होती थी लेकिन उसे सब डाॅक्टरनी ही कहते थे। ऐसा कहीं होता है। लेकिन हाँ, हमें लगा कि हमारी भी एक पृथक पहचान होनी चाहिये। पहचान की इस छटपटाहट के बीच देश के अन्दर बहुत सारे ताने-बाने बुने गए। मुझे नहीं लगता कि अगर उत्तरदायित्व बन्धन है तो मैंने भी तो संन्यासी होकर एक उत्तरदायित्व लिया।

पालने के अन्दर जिस तरह से बच्चियाँ फेंकी जाती हैं कि सुनकर आपकी रूह काँप उठे। इतने पापी लोग हैं अभी कुछ ही दिन पहले ही एक बच्ची को वात्सल्य ग्राम के पालने में छोड़ गए, इतनी ठण्ड में उसे ठीक से कपड़े में लपेटा भी नहीं। उस बच्ची ने ठण्ड में दम तोड़ दिया। इतनी निर्दयता! यह भारत का एक घिनौना सच है। कहाँ गई इन्सानियत, कहाँ गई मनुष्यता? अगर किसी लड़की ने अपने कुंआरेपन में किसी बच्चे को जन्म दे दिया तो फिर उसे अवैध कहा जाता है। मैं यह कहती हूँ कि रिश्ता अवैध हो सकता है लेकिन सन्तान कभी अवैध नहीं हो सकती। दो जनों के प्यार के बीच तीसरा पुष्प खिलता है। क्या इस देश की मातृशक्ति यह संकल्प लेने को तैयार है कि हम यह तय करेंगे यदि इस प्रकार के संबंधों में किसी संतान धरती पर आ गई है तो हम अपने सम्मिलित प्रयत्नों से उसकी माँ को उसेे गंदगी मानकर कूड़े के ढेर पर नहीं फेंकने देंगे। क्या हमारा समाज इस तथाकथित झूठी इज्जत के खोल से बाहर आयेगा? अपने सच को स्वीकारेगा? क्या हम ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं?
                                                                                          
                                                                                                                            -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                      सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, फ़रवरी 2013                           

अच्छे इरादों से ही आत्मिक आनन्द मिलता है...

मुझे इस बात का संतोष है कि जिन उद्देश्यों को लेकर प्रतिवर्ष इस ‘बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर’ का आयोजन होता है उसमें विभिन्न प्रांतों से भाग लेने वाली बालिकाएं उन्हें पूरी तरह से आत्मसात करने का प्रयत्न कर रही हैं। व्यक्ति यदि सच्चाई और सत्यनिष्ठा के साथ अपना जीवन जीता है तो उसके व्यक्तित्व में गौरव गरिमा जुड़ जाती है। वे जिन जीवन मूल्यों को जिंदगी के साथ लेकर चलते हैं वे उसकी आभा बन जाते हैं। मनुष्य अपनी नियति को स्वयं निर्धारित करता है। सफलता उन्हें ही मिलती है जो कार्य के दौरान डाली गई बाधाओं को पार करते हैं। बच्चों ने शिविर में शिशु के समान बने रहकर बहुत कुछ अच्छा सीखने का प्रयत्न किया इस बात की मुझे बहुत प्रसन्नता है। अनुशासन की कटीली धारों को सहकर बच्चों ने अपनी सुबह से शाम तक की गतिविधियों में ऐसा बहुत कुछ सीखा है जो उन्हें अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन को सार्थक करने में बहुत सहायता प्रदान करेगा।

प्यारी बेटियों, हमेशा स्मरण रखना कि कभी भी नाली में पड़ा कंकर शंकर नहीं बनता। शंकर जो वही पत्थर बनता है जिसने नर्मदा की प्रचण्ड और वेगवान धाराओं को सहन करते हुए अपना ऐसा निर्माण कर लिया जिसने उस पत्थर के भीतर भी लोगों को शंकर के दर्शन करने का आनन्द दे दिया। बच्चों, अभी मैं देख रही थी कि आपने राष्ट्रभक्ति से भरपूर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां यहां दीं उन्हें प्रस्तुत करते समय आपके चेहरों पर जो उत्साह भरी चमक थी ना वही इस कार्यक्रम की सफलता है। अक्सर ऐसा होता है कि सुबह से शाम तक के कार्यक्रमों में थका देने वाले कार्यक्रमों के बाद मन बुझ सा जाता है। मैंने इस सात दिवसीय शिविर की संयोजिका शिरोमणि जी से कहा था कि शिविर में आने वाली बच्चियों की कोमलता को ज्यादा कष्ट नहीं देना। कोमलता स्वभाव है नारी का। इसको छोड़ कर शायद अपने अस्तित्व के साथ खिलवाड़ हो जाता है। और कोमलता चाहिये मनुष्यता को। अपना स्नेह और प्रेम से भरा हाथ जब किसी के सिर पर रख दोगी ना तो वो मनुष्यता को अर्जित कर लेगा।

बच्चों, उत्तराखण्ड के तीर्थों में हुई त्रासदी से मेरा मन उद्वेलित है। इतने पूरे भारत को दुखी किया है। लोग कहते हैं कि यह कुदरत का कहर है लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि कुदरत बहुत उदार होती है। तुम एक बीज धरती में डालोगे तो वह उसकेे बदले तुम्हें हजार वापिस लौटाती है। हम उसे जो देते हैं वही तो उससे पाते हैं ना? यह विचार पैदा होता है कि जो केदारनाथ सबके नाथ हैं वो लोगों को अपने आंगन में अनाथ करके वहां विराजित हैं! कदाचित उनके मन में शिकायत है हमारे लिए। वो कहते हैं कि मैं प्रकृति में हूं, मैं सृष्टि में हूं, मैं कण-कण में हूं। तुमने मुर्गी के अण्डे खाये, तुमने असहायों पर डण्डे बरसाये, तुमने अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण किया। तुमने धरती के साथ, प्रकृति के साथ सद्व्यवहार नहीं किया। अब तुम मेरी मूर्ति के सामने आकर मेरा सत्कार कर रहे हो? मैं संहार का देवता हूं लेकिन फिर भी मैं असमय किसी का संहार नहीं करना चाहता लेकिन तुमने यदि प्रकृति का उपहास किया है तो आज प्रकृति तुम्हारा उपहास कर रही है।

आज सारा देश उन लोगों के दर्द को अनुभव कर रहा है जो इस भीषण त्रासदी का शिकार हुए हंै। यह प्रकृति द्वारा किया गया अन्याय नहीं बल्कि हमारे द्वारा हमारे ही साथ किया गया व्यवहार है जो इस प्राकृतिक आपदा के रूप् में हमारे सामने आया है। हम जो चाहते हैं वहीं व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना चाहिए। अगर हम प्रकृति से कुछ अच्छा चाहते हैं तो उसके बदले हमें भी उसे कुछ देना होगा ना? हम अगर अपने दुष्कर्मों से प्रकृति को गंदा कर रहे हैं तो बदले में वह हमारा ख्याल कब तक रख सकेगी? केवल प्रकृति ही नहीं बल्कि अपने आसपास के प्राणी मात्र के साथ सद्व्यवहार करो बच्चों। नेह बांटो, प्रेम बांटो, भरोसा बांटो, अपने चित्त में संतोष लाओ, किसी एक की जिंदगी जरूर संवारों। किसी की मदद करो लेकिन ख्याल रहे कि जिसे मदद की है तुमने, उसे पता ही न चले कि किस हाथ ने उसकी मदद की है। ऐसा जीवन जियो जिसपर सब गौरव कर सकें।
बच्चों, प्रतिष्ठा बड़े पदों से मिल सकती है लेकिन प्रसन्नता हमेशा भीतर के अच्छे इरादों से आती है।  अगर कोई बोझिल है तो वह अपने पापों के पत्थरों से दबकर बोझिल होता है। जैसे जैसे इन पत्थरों से मुक्त होओगे तैसे ही तैसे हल्के होकर आनन्द से भर उठोगे। ऐसा व्यक्ति जिसके पास पश्चिम के जगत की त्वरा और पूरब के जगत की शांति हो तभी हम श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे। तुम मां बनोगी आने वाले समय में बेटियों, और जब मां बनोगी तो अपनी संतानों को बताना की बच्चे, स्त्री मात्र शरीर नहीं होती। जब उसे यह संस्कार दोगी तो आने वाले समय में फिर किसी भी ‘दामिनी’ के साथ बर्बर और अमानुषिक व्यवहार नहीं होगा।


                                                                                                                            -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                       सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, जुलाई 2013