About Didi Maa

Friday, August 2, 2013

क्या तुम यह कर सकोगी माते?

वाणी की धनी, सरस्वती की कृपा पात्र, अन्नपूर्णा के रूप में सबको धन्य करने वाली, मकान को घर  बनाने वाली, संध्या के दीपों से घर को जगर-मगर करने वाली, प्रातः की प्रार्थना में अपने बच्चों को संस्कार देने वाली, इस धरा को, फिजाओं को, आसमान को एक नई रौनक देने वाली, तुम तो साक्षात् जननी हो माते, तुम निर्मात्री हो, तुम मानवता की टकसाल हो, अतीत के भारत में तुम कहीं पिछड़ी नहीं थीं। अगर ऐसा होता तो भारत के श्रेष्ठ पुरुष तुम्हें वरने के लिए लाइन लगाकर क्यों खड़े होते और तुम उसमें अपने गुणों और योग्यता के अनुरूप वर कैसे चुनतीं। अगर तुम अज्ञानी होतीं तो क्या मंदालसा बनकर अपनी संतानों को आत्मज्ञान दे सकती थीं? अगर तुम अज्ञानी होतीं तो अपनी लोरियों में ब्रह्मज्ञान की गूंज कैसे गुंजा  सकती थीं। अगर तुम केवल चूल्हे-चैके की सीमा में बंधीं होतीं तो राजा दशरथ के साथ कैकेयी क्या युद्ध के मैदान में डटी होतीं? वही आज आप लोग कर रही हो।

तब रथ  का पहिया टूटा था जो आज ‘इनरव्हील’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से की धुरी बनकर महिलाओं की समाज में महत्वपूर्ण भूमिका को सुनिश्चित कर रहा है। अगर तुम डरपोक होतीं तो हज़ारों-हज़ार विदेशी आक्रमणकारियों के मुण्ड काट-काटकर माँ भारती के चरणों में अर्पित करने वाली झाँसी की रानी नहीं बन सकती थीं। अगर तुम असहाय होतीं तो फिर त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नन्हें बालक बनकर तुम्हारी गोद का आश्रय कैसे पा सकते थे? त्रिदेवों को भी उनके बौनेपन का एहसास कराकर जब तुम सती अनूसुईया बनती हो तब संसार की शक्तियों को भी नन्हे शिशु बनाकर पालने में डाल देती हो। यह भारत का वह गौरवपूर्ण इतिहास है जिसने आसमान की बुलंदियों को छुआ। इसी देश में बीस-बीस हजार छात्रों के गुरुकुल हुए और उनकी आचार्य स्त्री हुई!  जाने कितनी-कितनी ऋचाओं की रचना करने वाली भारत की ही नारियाँ हुईं। निश्चित रूप से कौशल्या की ममता, जानकी की पावनता, अनूसुईया की दृढ़ता और अहिल्या शापित होती है तो केवल भारत नहीं बल्कि ब्रह्माण्ड के नायक यदि उसकी कुटिया में जाकर अपना सौभाग्य अनुभव करते हैं तो निश्चित रूप से आज नारी को यथेष्ट सम्मान मिलने में हमसे कहाँ चूक हो रही है इस बात का चिंतन करना चाहिए। 

गुलामी का काल था इसलिए हम किसी दूसरे पर आरोप लगायें यह उचित नहीं है।  लेकिन स्त्री और स्त्रित्व का भाव जिसने कहीं न कहीं हमें हीन भावना से ग्रसित किया। देश के अन्दर वातावरण बना कि ये जो स्त्रियाँ रजस्वला होती हैं ये दण्ड है। पुत्र, पिता या पति के आधीन रहना ये दण्ड है। मुखापेक्षी होना ये दण्ड है। निश्चित रूप से बहुत व्याकुलता थी क्योंकि स्त्री ने बहुत बुरे दिन देखे। इतने बुरे दिन कि वह मिट्टी की तरह धुनी गई। उसे बच्चे पैदा करने की मशीन समझा गया। उसे पर्दे के भीतर बन्द कर दिया गया। कारण खोजने जाएंगे तो हमें बहुत सारे दूसरे-दूसरे कारण मिलेंगे लेकिन यह बात निश्चित है कि हम अपने अस्तित्व को भूल गये, अपनी गरिमा और अपने गौरव को भूल गये। देश के अन्दर एक विचित्र सा वातावरण बना कि नारी को मुक्ति का मार्ग मिलना चाहिये और वो स्त्री जिसका सशक्तिकरण होना चाहिए था उसे लगने लगा कि पति का प्यार जो कि पायल के रूप में मेरे पैरों में है वह बन्धन है। मुझे इससे मुक्त होना है। देश के अन्दर एक बड़ा विचित्र सा वातावरण बना जिसके कारण घर मकान बनने लगे। रिश्ते दरकने लगे। ‘अर्थ’ का अर्थ तो रह गया लेकिन रिश्तों का अर्थ खोने लगा।

इन सारी परिस्थितियों के बीच देश ने वह दृश्य भी देखें हैं जब राजनीति की चकाचैंध में आने के लिए महिलायें राजनेताओं के कक्ष के बाहर आधी रात तक लगाकर खड़ी रहीं हैं, आखिर क्यों? ऊँचाईयों को छूने के लिए क्या तुम अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करोगी या अपने मातृत्व का गला घोंट दोगी? क्या तुमने अपने स्त्रियत्व को तिलांजलि देकर ही ऊँचाईयों के शिखरों को छूना है। उड़ान भरना अच्छी बात है लेकिन मुझे नहीं लगता कि पूरे समय कोई आसमान में उड़ते रह सकता है। जब पंख थकने लगते हैं तो फिर किसी घरौंदे की आवश्यकता होती ही है, लौटकर वहीं आना पड़ता है। जहाँ बैठकर विश्राम किया जा सके। वो विश्राम मिले रिश्तों का, वो विश्रान्ति सन्तानों की, यदि मैंने घर को मन्दिर नहीं बनाया तो मैं अपने देश का उद्धार भी कभी नहीं कर सकती। कदाचित्, मैं समझूँ कि मैं गंगोत्री की वह बूंद हूँ जो आगे चलकर महापाटों के साथ न जाने कितने-कितने गाँवों को धन्य करती आगे बढ़ती है। कदाचित् मैं समझूँ कि मैं गायत्री की वो गंगा हूँ, मैं जीवन का वो माधुर्य हूँ जिसको पाकर मनुष्यता तृप्त होती है।

बुरा मत मानियेगा, बहुत बार सिगरेट पे सिगरेट पीने वालों को जब मैं देखती हूँ तो मुझे लगता है कि कदाचित् इसको इसकी माँ ने जीभर कर अपने स्तनों का पान करा दिया होता तो आज ये इस सिगरेट में तृप्ति की तलाश नहीं करता। मुझे लगता है कि दामिनी जैसी मासूम बच्ची के साथ दरिंदगी से पेश आने वाले बच्चों को भी तो जन्म हमारी ही किसी माता ने दिया है ना? क्या हमने उन्हें बताया कि स्त्री केवल शरीर नहीं होती। वो केवल भोगने की चीज नहीं होती। भारत के अन्दर स्त्री ‘भोग्या’ हो ये तो हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। वो पूज्या के पद पर जब प्रतिष्ठित थी किसके बल पर आगे बढ़ी? अपनी प्रतिभा के बल पर। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस देश के अन्दर अगर स्त्री संन्यासी हो जाये तो बड़ा विचित्र वातावरण बन जाता था आज से 32 साल पहले। हम अपने गुरुदेव की शरण में आये। कितना वैराग्य था हमारे मन में कि अभी संन्यास चाहिये। संन्यास हुआ। फिर कार्यक्रमों का सिलसिला चल पड़ा। बहुत सारे साधु-महात्माओं के बीच में हम ऐसे चुपचाप बैठे रहते जैसे कि हमने संन्यासी होकर कोई अपराध कर दिया हो। इस देश में वातावरण बना और हम समाज के नवनिर्माण के लिए अपना योगदान देने लगे। ऐसी ही एक बड़ी सभा में अनेक सन्त-महात्माओं के  साथ मंै भी मंच पर थी। एक महात्मा जी बोले -‘ऋतम्भरा तो हमारी शक्ति है।’ यह सुनकर मेरा मन गर्व से भर उठा। लेकिन इस एक वाक्य को सुनने के लिए हमने बरसों-बरस तक भारत के धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते हुए गली-गली की धूल फाँकी। यह बताते रहे कि जब हम अभय पद पर प्रतिष्ठित होती हैं तो अपनी मृत्यु को भी ललकार सकती हैं

ऐसी निर्भयता कहाँ आयेगी? तो फिर चलो भारत के उन संस्कारों की तरफ अग्रसर हो जाओ जो सुख-दुःख की झूठी चाह से मुक्त कर देते हैं। तुम वही भीतर का केन्द्रबिन्दु हो माते जिसके चारों ओर संस्कारों का पहिया घूमता है। तुम पुरुष को तृप्ति देती हो, संतानों को संस्कार देती हो। तुम्हारी बड़ी अद्भुत भूमिका है। दुनिया कहेगी कि परिचय क्या है? कुछ साल पहले यह होता था कि डाॅक्टर की घरवाली डाॅक्टरनी कहलाती थी। बिना डिग्री के भले ही उसके पास कोई योग्यता नहीं होती थी लेकिन उसे सब डाॅक्टरनी ही कहते थे। ऐसा कहीं होता है। लेकिन हाँ, हमें लगा कि हमारी भी एक पृथक पहचान होनी चाहिये। पहचान की इस छटपटाहट के बीच देश के अन्दर बहुत सारे ताने-बाने बुने गए। मुझे नहीं लगता कि अगर उत्तरदायित्व बन्धन है तो मैंने भी तो संन्यासी होकर एक उत्तरदायित्व लिया।

पालने के अन्दर जिस तरह से बच्चियाँ फेंकी जाती हैं कि सुनकर आपकी रूह काँप उठे। इतने पापी लोग हैं अभी कुछ ही दिन पहले ही एक बच्ची को वात्सल्य ग्राम के पालने में छोड़ गए, इतनी ठण्ड में उसे ठीक से कपड़े में लपेटा भी नहीं। उस बच्ची ने ठण्ड में दम तोड़ दिया। इतनी निर्दयता! यह भारत का एक घिनौना सच है। कहाँ गई इन्सानियत, कहाँ गई मनुष्यता? अगर किसी लड़की ने अपने कुंआरेपन में किसी बच्चे को जन्म दे दिया तो फिर उसे अवैध कहा जाता है। मैं यह कहती हूँ कि रिश्ता अवैध हो सकता है लेकिन सन्तान कभी अवैध नहीं हो सकती। दो जनों के प्यार के बीच तीसरा पुष्प खिलता है। क्या इस देश की मातृशक्ति यह संकल्प लेने को तैयार है कि हम यह तय करेंगे यदि इस प्रकार के संबंधों में किसी संतान धरती पर आ गई है तो हम अपने सम्मिलित प्रयत्नों से उसकी माँ को उसेे गंदगी मानकर कूड़े के ढेर पर नहीं फेंकने देंगे। क्या हमारा समाज इस तथाकथित झूठी इज्जत के खोल से बाहर आयेगा? अपने सच को स्वीकारेगा? क्या हम ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं?
                                                                                          
                                                                                                                            -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                      सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, फ़रवरी 2013                           

अच्छे इरादों से ही आत्मिक आनन्द मिलता है...

मुझे इस बात का संतोष है कि जिन उद्देश्यों को लेकर प्रतिवर्ष इस ‘बालिका व्यक्तित्व विकास शिविर’ का आयोजन होता है उसमें विभिन्न प्रांतों से भाग लेने वाली बालिकाएं उन्हें पूरी तरह से आत्मसात करने का प्रयत्न कर रही हैं। व्यक्ति यदि सच्चाई और सत्यनिष्ठा के साथ अपना जीवन जीता है तो उसके व्यक्तित्व में गौरव गरिमा जुड़ जाती है। वे जिन जीवन मूल्यों को जिंदगी के साथ लेकर चलते हैं वे उसकी आभा बन जाते हैं। मनुष्य अपनी नियति को स्वयं निर्धारित करता है। सफलता उन्हें ही मिलती है जो कार्य के दौरान डाली गई बाधाओं को पार करते हैं। बच्चों ने शिविर में शिशु के समान बने रहकर बहुत कुछ अच्छा सीखने का प्रयत्न किया इस बात की मुझे बहुत प्रसन्नता है। अनुशासन की कटीली धारों को सहकर बच्चों ने अपनी सुबह से शाम तक की गतिविधियों में ऐसा बहुत कुछ सीखा है जो उन्हें अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन को सार्थक करने में बहुत सहायता प्रदान करेगा।

प्यारी बेटियों, हमेशा स्मरण रखना कि कभी भी नाली में पड़ा कंकर शंकर नहीं बनता। शंकर जो वही पत्थर बनता है जिसने नर्मदा की प्रचण्ड और वेगवान धाराओं को सहन करते हुए अपना ऐसा निर्माण कर लिया जिसने उस पत्थर के भीतर भी लोगों को शंकर के दर्शन करने का आनन्द दे दिया। बच्चों, अभी मैं देख रही थी कि आपने राष्ट्रभक्ति से भरपूर सांस्कृतिक प्रस्तुतियां यहां दीं उन्हें प्रस्तुत करते समय आपके चेहरों पर जो उत्साह भरी चमक थी ना वही इस कार्यक्रम की सफलता है। अक्सर ऐसा होता है कि सुबह से शाम तक के कार्यक्रमों में थका देने वाले कार्यक्रमों के बाद मन बुझ सा जाता है। मैंने इस सात दिवसीय शिविर की संयोजिका शिरोमणि जी से कहा था कि शिविर में आने वाली बच्चियों की कोमलता को ज्यादा कष्ट नहीं देना। कोमलता स्वभाव है नारी का। इसको छोड़ कर शायद अपने अस्तित्व के साथ खिलवाड़ हो जाता है। और कोमलता चाहिये मनुष्यता को। अपना स्नेह और प्रेम से भरा हाथ जब किसी के सिर पर रख दोगी ना तो वो मनुष्यता को अर्जित कर लेगा।

बच्चों, उत्तराखण्ड के तीर्थों में हुई त्रासदी से मेरा मन उद्वेलित है। इतने पूरे भारत को दुखी किया है। लोग कहते हैं कि यह कुदरत का कहर है लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि कुदरत बहुत उदार होती है। तुम एक बीज धरती में डालोगे तो वह उसकेे बदले तुम्हें हजार वापिस लौटाती है। हम उसे जो देते हैं वही तो उससे पाते हैं ना? यह विचार पैदा होता है कि जो केदारनाथ सबके नाथ हैं वो लोगों को अपने आंगन में अनाथ करके वहां विराजित हैं! कदाचित उनके मन में शिकायत है हमारे लिए। वो कहते हैं कि मैं प्रकृति में हूं, मैं सृष्टि में हूं, मैं कण-कण में हूं। तुमने मुर्गी के अण्डे खाये, तुमने असहायों पर डण्डे बरसाये, तुमने अपनी मर्यादाओं का अतिक्रमण किया। तुमने धरती के साथ, प्रकृति के साथ सद्व्यवहार नहीं किया। अब तुम मेरी मूर्ति के सामने आकर मेरा सत्कार कर रहे हो? मैं संहार का देवता हूं लेकिन फिर भी मैं असमय किसी का संहार नहीं करना चाहता लेकिन तुमने यदि प्रकृति का उपहास किया है तो आज प्रकृति तुम्हारा उपहास कर रही है।

आज सारा देश उन लोगों के दर्द को अनुभव कर रहा है जो इस भीषण त्रासदी का शिकार हुए हंै। यह प्रकृति द्वारा किया गया अन्याय नहीं बल्कि हमारे द्वारा हमारे ही साथ किया गया व्यवहार है जो इस प्राकृतिक आपदा के रूप् में हमारे सामने आया है। हम जो चाहते हैं वहीं व्यवहार हमें दूसरों के साथ करना चाहिए। अगर हम प्रकृति से कुछ अच्छा चाहते हैं तो उसके बदले हमें भी उसे कुछ देना होगा ना? हम अगर अपने दुष्कर्मों से प्रकृति को गंदा कर रहे हैं तो बदले में वह हमारा ख्याल कब तक रख सकेगी? केवल प्रकृति ही नहीं बल्कि अपने आसपास के प्राणी मात्र के साथ सद्व्यवहार करो बच्चों। नेह बांटो, प्रेम बांटो, भरोसा बांटो, अपने चित्त में संतोष लाओ, किसी एक की जिंदगी जरूर संवारों। किसी की मदद करो लेकिन ख्याल रहे कि जिसे मदद की है तुमने, उसे पता ही न चले कि किस हाथ ने उसकी मदद की है। ऐसा जीवन जियो जिसपर सब गौरव कर सकें।
बच्चों, प्रतिष्ठा बड़े पदों से मिल सकती है लेकिन प्रसन्नता हमेशा भीतर के अच्छे इरादों से आती है।  अगर कोई बोझिल है तो वह अपने पापों के पत्थरों से दबकर बोझिल होता है। जैसे जैसे इन पत्थरों से मुक्त होओगे तैसे ही तैसे हल्के होकर आनन्द से भर उठोगे। ऐसा व्यक्ति जिसके पास पश्चिम के जगत की त्वरा और पूरब के जगत की शांति हो तभी हम श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे। तुम मां बनोगी आने वाले समय में बेटियों, और जब मां बनोगी तो अपनी संतानों को बताना की बच्चे, स्त्री मात्र शरीर नहीं होती। जब उसे यह संस्कार दोगी तो आने वाले समय में फिर किसी भी ‘दामिनी’ के साथ बर्बर और अमानुषिक व्यवहार नहीं होगा।


                                                                                                                            -दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा
                                                                                                       सौजन्य - वात्सल्य निर्झर, जुलाई 2013

Monday, July 29, 2013

मम्मी नहीं माँ कहिए और उसके अर्थ को समझें -‘दीदी माँ’ साध्वी ऋतम्भरा

दीदी माँ
अपने देश को समथ्र और समृद्ध बनाने के लिए सुप्त मातृशक्ति का जागरण जरूरी है। हमें शक्ति अर्जित करने है। हमें अपनी शक्ति को पहचानना है और विषम परिस्थितियों से घिरे भारत को एक ऐसी दिशा प्रदान करनी है कि हमारा यह देश, हमारी यह धरा, हमारा यह समाल अपने उस खोए गौरव को पुनः प्राप्त करें जिस गौरव, जिस स्वाभिमान और जिस शक्ति से सम्पन्न हमारे पूर्वज थे, हमारे पुरखे थे।
 
हमारे देश में मातृशक्ति को जागृत करने के प्रयास पश्चिम की तर्ज पर हो रहे हैं। मेरी अपनी मान्यता है कि भारत की नारी-शक्ति, भारत की स्त्री, भारत की महिला, उन पवित्र परंपराओं, मान्यताओं और भारत के गौरव से भरे हुए इतिहास से परिचित होगी तो यह सोचकर कि ‘मुझे इतनी पवित्र पावन सांस्कृतिक परंपरा में जन्म लेने का अवसर मिला है, वह अपने दायित्व, गौरव और स्वाभिमान का अनुभव करेगी। भारत में स्त्री को कभी भोग्या की दृष्टि से नहीं देखा गया। भारत मातृपूजक देश है। याहँ माँ और जननी परमपूज्या होती हैं किंतु आजादी के पूर्व जो हमारी पूज्या थी उसे भोग्या मानने-बनाने का प्रयास हुआ। भारत की मातृ-शक्ति को पीछे धकेलने की कोशिश हुई। हम धीरे-धीरे अपनी गरिमा, अपने गौरव और अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमान- शून्य होते चले गए। 

भारत की स्त्री को आज के बाजार में उपभोक्ताओं को आकृष्ट करने के लिए विज्ञापन के रूप में साजाया-दिखाया जाता है। हम पाश्चात्य संस्कृति से इतने प्रभावति हैं, इसके आकर्षण में इतना आबद्ध हैं कि अपने ‘स्व’ को भूल गए हैं। अपने स्वरूप को भूल गए हैं। परिणामस्वरूप आज अजीबोगरीब वातावरण में हम अपने को खड़ा पा रहे हैं। हम यह भूल गए हैं कि माँ निर्मात्री होती है। जननी संतान को जन्म देती है, माँ उसे द्विज बनाती है। माँ पुकारने से ‘माँ’ शब्द का उच्चारण करने से हृदय में वात्सल्य, स्नेह और समर्पण का अद्भुत भाव उमड़ उठता है। प्रत्येक स्त्री को माँ होने का सौभाग्य मिला है? किन्तु हमारी अधिकाँश माताएँ, बहनें स्वयं को ‘मम्मी’ कहलाने में गौरव का अनुभव करने लगी हैं। अब कितनी बची हैं ‘माँ’ अपने देश में? अब माताएँ माँ नहीं, केवल मम्मी हैं। काश! माँ होतीं तो समझतीं कि यह सम्बोधन कितना सागरर्भित, कितना मार्मिक और कितना संस्कारक्षम है। 

हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे समस्त संवेदनशील सम्बन्धों की जीवन्तता नष्ट हो गई है। अब हमें यह बताने की आवश्यकता आन पड़ी है कि माँ कहने से हृदय में एक अजीब सी तृप्ति का अनुभव होता है जो ‘मम्मी’ कहने से नहीं हो सकता। पिता जहाँ ‘डैड’ हो गए हों, माँ जहाँ ‘मम्मी’ हो गईं हों तो क्या जाने माँ सन्तान का सुख और क्या जाने संतान माता-पिता के वात्सल्य का आनन्द? कुछ लोग कहते हैं कि शब्दों में क्या रखा है? वे यह नहीं जानते कि शब्दों में बड़े गहरे अर्थ छिपे रहते हैं। हमने जो कुछ खोया है हम उसे पुनः प्राप्त कर सकते हैं। मात्र जागने की जरूरत है। केवल अनुभव करने की जरूरत है। जब घर में पुत्र का जन्म होता है तो लोग कहते हैं ‘‘आपको बधाई हो, आपके कुल का ‘दीपक’ प्रज्जवलित हो गया।’’ लेकिन जो आपके कुल का दीपक है, घर का चिराग, उसके जन्मदिन पर केक काटते, मोमबŸिायाँ बुझाते, ताली पीटते आपकोे शर्म का अनुभव नहीं होता कि, ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ का मंत्र दिया था। आज हमारा ही कुल-दीपक, दीपक बुझा रहा है और हम सीना तानकर तालियाँ पीट रहे हैं? क्या इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं हो सकता है? अपनी संतानों को प्रकाश से अंधकार की ओर नहीं, अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा दीजिए ताकि उन्हें पता चले कि प्रकाश की कीमत क्या होती है? वे यह अनुभव करें कि प्रकाश की कीमत क्या होती है?वे यह अनुभव करें कि तेजस्विता, ओजस्विता किसे कहते हैं? यह अनुभव वे कैसे करेंगी? माँ प्रातः काल उठेगी, अपनी सन्तानों को सूर्योदय का दर्शन कराएगी। तब उनके हृदय में तेजस्विता का संचार होगा। अपनी संताने तेजस्वी बनें, ओजस्वी बनें, उन्हें पता चले कि प्रकाश किसे कहते हैं, उन्हें अनुभव हो कि दूसरों को आलोक देना, प्रकाश देना कैसा होता है। यह अनुभव वे कैसे करेंगे, जब तक माँ स्वयं उस अनुभूति से न गुजरेगी?

माँ की महिमा अपार-अथाव है। पशु-जगत में एक बार में ही बारह-बारह बच्चों को जन्म देने वाले पशु पाए जाते हैं। वे बारह-बारह संतानों की जननी बन जाते हैं, तब भी उनकी महिमा नहीं गाई जाती। क्योंकि महिमा संतान को जन्म देने में नहीं महिमा संतान को जन्म देकर उसे द्विज बना देने में है। महिमा तो उन ‘विद्यावतियों’ की होती है जिन्होंने ‘भगतसिंहों’ को फाँसी के फंदे पर झूलते देखा तो उनका कलेजा श्लोकवत् वाणी में बोला कि ‘मेरी कोख आज सार्थक हो गई कि मेरे पुत्र ने भारत की गुलामी की जंजीरें काटने के लिए फाँसी का फंदा चूम लिया, आज मेरा पुत्र को जन्म देना सार्थक हो गया।’

बनना तो विद्यावती जैसी माँ बनना। माँ बनने का सौभाग्य मिला है तो फिर यशोदा जैसी माँ बनना। कोई पूछता है कि कन्हैया की माँ का नाम क्या है तो देवकी का नहीं यशोदा मैया का नाम लिया जाता है। देवकी तो कान्हा की केवल जननी थीं। उनकी माँ यशोदा थीं। जननी होना अलग बात है और माँ होना सर्वथा अलग बात। माँ बनना हो तो जीजाबाई जैसी माँ बनो। ‘स्त्री’ को स्त्री होने का अर्थ समझना चाहिए। मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि हम कितनी विचित्र दासता और गुलामी की मानसिकता के दौर से गुज़र रहे हैं कि अपनी परंपरा और क्षमता पर हमें गौरव का अनुभव ही नहीं होता। अपनी शक्ति पर हम विश्वास नहीं कर पाते। परमात्मा ने माँ को सर्वोच्च स्थान दिया है। लोग जब कहते हैं कि स्त्रियों के लिए कुछ ऐसा करो कि वह पुरुषों से भी आगे निकल जाएं तो बहुत पीड़ा होती है। स्त्री को पुरुष के समकक्ष खड़ा करना मूर्खता है। जिसका स्थान देवताओं से भी ऊँचा है, उसको पुरुषों के समकक्ष और उसे आगे निकल जाने की होड़ में खड़ा करोगे? इसका अर्थ यह है कि हमने भारतीय संस्कृति को समझा ही नहीं। भारत की महिला की महिमा बड़ी विचित्र है और इसे समझने के लिए हृदय चाहिए।