About Didi Maa

Saturday, April 4, 2015

सुखी हो जाने की कला

हम स्मरण करते हैं भारत के उन सत्पुरुष महामानवों को जिनका स्मरण मात्र ही चित्त में पावनता का संचार करता है। कदाचित अपने स्वरूप को, अपने आप को खोकर जीने का अर्थ समाप्त हो जाता है। दूसरों के श्रेष्ठ को धारण स्वीकार करना, ये मनुष्य की गरिमा होती है लेकिन अपने श्रेष्ठ को भूल जाना ये मनुष्य का आलस्य और प्रमाद होता है, आत्महीनता की पहचान होती है, इसलिए मेरा जो अपना श्रेष्ठ है जो मुझे मेरे पुरखों से मिला, मेरी परम्परा से मिला, मेरे धर्म से मिला, मेरे देश की माटी के सौंधेपन से मिला, वो है कपिल, कणाद की परम्परा से मिला और सबसे खूबसूरत जो मिला वो भारत की धरती पर ‘मातृभाव’ मिला, ‘मातृसत्ता’ मिली। भारत की मानवी ने जाना कि माँ होने के अर्थ क्या होते हैं। माँ कैसी होती है, माँ क्यों होती है और माँ की गरिमा क्या होती है। अगर सारे विश्व की मानवी को टटोलोगे तो भारत की स्त्री में ही वह स्वरूप दिखाई देगा जो धन्य करता है मनुष्यता को। सबसे पहले भारत ने ही दी है - मातृसत्ता। एक जगह चर्चा चल रही थी कि बच्चों का अच्छा विकास कैसे होगा। संभव है, उन्हें अच्छा भोजन दो, अच्छा वातावरण दो, अच्छी औषधियाँ दो, बच्चा अच्छा बनेगा लेकिन कैसे अच्छा बनेगा अगर उसे जन्म देने वाली माता आत्महीनता की शिकार है, अगर वो मानुषी भाव को खो चुकी है, अगर वो मातृत्व की गरिमा को नहीं पहचानती, अगर वो ये नहीं जानती की संसार का सबसे श्रेष्ठ सृजन मेरे हाथों से हो रहा है, तो फिर उस संतान को मानसिक, आत्मिक और शारीरिक विकास कैसे मिल सकता है? इसलिए अगर भारत अपनी संतानों को खूबसूरत देखना चाहता है, सर्वगुण सम्पन्न देखना चाहता है तो फिर कार्य तो भारत की स्त्री पर ही करना होगा।

आज से बहुत वर्षों पहले विदेश से एक विद्वान आए थे महाराष्ट्र के अन्दर। एक गाँव देखा था उन्होंने। उसके जलाशय के अन्दर स्नान करती स्त्रियों को देखा उन्होंने। अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि मैंने देखा भारत की स्त्री को, जिसका तन और मन दोनों की बहुत सुन्दर हैं। सकुचा गई थीं वो देवियाँ, जलाशय के पास किसी पराये पुरुष को देखकर। लज्जा, शील, संकोच ये भारत की स्त्री के आभूषण हैं। कदाचित् वो खुलती हैं अपनों के बीच में, लेकिन जब कोई पराया दिखता है तो संकोच में सिकुड़ती जाती हैं। और उनका वही शील उनको खूबसूरत बनाता है। उनका वही शील उनको धन्य बनाता है। उनको चरित्र के शिखर पर पहुँचाता है। उन्होंने लिखा कि कदाचित् यूरोप की स्त्री उस गरिमा को समझ नहीं पाएगी क्योंकि वो अपनी मानसिक और शारीरिक भूख को मिटाने के लिए अपनी संतान को छोड़कर पराये पुरुष के साथ जाती है, अपने पति का त्याग कर देती है, और उसका अपना पति किसी विवाहित स्त्री के साथ अपनी वासना तृप्त करने के चक्कर में लगा रहता है जिसके कारण किसी और का घर बिगड़ जाता है। इस चक्कर में वे संतानें अकेली रह जाती हैं जो किसी भी देश का भविष्य होती हैं। यूरोप की स्त्री कभी नहीं समझ पाएगी उस भाव को, जिसे भारत की स्त्री अपने मन-मानस में जीते हुए अपने घर में स्वर्ग को उतार लेती है।

    लौटकर देखिये उस चिन्तन को, आप कहोगे कि जब हम अपनी बात कहेंगे तो लोग कहते हैं कि ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।’ लेकिन यदि आप संसार में घूमकर टटोलेंगे तो आपको मानना ही पड़ेगा कि आपके ऋषियों ने आपको जो दिया है वो संसार की सबसे श्रेष्ठ जीवन पद्धति है। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज, वो एक पुत्र ही तो थे, माँ भारती के लाल ही तो थे। इटली गए थे वो। वहाँ की एक स्त्री ने प्रस्ताव रखा था उनके सामने कि विवेकानन्द तुम कितने खूबसूरत हो, तुम्हें देखकर चित्त में लालसा पैदा होती है। चित्त के अन्दर वो एक भाव पैदा होता है जो कहता है कि तुम मुझे अंगीकार करो। मुझे आलिंगन में बाँधो। वचन देती हूँ कि तुम्हारे जैसा बेटा पैदा करूँगी। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा -‘मेरे जैसा तो मैं ही हो सकता हूँ देवी। इसलिए आज से मुझे अपना पुत्र स्वीकार कर लीजिये और मेरी माता बन जाइये।’

    इस देश के अन्दर यहीं तक नहीं स्वर्ग की अप्सराओं को भी ऐसा ही उत्तर अर्जुन ने दिया था, जब उर्वशी ने अर्जुन से प्रणय कामना की थी। उर्वशी ने कहा -‘तुमने मेरे प्रणय निमंत्रण को ठुकराया है। याद रखना, तुम किन्नर बनोगे।’ तब अर्जुन ने कहा था -‘देवी, नपुंसक बनना स्वीकार कर लूँगा, उस समय का भी कोई सदुपयोग हो जाएगा लेकिन मेरे चित्त में तुम्हारे प्रति वासना पैदा हो नहीं सकती।’ ये वो प्रामाणिक देश है जिसके देशवासियों ने अपने जीवनमूल्यों को पूर्ण प्रमाणिकता के साथ जिया। आज कहाँ खड़े हैं हम? जीवन के प्रत्येक मोड़ पर मैं अपनों से पूछ रही हूँ - हम दुनिया को बदल रहे या हमको बदल रही है दुनिया।

आज पश्चिम का कितना बड़ा प्रभाव है हम पर। हमें भौतिकता के शिखर छूने हैं। हमें वस्तुएं चाहिए। दुनिया भूल गई हमको, लेकिन हम नहीं भूलते दुनिया को। पदार्थ चाहिए हमको? आश्रमों में सारा संसार आता है, ध्यान की गहराईयों में उतरने के लिए और भारत का कोई भी व्यक्ति बैठता है गोरी चमड़ी वाले के पास और पूछता है -‘कैमरा बेचोगे?’ कितना अन्तर है उस गोरे की दृष्टि हमारे ज्ञान पर, हमारे ध्यान पर और हमारी दृष्टि उसकी वस्तु पर। क्या हुआ? ये कैसा आकर्षण पैदा हुआ? क्या भारत के ऋषि उस युग को भारत के अन्दर नहीं लाये थे जब हम भौतिकता के शिखरों पर भी थे। मन की गति से चलने वाले विमान थे हमारे पास। उन युगों में भी हम उन्नति और प्रगति के शिखरों पर थे। ‘हिन्दू मिथक’ कही जाने वाली अनेक मान्यताओं का आश्रय भी अपने आधुनिक अविष्कारों के लिए वर्तमान युग के वैज्ञानिकों ने लिया लेकिन हमारे ही देश में अपनी परम्पराओं को गाली दी गई। अपने ही मुँह पर तमाचा मारने को प्रगतिशीलता कहा गया। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जहाँ आकर खड़े हैं वहाँ बड़ी विचित्र स्थिति है। हम दूसरों को देखकर सोचते हैं कि हम दुनिया के साथ दौडेंगे, लेकिन कभी लगता है कि हम ध्यान में उतर लें और कभी लगता है कि धन बटोर लें। जीवन दुविधा में है। स्पष्टता नहीं है।
आज इन स्थितियों पर आकर विचार करना बहुत प्रासंगिक है। स्वामी विवेकानन्द का स्मरण करते हुए हम अपने मूल्यों को स्पष्टता से देखें। विचार करें कि हमारा लक्ष्य क्या है? क्या स्त्री भोग्या है, कामिनी है, क्या उसको केवल अपने तन की सुन्दरता का ही ख्याल रहेगा? क्या तन नंगा और मन क्रूर हो जाएगा तो हम धन्य हो जाएंगे? चिन्तन तो करना चाहिए कि मेरे तन का नंगापन और मेरे मन की क्रूरता मेरी संतानों को कहाँ ले जाएगी? मेरे राष्ट्र को कहाँ ले जाएगी? मेरे समाज को कहाँ ले जाएगी? ये धन की भूख और ये भौतिकता की लालसा क्या मेरे घर को बिखरा तो नहीं देगी? क्या मुझे इसका चिन्तन नहीं करना चाहिए? हाँ, हम प्यार करते थे व्यक्तियों से और इस्तेमाल करते थे वस्तुओं का। अब हम प्यार करते हैं वस्तुओं से और इस्तेमाल करते हैं व्यक्तियों का। दोहन करो, शोषण करो, किसके साथ खड़े होने से लाभ होगा और किसके साथ बात करने से हानि हो जाएगी, यदि हमारे चिन्तन की यह धारा हो गई तो फिर समझ लीजिये कि कहाँ पहुँचेंगे हम।

    आप सोचोगे कि दीदी माँ तो अपनी बात ही निराशावाद से प्रारम्भ कर रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कभी-कभी स्वयं का पोस्टमार्टम करना भी जरूरी होता है। अपने चेहरे के रोग को पाऊडर से ढाँकना, ये कोई रास्ता होता नहीं। पहले रोग को स्वीकार किया जाए फिर उसका इलाज संभव होता है। रोग को अगर हम छुपाने की कोशिश करते हैं तो फिर वो लाइलाज बनता है। तो रोग क्या है? आत्महीनता रोग है। यही हमारी सबसे बड़ी रुग्णता है। अपने श्रेष्ठ के प्रति श्रद्धा का अभाव, ये रोग है। हाँ मैं मानती हूँ कि सामाजिक जीवन में फोड़े पैदा हुए। दुष्वृŸिायाँ आईं, कुरीतियाँ आईं। फोड़े का इलाज होना चाहिए ना? उसके लिए पूरे शरीर को खण्ड-खण्ड करके फेंका तो नहीं जा सकता ना? हमारी गुलामी के लंबे काल ने हमारे समाज को आत्महीन बनाया, यह सच है।

कभी-कभी चर्चा होती है श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की, कि क्यों हम गलियों की खाक छानते रहे। क्या हमें नहीं पता कि परमात्म सत्ता केवल एक मन्दिर तक ही सीमित नहीं बल्कि वो तो कण-कण में व्याप्त है? फिर क्या कारण था कि एक मन्दिर के लिए गाँव-गाँव और नगर-नगर भटक रहे थे हम लोग? वो मात्र एक मन्दिर का विषय नहीं था। वो भारतीय परम्परा के तेज और ओज तथा भारतीय स्वाभिमान, जो धुआँ बनकर उड़ रहा था आसमान में, को स्थापित करने का एक महा अभियान था। बुनियाद थी वो, जिस पर आज आप स्वाभिमान को भव्य भवन देख रहे हो। आज आप वो दिन देख पा रहे हो जब देश के प्रधानपन्त दुनिया में जाकर कहते हैं कि मेरे पास देने के लिए गीता से बढ़कर और कुछ नहीं है, और आपके पास गीता से बढ़कर पाने के लिए और कुछ नहीं है। इस दिन को देखने के लिए आँखें तरस रही थीं। क्या इतने थोड़े से समय में हमें नरेन्द्रभाई ने भव्य भारत दे दिया? लेकिन उसी दिन धन्य हो गई चित्त-चेतना, जिस दिन भारत माता का वो लाल काशी में गंगा के किनारे हाथ में दीप पकड़कर खड़ा हो गया। बाबा काशी विश्वनाथ के मन्दिर में उन्हें अभिषेक करते देखने के बाद छह घण्टों तक मेरी आँखों से अश्रुधारा बहती रही। मैंने अपने गुरुदेव से कहा -‘गुरुदेव, मैं थक गई रोते-रोते।’ वे बोले -‘ऋतम्भरा, आँखों ने वह दिन देख लिया जिसके लिए वर्षों से हम लोग गाँव-गाँव और गली-गली देशाटन कर रहे थे।’ लोग मुझसे पूछते थे कि आप क्यों भटक रही हो हिन्दुस्तान में? हम एक ही बात कहते थे कि बस एक ही चाह है:

लोकसभा बासन्ती चोला पहन के जिस दिन आएगी
गली-गली मेरे भारत की वृन्दावन बन जाएगी

अब हम सब मिलकर निश्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तब ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देश की दशा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निष्ठावान होकर अपने राष्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृष्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निश्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देश सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है। आप अंदाजा लगाकर देखो देवियों, देने में सुख है कि पाने में सुख है। आज के दौर में सब कहते हैं कि हमें अपनी तरह से जीना है। अरे भाई, ये अपनी तरह से जीने का अर्थ क्या है? मैं  विरोध नहीं करती प्रगति का, लेकिन कहाँ ले जाकर खड़ा करेगी ये स्वच्छंदता हमें? बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में पहुँचाएगी। संतानें ‘अवैध’ रूप से जन्मेंगी जिन्हें अनाथाश्रमों में पलना पड़ेगा। ये जो स्वच्छंदता है, घर के तिनके बिखेर देगी। माँ-पिता को लज्जित कर देगी और हम सुखी हो जाएंगे, यह संभव नहीं है।

    क्या है एक परिवार की संकल्पना? मेरा दिल जो कर रहा है उसमें पिताजी राजी हैं या नहीं?, और अगर उनकी रजामंदी है तो फिर जो मैं कर रहा हूँ, वह वास्तव में करने लायक है। यदि वे राजी नहीं हैं तो फिर मेरा मन ‘मनमुखी’ तरह से चल रहा है और वह कार्य करने लायक नहीं है, जिसे मैं चाह रहा हूँ। गुरुजनों को देखते हैं, बड़ों को देखते हैं, अग्रजों को देखते हैं, उनका कहा मानते हैं, यही तो है परिवारभाव। अब इस बात के लिये कोई राजी नहीं है कि जो बड़े कर रहे हैं हमें उसमें अपनी सहमति देनी है। महिलाएं कहती हैं कि हम घर में भले ही आया रख लेंगे लेकिन ये सासू जी का अनुशासन झेलने को तैयार नहीं हैं। अब स्थिति क्या हुई कि जो देश की संतानें हैं उनको बाईयाँ पाल रही हैं, जिनको दादियों और नानियों की गोद में पलना चाहिए था। संयुक्त परिवार की रसधार केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि दस व्यक्तियों से जुड़ी होती है। आज एकल परिवारों में रहने वाले पति-पत्नी में अगर कुछ गड़बड़ हुई तो कई बार उनमें से कोई एक पंखे से लटकता हुआ मिलता है क्योंकि दोनों को समझाने वाला कोई नहीं था। पहले कितने रिश्ते हुआ करते थे। पड़ोसी तक घर के किसी विवाद में बड़े ही अधिकारपूर्वक हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाला करता था। जीवन व्यर्थ नहीं लगता था। आज केवल एक के ही साथ चित्तवृत्ति अटक गई है। हमारे मूड के आन/आॅफ का स्विच ही किसी और के हाथ में होता है। हम कहते हैं ना कि हमारा मूड आॅफ है आज।

    कई बार लोग मुझे कहते हैं कि हम दिल से नहीं हँस पाते। मैंने कहा अरे भाई क्यों नहीं हँस पाते। भगवान ने इंसान को हँसने के लिए ही तो भेजा है दुनिया में। आप ये बताओ कि कभी किसी गधे को हँसते देखा है आपने? क्यों बोझिल होते हो आप? क्योंकि अहंकार की चट्टान छाती पर रखकर बैठे हो। अभिमान है - नाम का, धन का, पद का, प्रतिष्ठा का। बहुत ऊँचे शिखर पर भले ही पहुँच गए हो लेकिन जानते हो शिखर का सच? शिखर हमेशा अकेला होता है और अपने आप में जो अकेला होता है वह संसार का सबसे अभागा मनुष्य होता है। 

सौभाग्यशाली वह है जिसे विश्व की ख्याति मिल जाए तो भी वो अपने माँ-पिता के चरणों में आकर वैसे ही बैठे जैसे कोई नन्हा बच्चा अपने माँ और पिता का आँचल पकड़कर मचलता है। भारतीय चिन्तन को धारण करके क्या कभी उदासी आ सकती है मन में? नैराष्य कभी आ सकता है? हँसिए, मुस्कुराईये और इस बात को निश्चित कर लीजिये कि केवल अपने लिए ही नहीं जीना बल्कि अपनों के लिए भी जीना है। केवल अपनों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, जड़-जंगम सारा ब्रह्माण्ड अपना है यह भाव जिस दिन मन में आ गया उस दिन अपना संसार के सबसे सुखी मनुष्य होने का दर्जा प्राप्त कर लोगे।

अब हम सब मिलकर निष्चित करें कि अपने जीवन का सकारात्मक रूपान्तरण करेंगे क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मात्र राजनैतिक परिवर्तन से देष की दषा नहीं बदलने वाली। जब तक हम निश्ठावान होकर अपने राश्ट्र, अपनी संकल्पना, राम, कृश्ण, बुद्ध और महावीर की उस ओजमयी परम्परा के संवाहक नहीं बनते, जब तक हम यह तय नहीं करते कि भोग नहीं, महावीर का त्याग ही हमारा मार्ग है, जब तक यह निष्चित नहीं हो जाता कि धन सुविधा तो देगा लेकिन सुखी नहीं करेगा, सुख तो प्रभु के चरणों में बैठकर मिलेगा, तब तक देष सच्चे सुख की ओर नहीं जा सकेगा। भौतिकता साधन तो दे सकती है लेकिन सुखी कर देने की गारंटी नहीं है वह। सुख तो त्याग से ही प्राप्त होता है।

साभार - वात्सल्य निर्झर, मार्च 2015

Wednesday, February 25, 2015

पूज्या दीदी माँ जी के जन्मोत्सव में भावविभोर अमेरिका

विगत दिनांक 4 जनवरी 2015 को परमशक्ति पीठ आॅफ अमेरिका के सदस्यों द्वारा पूज्या दीदी माँ जी का जन्मोत्सव मनाया गया। न्यूजर्सी के गाँधी मन्दिर में उनके 51 वें जन्मदिवस पर एक भव्य समारोह का आयोजन सम्पन्न हुआ। भारी वर्षा के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आयोजन में भागीदारी की। समारोह का शुभारम्भ निखिल रेवांकर, रिया रेवांकर, गंगोत्री भगत, अभिषेक भगत, समर्थ गुप्ता एवं ज्योतिन्द्र पटेल के स्वरों में सजी श्री गणेश वन्दना के साथ हुआ। गुरुवन्दना ने वातावरण को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का समापन पूज्या दीदी माँ जी के सन्देश के साथ हुआ।

परमशक्ति पीठ के माध्यम से मानवसेवा कर रहे अमेरिका के अपने सभी सहयोगी बंधु-भगिनियों के प्रति भारत से अपनी मंगलकामनाएं पे्रषित करते हुए उन्होंने अपनेे सन्देश में कहा कि -‘परमशक्ति पीठ, न्यूजर्सी अमेरिका की हमारी टीम जिनके माध्यम से आप सब लोग वहाँ पर एकत्रित हैं, मैं आप सबको बहुत-बहुत आशीर्वाद देती हूँ। मुझे बहुत आनन्द हो रहा है कि आप वहाँ अमेरिका में मेरा जन्मदिन मना रहे हैं और भारत में मेरे जन्मदिन पर लोगों ने चिन्तन किया कि दीदी माँ का जन्मदिन यानि क्या? इसका अर्थ है - वात्सल्य दिवस। वात्सल्य दिवस का अर्थ क्या है? हमें उन बच्चों को अपना वात्सल्य देना है जो इससे वंचित हैं। देश की बहुत सारी ऐसी नन्हीं बेटियाँ हैं जिन्हें श्रेष्ठ शिक्षा के साथ-साथ स्नेह चाहिए, संस्कार चाहिए, जीने का अधिकार और उसकी सार्थकता चाहिए।

इस अवसर पर श्री नीरज भगत, श्री मोहन खन्ना, श्री प्रमोद भगत, श्री वीरेन्द्र लाबरू, श्री दिनेश देसाई, श्री जयेशभाई पटेल एवं श्री शिव अग्रवाल, श्रीमती लीना गुप्ता, श्रीमती नलिनी खन्ना, श्रीमती सरिता गुप्ता, श्रीमती सुधा अग्रवाल, श्रीमती विद्या लाबरू तथा श्रीकांत गुप्ता सहित न्यूजर्सी के अनेक गणमान्य नागरिक इस भव्य आयोजन में सम्मिलित हुए।

न्यूजर्सी (अमेरिका)

Saturday, February 14, 2015

यह सम्मान मेरे गुरुदेव के चरणों में समर्पित है

आप लोगों ने बहुत भारी सम्मान मुझे दिया है, इस सम्मान के योग्य मैं नहीं हूँ। आपका यह सम्मान मैं अपने गुरुदेव पूज्य युगपुरुष स्वामी परमानन्द जी महाराज के चरणों में समर्पित कर रही हूँ। वे एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने व्यक्ति को केवल व्यक्ति नहीं रहने दिया बल्कि समष्टि बनाया है। उनकी शरण में जो भी आता है उसका ‘अहं’ ‘वयं’ बन जाता है। उनकी छत्रछाया में जो कुछ पल भी बैठ जाता है वो बिन्दु नहीं रहता, फिर वह सिंधु बन जाता है। जिसने भी उनकी वाणी को सुना वह मांस के पिण्ड में आबद्ध नहीं रहता, वह इन्द्रियों का दास नहीं बनता बल्कि ब्राह्मी चेतना के साथ जुड़ता है। वो सारी सृष्टि का होता है। हम अपने संन्यासकाल के दौरान निबड़ वनों में गुरुदेव के साथ विचरण किया करते थे। 

एकबार उन्होंने हमें संघ की शाखा दिखाते हुए कहा कि -‘देखो ऋतम्भरा ये लोग वो संन्यासी हैं जिन्होंने भगवा नहीं धारण किया। याद रखना, साधुता कभी भी वस्त्रों की मोहताज नहीं होती। वह तो बस स्वभाव होती है। स्वभाव में यदि परदुःख कातरता आ गई, स्वभाव में यदि साधुता आ गई, स्वभाव में यदि करुणा आ गई तो समझो कि जिंदगी सार्थक हो गई।’ उन्होंने मुझे कहा कि -‘ऋतम्भरा, ये हिन्दू जाति है। इसे कड़वी दवाई पिलानी पडे़गी। बहुत अपयश मिलेगा इस कार्य में। अमृतपान करने वाली जाति अपने ही देश में शरणार्थियों जैसा जीवन जी रही है, यह मैदान में खड़े होकर कहना होगा। 

अपने राष्ट्र और धर्म के रक्षणार्थ साधु को अवसर आने पर सिपाही भी बनना होता है। हो सकता है कि ऐसा करने के दौरान तुम्हें बड़े-बड़े धनवानों से दान-दक्षिणा भी न मिले। तुम्हें व्यासपीठों पर बैठाकर पूजन करने से भी समाज कतराएगा। दुनिया कहेगी कि ये विवादित लोग हैं। कुछ कहेंगे कि इनको राजनैतिक लिप्सा है। लेकिन एक बात स्मरण रखना कि इस देश में परिवर्तन होना है। मात्र सत्ता का नहीं बल्कि सोच का परिवर्तन होना है। क्या तुम ये काम करोगी?’ फिर मेरा वह संघर्ष शुरू हुआ जिसमें मेरे गुरुदेव मेरे साथ थे। देश के लगभग हर प्रांत में मेरे प्रवासों पर प्रतिबंध लगा। लेकिन अपने गुरुदेव के प्रताप के दम पर मैंने, उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में जहाँ जगह-जगह मुझपर प्रशासनिक प्रतिबंध लगाये गए थे, अनेकों राष्ट्रजागरण सभायें कीं। 

जाने कितनी रातें मैंने रेलवे प्लेटफार्मों और खेतों में बिताईं। हमारा आश्रम है छतरपुर में, वहाँ कई बार रातभर विधर्मियों द्वारा फायरिंग कर हमें भयभीत करने का प्रयत्न किया जाता। मेरे एक गुरुभाई थे बुंदेलखण्ड में उन्हें भी दुष्टों ने दस दिन तक धीरे-धीरे जलाकर मार डाला। गुरुदेव ने कहा कि ऋतम्भरा तुम डरना मत। मैंने कहा गुरुदेव मुझे कल्पवास करना है। इसलिए कुछ दिन प्रयागराज रहना चाहती हूँ। उन्होंने कहा -‘तुम कल्पवास क्यों करोगी?’ मैंने कहा -‘गुरुदेव में घूमते-घूमते थक गई हूँ, मुझे कल्पवास करना है।’ मैं शीश मुंडाकर प्रयागराज में गुरुदेव के पास थी। वहीं पर विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष श्री अशोक जी सिंघल गुरुदेव के दर्शनों के लिए आए तो मुझे कल्पवास करते देख बोले -‘अरे अगर साध्वी ऋतम्भरा कल्पवास करेंगी तो गुजरात का कायाकल्प कौन करेगा।’ 
    यह सुनकर गुरुदेव ने मुझसे कहा -‘ऋतम्भरा, शायद तेरी साधना पिछले जन्मों में हो गई होगी। जाने कितने कल्पवास किये होंगे तुमने, अब तो तुम्हंे गुजरात जाना है। जाओ, अपनी भूमिका निभाकर आओ।’ गुरुदेव की आज्ञा पाकर मैंने गुजरात में व्यापक जनजागरण किया। वहाँ सत्ता परिवर्तन हुआ। लेकिन अपने गुरुदेव के निर्देशानुसार हम कभी भी राजनैतिक गलियारों में नहीं गए। हिन्दू को जगाते रहे और फिर बाद में चुपचाप सेवा के कार्यों में लग गए। मुझमें शुरू से ही लगता था कि मैं वात्सल्य से भरी हुई हूँ। कभी-कभी तो लगा कि मैं अपने गुरुदेव की भी माँ हूँ। मेरे उस वात्सल्य को पहचानकर गुरुदेव ने मुझे दिशा दी और यह बताया कि वास्तव में मेरा कार्य क्या है।

    एकबार हम मुंबई से चले तो मैंने गुरूदेव से कहा कि -‘गुरूदेव, मेरी इच्छा है कि हम लोग जालौन चलें। वहाँ पुराने संतों से मुलाकात हो जायेगी। दो दिन पहले ही वहाँ एक घटना घटी थी। मेरी एक गुरू बहन थीं वहाँ जो प्रिंसिपल थीं, उन्होंने विवाह नहीं किया था। शाम उन्होंने अपने घर के बाहर किसी के रोने की आवाज सुनी तो उन्हें लगा कि शायद बाहर कुत्ते को कोई भूखा बच्चा रो रहा है, चलकर उसे बे्रड के कुछ टुकड़े दे दूँ। जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि उनके घर की छत की पनाल के नीचे भरी बारिश में कोई नवजात शिशु को छोड़ गया था। उनका दिल हाहाकार कर उठा। लपककर उन्होंने उस बालक को उठाया, कपड़े से पोंछकर साफ किया। चाय बनाकर उसकी एक-एक गरम बूंद उसके मुख में डाली। रातभर जागकर इन्तज़ार करती रहीं कि कब सुबह हो उसे अस्पताल में छोड़ आऊँ। सुबह जैसे ही द्वार खोला तो सामने एक सन्त खड़े थे। जिनका नाम था स्वामी सुरेशानन्द जी महाराज। बड़े ही भजनानन्दी थे वे। वे मेरी उस गुरू बहन से बोले -‘अरे कहाँ ले जा रही हो इस बच्चे को? ये बिना वात्सल्य के समाप्त हो जायेगा देवी। ऐसी निष्ठुर मत बनों। वो बोलीं -नहीं महाराज जी, मैं पचास वर्ष की हूँ, इस बच्चे के प्रपंच में कहाँ पड़ूंगी।’ सन्त बोले -‘नहीं ये काम तुम नहीं करोगी और जो करेगी वो आएगी। मैं उसका इन्तज़ार करूँगा। और वे उस बच्चे को लेकर उसी घर के सामने बैठ गए।

    ऐसे वीतराग महात्मा ने किसी बालक को अपना लिया है यह चर्चा सारे गाँव में फैल गई। सब लोग इकट्ठा हो गए। भारत की भोली जनता हर चीज़ में चमत्कार देखती है। वहाँ पैसे चढ़ना शुरू हो गए। हमें उसी घर में जाना था, हम जिद करके गुरूदेव को वहाँ लेकर गए। वहाँ भीड़ लगी देखकर हमें भी कौतुक हुआ कि देखें वहाँ क्या हो रहा है। भीड़ में प्रवेश करके जैसे ही मैंने वहाँ देखने की कोशिश की महात्मा जी ने कहा -‘आओ ऋतम्भरा, मुझे तुम्हारी ही प्रतीक्षा थी। इस बच्चे को संभालो, अपना वात्सल्य प्रदान करो।’ मैं हतप्रभ थी! भला एक संन्यासी का बच्चे से कैसा रिश्ता? लेकिन अगले ही क्षण मैंने गुरूदेव की ओर देखा। लगा जैसे गुरूदेव कह रहे हों कि ऋतम्भरा अब यही है तुम्हारी भूमिका। ऐसे बच्चों को अपना वात्सल्य बाँटों, जिन्हें उनके अपनों ने त्याग दिया। इस यहीं से मेरी वात्सल्य यात्रा शुरू हुई थी।

    हम तो उपकरण मात्र है ईश्वर के। धन्य होते हैं हम, जब वे हमें अपने कार्य का निमित्त बना लेते हैं। आज इस अवसर पर मैं एक ही बात कहना चाहती हूँ कि मेरे अपने मेरे साथ सदैव रहे। बहुत थोड़ी सी शक्ति है उनकी। लेकिन उनका समर्पण वह परिणाम लाया जिसने वात्सल्य की सुन्दर सृष्टि खड़ी कर दी।

साभार - पूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा जी सम्बोधन, स्वर्ण जयंती अभिनन्दन समारोह, इंदौर
              दिनांक - 3 जनवरी, 2015